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जब पाकिस्तान के 314 रन के पहाड़ को इंडिया ने बौना साबित कर दिया

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इंडिया पाकिस्तान की क्रिकेट के मैदान में हुई बेशुमार भिडंतों में कुछेक बहुत यादगार रही हैं. मैच की आख़िरी गेंद तक खिंचे बहुत से मुकाबले हुए हैं. दोनों मुल्कों के दर्शकों का अपना-अपना सेलिब्रेशन डे भी रहा है. कभी इंडिया वाले हावी रहे, तो कभी पाकिस्तानी बाज़ी मार ले गए. लेकिन ज़्यादातर रोमांचक मुकाबलों में लाइमलाइट में कोई बड़ा सितारा ही रहा है. फिर चाहे वो जावेद मियांदाद का आख़िरी गेंद पर मारा गया सिक्स हो, या वेंकटेश प्रसाद का स्लेजिंग झेलने के बाद अगली ही गेंद पर आमिर सोहेल का स्टंप उखाड़ना.

लेकिन एक खिलाड़ी ऐसा भी रहा है भारत का जिसने क्रिकेट खेलना शायद उस एक मैच के लिए ही सीखा था. दुनिया में आकर अगर उसे कुछ करना था, तो यही कि उस ख़ास दिन ढाका के नेशनल स्टेडियम में मौजूद रहना था. और करिश्मे का हिस्सा बनना था. वो खिलाड़ी था हृषिकेश कानिटकर.

हृषिकेश कानिटकर.
हृषिकेश कानिटकर.

21 साल हो गए. आज भी वो दिन, कानिटकर का वो शॉट, वो सेलिब्रेशन सबकुछ मुकम्मल तौर पर याद है.

सिल्वर जुबली इंडिपेंडेंस कप

1998 में बांग्लादेश की आज़ादी को 25 साल पूरे हो गए थे. इस वजह से बांग्लादेश में इंडिपेंडेंस कप का आयोजन किया गया. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की टीमें खेल रही थी. भारत ने अपने दोनों लीग मुकाबले जीते. पाकिस्तान और बांग्लादेश को हराया. पाकिस्तान ने भी बांग्लादेश को हराया. भारत-पाक दोनों फाइनल में पहुंचे. फाइनल सिर्फ एक मैच नहीं था. बेस्ट ऑफ़ थ्री का कांसेप्ट था. हर बढ़ते मैच के साथ रोमांच बढ़ता गया. पहला फाइनल भारत ने जीता. अब सिर्फ एक मैच जीतना था और कप भारत का. लेकिन हार माने वो पाकिस्तान कहां! दूसरा मैच उन्होंने जीत लिया. तीसरे फाइनल का रोमांच चरम पर जा पहुंचा.

18 जनवरी 1998 का वो दिन

मैच के पहले के दो दिन दोनों देशों की जनता से काटे नहीं कट रहे थे. जैसे कि अब हो रहा है. खैर. 18 जनवरी भी आई और ढाका के नेशनल स्टेडियम में महा-मुकाबला शुरू हुआ. भारत ने टॉस जीत कर फील्डिंग करने का फैसला किया. लेकिन बहुत जल्द साबित हो गया कि भारतीय कप्तान मुहम्मद अज़रुद्दीन ने गलत पंगा ले लिया है.

पाकिस्तान के बल्लेबाज़ों ने जी भर के कूटा

पाकिस्तान ने सधी हुई शुरुआत की. हालांकि ओपनर शहीद अफ्रीदी को भारत ने जल्दी ही पवेलियन भेज दिया था. यहां तक कि बारहवें ओवर में आमीर सोहेल को भी आउट कर दिया था. लेकिन इसके बाद भारतीय गेंदबाज़ी का बुरा समय शुरू हो गया. ओपनर सईद अनवर और एजाज़ अहमद की जोड़ी ने खूंटा गाड़ दिया. ना सिर्फ खूंटा गाड़ा, बल्कि भारत के बॉलर्स के बखिये उधेड़ कर रख दिए. 196 गेंदों में 230 रन की पार्टनरशिप कर डाली. दोनों ने शतक ठोक दिए. सईद अनवर ने 140 रन बनाए. एजाज़ अहमद ने 117. मैच ख़त्म होने तक पाकिस्तान ने स्कोर बोर्ड पर 314 रन टांग दिए थे. वो भी सिर्फ 48 ओवर में. ख़राब मौसम की वजह से दो ओवर की कटौती हुई थी.

सईद अनवर.
सईद अनवर.

भारत का जवाब

48 ओवर में 315 रन बनाना लगभग असंभव सा टार्गेट था उन दिनों. 300 का आंकड़ा मुश्किल ही पार होता था. 314 रनों को तब तक कोई भी टीम चेस नहीं कर पाई थी. भारत को कप हासिल करने के लिए वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना था. और भी सिर्फ 48 ओवर्स में.

