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अपने पूर्वजों के साथ हुए अन्याय के बदले ये देश ब्रिटेन से मुआवज़ा मांगने वाला है

फ़र्ज कीजिए, कोई आपकी चीनी चुरा ले.

सुबह की चाय. शाम की कॉफ़ी. स्पंज के रसगुल्ले, रबड़ी, चमचम, हलवे, जलेबियां. भोजन के बाद परोसे जाने वाले डिज़ट्‌ की मिठास. कुकीज़, पेस्ट्रीज़, आइसक्रीम्स. इन सबकी मिठास हटा दी जाए. आपकी ज़िंदगी से चीनी को बेदख़ल कर दिया जाए. बताइए, कैसा लगेगा आपको? आप कुढ़ेंगे. रातों को जगकर बैठ जाएंगे और तड़पकर कहेंगे, मीठे की क्रेविंग हो रही है.

हमारी ज़िंदगी में सांस, पानी, नमक की तरह चीनी भी बुनियादी हो चुकी है. लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उस चीनी की सफ़ेद दानेदार रंगत में इंसानी ख़ून मिला हो? क्या आप सोच सकते हैं कि चीनी उपभोग की निर्दोष वस्तु नहीं, अमानवीयता की निशानी हो? ये प्रतीक हो दमन का, अकल्पनीय अत्याचारों का. ये निशानी हो, दुनिया में हुए सबसे बड़े अन्याय की? आज जो क़िस्सा हम सुनाने जा रहे हैं, वो इसी भीषण पहलू से जुड़ा है. इसी क्रूर अतीत को लेकर एक छोटा सा देश अब अपने पूर्वजों के साथ हुए अन्याय के बदले ब्रिटेन से मुआवज़ा मांग रहा है. क्या है ये पूरा मामला, विस्तार से बताते हैं.

दुनिया में पांच महासागर हैं- प्रशांत, अटलांटिक, हिंद, आर्कटिक और अंटार्कटिक. इनमें दूसरा सबसे बड़ा महासागर है, अटलांटिक. इसी अटलांटिक ओशन का एक हिस्सा है, कैरेबियन सी. मैप पर इसकी लोकेशन देखिए.

Carribean Sea 1
कैरेबियन सी

कैरेबियन सी के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में हैं मेक्सिको और सेंट्रल अमेरिका. पूरब में हैं, बारबाडोस और ऐंटिगुआ जैसे लेसर ऐनटिलीज़ के देश. कैरेबियन सी के दक्षिण में है, साउथ अमेरिका का उत्तरी कोस्ट. और उत्तर में है, क्यूबा जैसे ग्रेटर ऐनटिलीज़ के देश.

इसी ग्रेटर ऐनटिलीज़ में बसा एक छोटा सा देश है- जमेका. आप बॉब मार्ले को जानते हैं? उसैन बोल्ट को जानते हैं? ये दोनों जमेका के ही हैं. इस देश की मॉडर्न हिस्ट्री शुरू होती है 3 मई, 1494 को. इसी रोज़ अपनी समुद्री यात्रा के दौरान क्रिस्टोफ़र कोलंबस ने पहली बार जमेका को देखा था. कोलंबस ने इसे नाम दिया- सेंटियागो. कोलंबस जब यहां पहुंचा, उस वक़्त यहां जो मूलनिवासी रहते थे, उनका नाम था- अरावाक. वो अपनी मातृभूमि को ‘ज़ेमाका’ बुलाते थे. इसका मतलब था, लकड़ी और भोजन की ज़मीन.

Jamaica On Map
मैप में जमेका कुछ ऐसा दिखता है.

देश का आधुनिक नाम ‘जमेका’ उसी अरावाक भाषा से निकले ‘ज़ेमाका’ का अपभ्रंश है.

वापस लौटते हैं 1494 के साल पर. कोलंबस द्वारा की जाने वाले समुद्री यात्राओं का संबंध अडवेंचर या दुनिया दर्शन की प्रेरणा से नहीं था. इन यात्राओं का मक़सद था, नई ज़मीन खोजना. ताकि उसे ग़ुलाम बनाकर कोलंबस और उसका स्पॉन्सर स्पेन पैसा कमा सकें. चूंकि कोलंबस ने कथित तौर पर जमेका को खोजा था, सो वो उसकी प्रॉपर्टी मानी गई. स्पैनिश क्राउन ने इस द्वीप का लाइसेंस कोलंबस को दे दिया. शुरुआत में कुछ सालों तक इस द्वीप का अधिकार कोलंबस फैमिली के पास रहा.

