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मुखौटे बदलते हुए जारी है भारंगम

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सौजन्य से आयोजित 19वां भारत रंग महोत्सव यानी ‘भारंगम’ लगभग आधी राह तय कर चुका है. इस आधी राह का हासिल हैं ‘उत्तर रामचरितम्’, ‘पेबेट’, ‘चेखव-चाइका’ और ‘लॉरेटा’ जैसी शानदार प्रस्तुतियां.

भारंगम के 9वें रोज़ हिंदी सहित भारतीय और विदेशी भाषाओं में पांच नाटकों का मंचन किया गया.

राजकुमार रायकवार निर्देशित ‘पंचाली की शपथ’, अमिताभ दत्ता निर्देशित बांग्ला नाटक ‘तोमार आमी’, धार्मिक लाल पांड्या निर्देशित गुजराती नाटक ‘मानभट्ट आख्यान’, अदिति देसाई निर्देशित गुजराती नाटक ‘समुद्र मंथन’ और श्रीलंका से आए एस आई समराक्कोड्डी निर्देशित ‘लव एंड लाइफ’ ने सरकारी हिंदी में कहें तो 9वें रोज़ दर्शकों का मन मोह लिया.

खैर, बात करें ‘पंचाली की शपथ’ की तो यह राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्यम् भारती की तमिल भाषा में रची गई अमर कविता ‘पांचाली शपथम्’ का हिंदी नाट्यानुवाद है. इस प्रकार इसे काव्य-नाटक भी कह सकते हैं.

भारती ने अपनी इस कविता में पांचाली यानी द्रौपदी की तुलना भारत माता से, पांडवों की तुलना भारतीयों से, कौरवों की तुलना अंग्रेजों से और महाभारत के युद्ध की तुलना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से की है.

द्रौपदी को यहां उस भारतीय-स्त्री के रूपक में बांधा गया है जो गुलामी और रूढ़ियों में जकड़ी हुई है.

‘तोमार आमी’ साल 1945 में स्लोवेनिया में जन्मे जाने-माने नाटककार और उपन्यासकार इवाल्ड फिल्सर का लिखा नाटक है. यह नाटक किताबों के साथ जो इंसानी रिश्ता है उसे समझने का प्रयत्न करता है.

नाटक तोमार आमी का एक दृश्य
नाटक तोमार आमी का एक दृश्य

किताबों को अपनी जिंदगी का एक अहम हिस्सा मान कर उन्हें पढ़ते चले जाने का हासिल आखिर क्या है? क्या ये किताबें सारे संसार की अच्छाई और बुराई को समझने में मदद करती हैं? कहीं ये किताबें हमें वह तो नहीं बना देतीं जिसे किताबी-कीड़ा कहते हैं? क्या किताबों की दुनिया वास्तविक दुनिया से भिन्न है? ‘तोमार आमी’ ऐसे ही सवालों से जूझता है.

‘मानभट्ट आख्यान’ से आशय है एक ऐसी किस्सागोई जिसमें अतीत के तथ्य या पुराने साहित्य के प्रकरण एक व्यक्ति या कई व्यक्तियों के समूह के सौजन्य से सुनाए जाते हैं. यह सुनाना बहुत काव्यात्मक होता है.

मान तांबे से बना एक बर्तन है. कहते हैं कि पहले यह मिट्टी से बनता था. भट्ट यानी किस्सा सुनानेवाले अपनी दसों उंगलियों में ‘वेद’ नाम की अंगूठियां धारण करते हैं और खुद मौखिक रूप से दिए जाने वाले ब्योरों की मधुर ध्वनियां रचने के लिए एक लय में मान का वादन करते हैं. ध्वनि की तीव्रता और तान का वर्णन विषय और वस्तु के अनुसार बदलता रहता है. अभिनय भी इसमें एक जरूरी तत्व रहता ही है, जैसे उसके बगैर सारे किस्से अधूरे ही हों.

गुजराती भाषा के प्राचीन कवि नरसिंह मेहता ने इस तरह आख्यान कहने की परंपरा की शुरुआत की थी.

गुजराती में ही गुरुवार की दूसरी प्रस्तुति थी ‘समुद्र मंथन’. देवकी भरत दवे के लिखे इस नाटक को गुजरात के खरवा समुदाय पर लिखा गया एकमात्र नाटक माना जाता है.

नाटक समुद्र मंथन का एक दृश्य
नाटक समुद्र मंथन का एक दृश्य

इस नाटक में गुजरात के कच्छ के मांडवी इलाके की एक सच्ची कहानी है, जहां एक खरवा महिला नाविक काबी, साल 1940 में एक जहाज कैप्टन बनी. यह एक ऐसा तथ्य है जिसे भुला दिया गया है. इस भुला दिए गए तथ्य को याद करते हुए यह नाटक स्त्री-विमर्श के उजाले में स्त्रियों से जुड़े सवालों का सामना करता है.

भारंगम के 9वें रोज़ की आखिरी प्रस्तुति थी श्रीलंका से आई ‘लव एंड लाइफ’.

नाटक लव एंड लाइफ का एक दृश्य
नाटक लव एंड लाइफ का एक दृश्य

‘लव एंड लाइफ’ बगैर शब्दों की एक प्रयोगशील प्रस्तुति रही. मुखौटों का इस्तेमाल बहुत प्रमुखता से करते हुए 15 किरदारों के लिए 15 मुखौटे इसमें नजर आते हैं. नाटक का सब्जेक्ट बाप-बेटे का प्यार है. डेढ़ घंटे की अवधि के इस नाटक में 3 अभिनेता 15 किरदारों को मंच पर उतारते हैं. ये लगभग 35 बार अपने मुखौटे बदलते हैं.

भारंगम भी रोज़ नाटकों और नई-नई गतिविधियों के जरिए अपने मुखौटे बदल रहा है.

बने रहिए…

***

19वें भारंगम से जुड़ी बाकी रपटें यहां पढ़ें :

मनोज बाजपेयी ने क्या जवाब दिया जब किसी ने पूछा, एनएसडी के गेट से भगा देते हैं एक्टर कैसे बनूं!
…और यों ‘लॉरेटा’ से प्यार हो जाता है
तुम्हें अच्छे अभिनेताओं की जरूरत है बहारुल
सब कुछ होना बचा हुआ है
‘मोहे पिया’ और नवाज के रंग से रंगारंग हुआ भारंगम
‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में गोलियां चला कर बुरे दिनों की भड़ास निकाली: नवाजुद्दीन
आखिर ये सीटें अब तक खाली क्यों हैं भाई?

‘प्रजा प्रिया हो, प्रिया प्रजा हो’ के संदेश के साथ शुरू हुआ 19वां भारंगम

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