भारत की सदाबहार जोड़ी सचिन और गांगुली ने आतिशी शुरुआत की. नौवें ओवर की शुरुआत में ही स्कोर 71 था, जो कि उस ज़माने के हिसाब से बहुत उम्दा था. सचिन उस वक़्त ज़बरदस्त फॉर्म में थे. उन्होंने ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करनी शुरू की. 25 गेंदों में  41 रन कूट डाले. लेकिन 26वीं गेंद को उड़ाने के चक्कर में आउट हो गए. उनके बाद आए रॉबिन सिंह. मेरे फेवरेट खिलाड़ी.

रॉबिन सिंह. भारत का एक विश्वसनीय ऑल राउंडर.
रॉबिन सिंह. भारत का एक विश्वसनीय ऑल राउंडर.

उन्होंने सौरव गांगुली के साथ मिल कर कमान संभाली. दोनों ने होश को कायम रखते हुए पूरे जोश में बल्लेबाज़ी की. 30 ओवर में 179 रन की साझेदारी की. रॉबिन के आउट होने के बाद भी गांगुली डटें रहे. जब तक वो क्रीज़ पर थे भारत की जीत तय नज़र आ रही थी. लेकिन….

भारत-पाक का मैच एकतरफ़ा अब होते हैं, तब नहीं होते थे

गांगुली आउट हो गए. टीम को अभी भी 41 रन चाहिए थे. गांगुली के बाद अजय जडेजा और ‘ठोको ताली’ भी कुछ ख़ास किए बगैर लौट आए. कप्तान अज़हर पहले ही आ चुके थे. थोड़ी सी फाईट नयन मोंगिया ने दिखाई, लेकिन वो भी रन आउट हो गए. 47 ओवर के बाद स्कोर था 7 विकेट पर 306 रन. जीतने के लिए आख़िरी ओवर में 9 रन बनाने थे. क्रीज़ पर जवागल श्रीनाथ थे और उनके साथ थे हृषिकेश कानिटकर. नया खिलाड़ी. वो खिलाड़ी जो करोड़ों लोगों के दिल में जगह बनाने जा रहा था.

कानिटकर की ज़िंदगी का याहू मोमेंट

आख़िरी ओवर पाकिस्तान के करिश्माई स्पिनर सकलेन मुश्ताक कर रहे थे. श्रीनाथ स्ट्राइक पर थे. वो हर एक गेंद पर आडा-तिरछा बल्ला चला रहे थे. एक-दो बार तो गेंद हवा में काफी ऊपर गई. लेकिन किस्मत अच्छी थी जो दो खिलाड़ियों के बीच टपकी. बहरहाल उनके हाथ फेंकने का फायदा ये हुआ कि इक्वेशन 2 गेंदों में 3 रन तक आ पहुंचा. याद रखिए कि ये उस ज़माने की बात है, जब रन-अ-बॉल आसान नहीं कठिन काम होता था. अब तो ट्वेंटी-ट्वेंटी के सदके 2 गेंद में 12 रन भी चाहिए हो, तो भी बल्लेबाज़ पैनिक में नहीं आता.

खैर. हृषिकेश कानिटकर स्ट्राइक पर आए. सकलेन ने गेंद फेंकी. कानिटकर ने घुटने को हल्का सा मोड़ते हुए ऑन साइड पर झन्नाटेदार शॉट मारा. पलक झपकते गेंद बाउंड्री लाइन से बाहर थी. मैदान में और पूरे हिंदुस्तान में ख़ुशी का विस्फोट सा हो गया. हम सब ख़ुशी के मारे जैसे बौरा गए थे. तीन घंटों तक सड़कों पर शोर मचाते घूमते रहे.

उस चौके के बाद कानिटकर भारत के घर-घर में पहचाने जाने लगे. आगे उनका क्रिकेटिंग करियर कुछ ख़ास नहीं रहा. थोड़े बहुत मैच खेलने के बाद वो गायब हो गए. लेकिन उस एक चौके की बदौलत आज भी उनका नाम हर भारतीय क्रिकेटप्रेमी को याद है. और जब-जब भी भारत-पाक के क्लोज मुकाबलों की बात चलेगी, उन्हें याद किया जाएगा.

फन फैक्ट

एक दिलचस्प बात ये कि उस मैच में पाकिस्तान के कप्तान राशिद लतीफ़ थे. वही राशीद लतीफ़ जो आज कल बेहद अभद्र भाषा में वीडियो बनाकर सहवाग को गरिया रहे हैं.

खैर, कल जो होना है वो देखा जाएगा. फिलहाल आप देखिए उस मैच के अंतिम 8 मिनट और रोमांच को फिर से जी लीजिए.


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