फिर 1509 आते-आते स्पेन ने इसकी बागडोर अपने हाथ में ले ली. उसने जमेका को अपना ग़ुलाम बना लिया. स्पेन से आए बाहरी अपने साथ कई तरह की बीमारियां लाए. मूलनिवासी अरावाक कम्युनिटी के पास इन नई और अनजान बीमारियों का कोई डिफेंस नहीं था. उनकी बड़ी आबादी इन बीमारियों का शिकार होकर मर गई. बचे हुए मूलनिवासियों को ग़ुलाम बनाकर खटाया गया. उनसे इतनी अमानवीयता बरती जाती कि जल्द ही वो सब भी मर गए.

Jamaica Map 1600
Jamaica Map 1600

जमेका को प्रॉफ़िट वेंचर में बदलने के लिए स्पेन को ज़रूरत थी, ग़ुलामों की. जो यहां भूखे-प्यासे, बिना किसी मेहनताने के दिन-रात काम करें और उनकी मेहनत से उपजी चीजों को बेचकर स्पेन को पैसा मिले. लेकिन यहां रहने वाले मूलनिवासी अरावाकों का तो सफ़ाया हो गया था. ऐसे में स्पेन किन्हें ग़ुलाम बनाकर खटाता? इससे निपटने के लिए स्पेन ने युक्ति निकाली. वो अफ्रीका के लोगों को ग़ुलाम बनाकर जमेका लाने लगा. ग़ुलाम बनाकर लाए गए अफ्रीकन्स की शुरुआती खेप 1513 में जमेका लाई गई थी.

ग़ुलामों की ये ख़रीद-फ़रोख़्त, उन्हें अफ्रीका से जबरन ग़ुलाम बनाकर ले जाना, ये सब ट्रांस अटलांटिक स्लेव ट्रेड का हिस्सा था. इस स्लेव ट्रेड की शुरुआत की थी यूरोप ने. ये अमानवीय कारोबार अमेरिकाज़ की डिस्कवरी के साथ शुरू हुआ. इसने तेज़ी पकड़ी अगस्त 1518 में, जब स्पेन के राजा किंग चार्ल्स प्रथम ने ग़ुलामों की ख़रीद-बिक्री से जुड़ा एक आदेश निकाला. इस आदेश में स्पैनिश कारोबारियों को अधिकार दिया गया कि वो ख़ुद ग़ुलामों की ट्रेडिंग कर सकते हैं. वो अफ्रीकन्स को ग़ुलाम बनाकर उन्हें अमेरिकाज़ में बेच सकते हैं.

इस ट्रांस अटलांटिक स्लेव ट्रेड का नाम सुनकर भी शायद आप इसकी क्रूरता का अंदाज़ा न लगा पाएं. इसीलिए ब्रीफ में इस कारोबार की मोडस ऑपरेंडी जान लीजिए. यूरोपियन कारोबारी अफ्रीका जाते. वहां से लोगों को पकड़कर जहाज़ों में ठूंसते. उन्हें अमानवीय स्थितियों में एक लंबी समुद्री यात्रा करके कैरेबियन और ब्राजील ट्रांसपोर्ट किया जाता. यहां उनकी नीलामी होती. यहां ग़ुलामों को खरीदने वाले उन्हें न्यू वर्ल्ड के अलग-अलग देशों में ले जाते. समंदर की यात्राएं इतनी भीषण और दयनीय होती थीं कि गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते ग़ुलाम बनाए गए लोगों की एक बड़ी संख्या दम तोड़ देती थी. आंकड़ों के मुताबिक, इस तरह से करीब चार करोड़ लोग ग़ुलाम बनाए गए. इनमें से 50 पर्सेंट से ज़्यादा लोग यात्राओं के दौरान ही मारे गए.

Slave Ships 76
इस तरह की शिप से गुलामों को जमेका से बाहर ले जाया जाता था.

अब सवाल है कि यूरोपियन पावर्स को इस स्लेव ट्रेड से हासिल क्या हो रहा था? क्यों थी उन्हें इतने सारे ग़ुलामों की ज़रूरत? इसका जवाब है, कैश क्रॉप्स. ऐसी फ़सलें, जिनसे ख़ूब मुनाफ़ा होता था. इन कैश क्रॉप्स में तीन सबसे प्रमुख क़िस्में थीं- चीनी, कपास और तंबाकू. यूरोपियन पावर्स जिन नए देशों को ग़ुलाम बनाते, वहां इन फ़सलों की बढ़-चढ़कर खेती करवाते. जो पैदावार होती, उसे वर्ल्ड मार्केट में ऊंची दरों पर बेचते. इसी खेती के लिए यूरोपियन कोलोनियल पावर्स को ग़ुलामों की अनवरत सप्लाई चाहिए होती थी. ग़ुलाम इसलिए ताकि उन्हें मेहनताना न देना पड़े. पेटभर खाना तक दिए बिना उनसे दिन-रात मेहनत करवाई जा सके. जो बचे, बचे. जो मर जाए, उसकी जगह फिर और ग़ुलाम ले आओ.

जमेका उन देशों में था, जो शुगर के उत्पादन के लिए मुफ़ीद थे. उन दिनों शुगर की वर्ल्ड मार्केट में बहुत मांग थी. ये सबसे मुनाफ़े वाली फ़सलों में शामिल था. अब आगे बढ़ने से पहले चीनी के बारे में थोड़ी बात कर लेते हैं. दुनिया का सबसे पुराना स्वीटनर है, शहद. तकरीबन 10 हज़ार ईसा पूर्व से इंसान शहद इस्तेमाल कर रहा है. जिन जगहों पर शहद नहीं पाया जाता था, वहां लोग फल और कुछ ख़ास तरह के पेड़ों की छाल से स्वीटनर्स निकाला करते थे.

Jamaica Sugarcane
जमेका शुगर उत्पादन के लिए मुफीद था.

शहद से चीनी की तरफ़ बढ़ने वाली यात्रा शुरू हुई न्यू गिनी के साथ. माना जाता है कि गन्ना यहीं का मूल निवासी है. वहां के लोग इसे चबाकर मिठास का लुत्फ़ लेते. फिर इसकी खेती शुरू हुई. उत्पादन बढ़ा, तो ये जहाज़ के रास्ते होने वाले कारोबार के मार्फ़त न्यू गिनी से बाहर निकलकर फिलिपीन्स और भारत जैसी जगहों पर पहुंचा. कई जानकार मानते हैं कि गन्ने से चीनी और गुड़ निकालने की प्रक्रिया पहली बार भारत में ही शुरू हुई. इससे बनने वाले कुछ व्यंजनों का भारत की कुछ प्राचीन क़िताबों में ज़िक्र भी है.

जब ग्रीक और रोमन्स भारत के संपर्क में आए, तो बाकी चीजों के साथ उन्हें शुगर के बारे में भी पता चला. उन्हीं के साथ ये शुगर मेडिटरेनियन क्षेत्र में पहुंचा. अरब के लोग इससे मीठे व्यंजन बनाने लगे. जब मुस्लिमों और ईसाइयों के बीच क्रूसेड्स युद्ध हुए, तब शुगर से यूरोपियन्स का परिचय हुआ. चूंकि तब शुगर का उत्पादन बहुत कम जगहों पर और बहुत कम मात्रा में होता था, इसीलिए वो एक लक्ज़री थी. जैसे केसर लक्ज़री है, उसी तरह चीनी भी लक्ज़री थी. इसका इस्तेमाल शाही परिवार या बहुत अमीर लोग ही कर पाते थे. ये सोशल स्टेटस का प्रतीक हुआ करता था.

धीरे-धीरे यूरोप में चीनी की मांग बढ़ी. डिमांड बढ़ी, तो गन्ने के बड़े स्तर पर उत्पादन की ज़रूरत महसूस हुई. ये साम्राज्यवाद का दौर था. यूरोप की कोलोनियल पावर्स ने सोचा, इस डिमांड को कैश किया जाए. उन्होंने सोचा कि अगर वो नए खोजे गए और ग़ुलाम बनाए गए देशों में बड़े स्तर पर गन्ने की खेती और रिफ़ाइनिंग करवाएं, तो बड़ा प्रॉफ़िट कमा सकते हैं.

Sugarcane Agricultue
चीनी उस जमाने में लग्जरी चीज हुआ करती थी.

इसी ट्रेंड पर ग़ुलाम बनाए गए देश में गन्ने की खेती का काम शुरू किया स्पेन ने. इसका पहला प्रयोग हुआ, कैनरी आइलैंड्स पर. स्पेन ने यहां के मूलनिवासियों को ग़ुलाम बनाया. ये ही ग़ुलाम गन्ने की खेती में झोंके जाते. इनकी ही मेहनत से चीनी मिलें चलतीं. आगे चलकर हेती, ब्राज़ील…इन सब जगहों पर शोषण का ये ट्रेंड शुरू हो गया. और इसी ट्रेंड का एक भुक्तभोगी जमेका भी था.

हमने आपको बताया था कि जमेका को स्पेन ने अपना ग़ुलाम बनाया. वहां अफ्रीकन्स ग़ुलामों को लाकर बसाने लगे. ये व्यवस्था करीब डेढ़ सदी तक चली. फिर 1655 में एंट्री हुई अंग्रेज़ों की. उन्होंने जमेका पर हमला करके इसे जीत लिया. स्पेन ने जमेका में जो अत्याचार किए थे, उसे चरम पर पहुंचाया अंग्रेज़ों ने. उसके राज में ग़ुलाम बनाए गए अफ्रीकन्स की सबसे ज़्यादा संख्या जमेका भेजी जाने लगी. छह लाख से ज़्यादा अफ्रीकी ग़ुलाम बनाकर यहां एक्सपोर्ट किए गए.

ख़ुद को महान कहने वाले ब्रिटेन ने अपनी संपन्नता के लिए इन ग़ुलामों को ईंधन बनाया. जमेका में सैकड़ों प्लांटेशन्स थीं. इनमें सबसे ज़्यादा पैदावार होती थी गन्ने की. इसके अलावा कोकोआ, कॉफ़ी और नील जैसी नकदी फ़सलें भी उगाई जातीं. इन प्लांटेशन्स में काम करने वाले ग़ुलाम कभी तो कुपोषण से, कभी काम के दौरान होने वाली क्रूरताओं से, तो कभी मलेरिया जैसी बीमारियों से मरते रहते.

पता है, ग़ुलामों से काम करवाने के लिए इंग्लिश क्राउन अपने जिन बाबुओं को यहां भेजता था, उनके बच्चों को खिलौने के तौर पर कोड़े दिए जाते. ताकि वो भी कम उम्र से ही कोड़े मारकर काम करवाने की ट्रेनिंग पा लें. ग़ुलामों को बात-बात पर कोड़े मारना, बेदम होने तक उन्हें पीटते रहना, ग़ुलाम महिलाओं से रेप करना, ग़ुलामों के हाथ-पांव काट देना, ये सारे अत्याचार यहां आम थे.

Slave Gangs
काम के साथ गुलामों को टॉर्चर किया जाता था.

काम में मामूली से धीमेपन पर ग़ुलामों को ऐसा टॉर्चर किया जाता कि सुनकर मन रो देगा. मान लीजिए कि एक्स ग़ुलाम को सज़ा देनी है. तो बाकी ग़ुलामों से कहा जाता कि एक्स के मुंह में मल करें. उसके मुंह पर पेशाब करें. ग़ुलामों को कोड़े मारकर उनके जख़्मों पर मिर्च और नींबू का रस रगड़ा जाता. किसी इंसान को पीट-पीटकर छील दिया जाता और फिर उसके घावों पर गुड़ लगाकर उसे रस्सी से बांध देते. ताकि उसके घावों से चिपकने वाले मक्खी-मच्छर उसे नोच लें. लोगों से इतना काम करवाया जाता कि वो खटते-खटते मर जाते. अंग्रेज़ों को उनके मरने की परवाह नहीं थी. इसलिए कि एक ग़ुलाम मरता, तो स्लेव ट्रेड के सहारे उसकी जगह लेने के लिए और कई ग़ुलाम आ जाते. ऐसे ही अत्याचारों के दम पर 18वीं सदी में जमेका ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे मुनाफ़े वाली कॉलोनी बन गया.

जमेका में ब्रिटेन और उसके वाइट प्लांटर्स इतनी ज़्यादतियां करते थे कि ख़ुद उनके हमवतनों को शर्म आने लगी. ब्रिटेन में लोग इसके खिलाफ़ कैंपेन चलाने लगे. कैंपेनर्स लोगों से अपील करते कि वो जमेका में बनी चीनी और रम जैसे उत्पाद इस्तेमाल न करें. कैंपेनर्स को उम्मीद थी कि अगर लोग इन उत्पादों का इस्तेमाल छोड़ देंगे, तो ये कारोबार मुनाफ़ा देना बंद कर देगा. तब शायद ग़ुलामों की ख़रीद-फ़रोख़्त भी ख़त्म हो जाएगी. कैंपेनर्स लोगों को बताते कि उनके यहां आने वाली चीनी कितनी क्रूरताओं के बाद तैयार होती है.

Slave Market
मार्केट में गुलामों को खरीदा-बेचा जाता था.

इस कैंपेन का असर भी हुआ. आम जनता के एक धड़े को लगने लगा कि जमेका या वेस्ट इंडिया में बनी चीनी इस्तेमाल करके वो भी ग़ुलामी प्रथा की क्रूरताओं के हिस्सेदार बन रहे हैं. लोग इस चीनी का विकल्प खोजने लगे. उन्हें ये विकल्प मिला, भारत में बनी चीनी के भीतर. ये चीनी जमेका और बाकी कैरेबियन में बनी चीनी से ज़्यादा महंगी तो होती थी. मगर ये चीनी स्लेव ट्रेड से जुड़े गिल्ट से मुक्त थी.

इस मुद्दे ने नैतिक तौर पर इतना असर किया कि कई चीनी विक्रेता कंपनियां ख़ास विज्ञापन देकर बताने लगीं कि उनकी चीनी ग़ुलामों ने नहीं बनाई है. ऐसे शुगर का इस्तेमाल ब्रिटेन में नैतिकता और आत्म सम्मान का प्रतीक बन गया. ऐसे ही ग़ुलामी प्रथा उन्मूलन की अपीलों और कन्ज़्यूमर जागरूकता के चलते 1838 में स्लेवरी को क़ानूनी तौर पर ख़त्म कर दिया गया. इसके बाद भी जमेका पर ब्रिटेन का कंट्रोल बना रहा. सदियों की ग़ुलामी के बाद 1962 में आकर जमेका एक स्वतंत्र देश बना.

अब आता है यक्ष प्रश्न. हम ये सारा इतिहास आज क्यों बता रहे हैं आपको? इसकी वजह है, जमेका. बीते दिनों ख़बर आई कि जमेका ट्रांस अटलांटिक ट्रेड में ब्रिटेन की भूमिका के एवज़ में उससे मुआवज़ा मांगने की तैयारी कर रहा है. जमेका की खेल, युवा और संस्कृति मंत्री हैं, ओलिविया ग्रैन्ज़. उन्होंने बीते दिनों रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी से बात की. बातचीत के दौरान ओलिविया ने बताया कि उनकी सरकार ब्रिटेन की महारानी क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय के पास एक याचिका दायर करेगी. इसमें जमेका के साथ ब्रिटेन द्वारा किए गए अत्याचारों के न्याय स्वरूप हर्जाना मांगा जाएगा. इसके बारे में बताते हुए ओलिविया ने रॉयटर्स से कहा-

हमारे अफ्रीकी पूर्वजों को जबरन उनके घर, उनकी ज़मीन से हटाया गया. ब्रिटिश साम्राज्य के फ़ायदे के लिए हमारे पूर्वजों को ग़ुलाम बनाकर खटाया गया. उन्होंने अतुलनीय यातनाएं सहीं. ब्रिटेन को उन सबके एवज़ में हर्जाना देना ही चाहिए.

Olivia Grange
जमेका की खेल, युवा और संस्कृति मंत्री ओलिविया ग्रैन्ज़

कई लोग सोच सकते हैं कि क्या पिछली पीढ़ियों के किए अपराधों की सज़ा वर्तमान पीढ़ी को मिलनी चाहिए? मगर यहां एक बात ध्यान रखी जानी चाहिए. यूरोप के साम्राज्यवादी पावर्स ने देशों को ग़ुलाम बनाकर, लोगों को ग़ुलाम बनाकर बहुत मुनाफ़ा कमाया. इन अत्याचारों से उनकी तरक्की, उनका इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड होता रहा. उनका देश संपन्न होता रहा. उन देशों के मौजूदा वैभव में भी इस अतीत का बड़ा हाथ है. वहीं, ग़ुलाम बनाए कई देश अतीत में हुए उस अपराध के असर से आजतक नहीं उबर सके हैं. अतीत में हुई उस लूट का खामियाज़ा वो आज भी भुगत रहे हैं.

इसीलिए ज़रूरी है कि साम्राज्यवादी दौर और उसके असर पर ज़्यादा बात हो. इस विषय पर ज़्यादा जागरुकता फैले. ब्रिटेन हर्जाना देगा या नहीं, ये मुख्य मुद्दा नहीं है. यहां मायने रखता है जमेका का हर्जाना मांगना. ब्रिटेन हर्जाना न भी चुकाए, तब भी हर्जाना मांगकर जमेका जवाबदेही तो तय कर ही देगा. वो ब्रिटेन को आईना तो दिखा ही देगा. वैसे भी, साम्राज्यवादी ताकतों ने अतीत में जितने अपराध किए हैं, उनका न्याय तो बड़े से बड़ा हर्जाना चुकाकर भी नहीं हो सकता. हमने ख़ुद भी तो सदियों की ग़ुलामी झेली है. हम जमेका की तकलीफ़ अच्छी तरह समझ सकते हैं.


दुनियादारी: ‘स्लेव ट्रेड’ के बदले ब्रिटेन से भारी मुआवज़ा मांगने वाला है जमेका

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