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'हर प्रयास में जब पन्ने फटते रहे तो मैंने हरेक पन्ने को पूरे कमरे में फैला दिया'

सत्य37 बरस के चन्दन पांडेय मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया से हैं. काज-धाज को लेकर बेंगलुरु में रहते हैं. इनके नाम भूलना, इश्क़फ़रेब और जंक्शन जैसी किताबें हैं. इनकी नई किताब आई है- वैधानिक गल्प. इसी उपन्यास का एक छोटा अंश पढ़िए.


डायरी का पहला अंश पढ़ कर मिजाज कसैला हो गया. संविदा शिक्षकों के ऐसे हालात पर क्या कभी उन्होंने गौर किया होगा जिन्होंने एड-हाव्किज्म बनाया. आश्चर्य इसका भी हुआ कि संविदा पर रहते हुए खुराकपुर्सी से अलग रंगमंच के लिए समर्पित हो पाना भी एक बड़ा काम रहा होगा. कितना तटस्थ रहना होता होगा, मन में जीवन के प्यारे पक्षों को लेकर, उन्हें संजोने को लेकर, कुछ कर गुजरने की इच्छा जैसी कितनी मीनारें खड़ी होंगी.

आख़िरी हिस्से को पढ़कर हैरत इस बात की हुई कि नोमा जैसे कस्बेनुमा शहर में रहते हुए, एड-हॉक की नौकरी करते हुए, बिना किसी शोर-ओ-गुल के यह बन्दा युन फोस्से के नाटकों को न सिर्फ पढ़ रहा है, बल्कि उन्हें छात्रों के साथ मिलकर मंचित भी कर रहा है.

रफीक से मिलना, उस धुनी मनुष्य को देख सकना, अब अपना व्यक्तिगत उद्देश्य होता जा रहा था. लगा कि जिस ख़ास समय में रफीक को मेरी जरुरत थी, या कम से कम जो मुझे लग रहा था, उसी समय में रफीक किसी जादू की तरह मेरी जिन्दगी के अनसुलझे प्रश्नों का जवाब बन कर आता दिख रहा था.

जब कोई पन्ना खुलता नहीं दिखा और हर प्रयास में कागज़ फटते ही रहे तब मैंने निर्णय लिया कि हरेक पन्ने को एक एक पूरे कमरे में फैला दिया जाए. शुरुआत मैंने आलमारी से की. लकड़ी की उस आलमारी में तीन खाने थे. नीचे वाला खाना बड़ा था लेकिन उसका बड़ा होना मेरे किसी मशरफ का नहीं था. मुझे सतह पर ही कागजों को फैलाना था. कागजों के फैलाने के साथ मन के भीतर बेचैनी का एक गूमड़ उमड़ता जा रहा था. फैलाने के क्रम में एकाध अक्षर या एक दो कोई शब्द रौशनी की तरह चमक जाते लेकिन मुझे उन्हें समूचेपन में पढ़ना था.

आलमारी के निचले खाने की सतह पर छ: पन्ने ही पसर सके. इस तरह करीब बीस पन्नों के सुखाने का इंतजाम इस आलमारी के जरिए हो सकता था. उपरी खाने में कागजों को फैलाते हुए वह चार हैंगर दिखे, जिनमें से दो पर मेरे कपड़े थे. उन कपड़ों को बिस्तर पर डाल दिया और उन चार हैंगर पर रजिस्टर के तीन तीन पन्ने, एक के ऊपर एक, टांग दिए. पंखे की हवा में वह पन्ने फड़फड़ा रहे थे. पंख की तरह या किसी भी अन्य की तरह नहीं. अपनी तरह. जैसे कागज़ फड़फड़ाते हैं. यह उनके सूखने का या सूखते चले जाने का शुरुआती लक्षण भी हो सकता था.

इसी क्रम में दूसरी नोटबुक तथा दोनों डायरियों के पन्नों को कमरे के फर्श, वाशरूम के बेसिन तक पसार दिया था. फिर भी जब बहुत सारे पन्ने बचे रह गए तब उन्हें बिस्तर पर, अपने सोने भर की जगह छोड़ कर, पसार दिया. बिस्तर पर एक के ऊपर एक यानी दो पन्ने तरउपरिया फैलाए थे.

लेकिन पन्ने खत्म होने का नाम नहीं ले रहे थे.

अपनी कमीज और पतलून को एक तरफ खिड़की और दूसरी तरफ पलंग के सिरहाने से बाँध कर अलगनी बनाया और बाकी बचे सारे पन्ने उस पर फैला दिए.

पूरा कमरा अक्षरों से, शब्दों से, वाक्यों से, उनके अर्थों से और सबसे बड़ी बात कि रफीक के होने और न होने की संभावना से पटा पड़ा था. यह थका देने वाली कवायद करीबन आधे पौना घंटे तक चली होगी इसलिए खत्म करते ही बिस्तर पर मैं खुद भी पसर गया. और यह सोच कर डर गया कि थोड़ी देर पहले मैं जिन शब्दों में रफीक के गायब होने की संभावनाओं को तलाश रहा था, कहीं मैं भी उनमें से तो एक नहीं था.

इन शब्दों के बीच पड़े पड़े मैं भी एक शब्द सा खुद को प्रतीत होने लगा था. वह शब्द गुमशुदा, लापता, गायब, खो जाना, बिला जाना कुछ भी हो सकता था लेकिन इनमें से कुछ भी नहीं था. मेरा मन इन संज्ञाओं को रफीक पर आरोपित करने के लिए तैयार नहीं हो पा रहा था. गुमशुदा लोगों के लिए इतने विज्ञापन दिख जाते हैं लेकिन आज से पहले कभी यह ख्याल नहीं आया कि मनुष्य पर इन संज्ञाओं को निरुपित करना अमानवीय है. मसलन वस्तुओं के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले क्रूर शब्द मनुष्यों पर कितने खराब लग सकते हैं, यह बात समझ में आ रही थी और नहीं भी आ रही थी. मनुष्य की गरिमा को साबुत रखने के लिए कहना चाहिए कि रफीक घर नहीं लौटा है. इस वाक्यांश में उम्मीद का सूरज है जो संभव है उगा न हो, लेकिन है. इस पृथ्वी पर मनुष्य को इतनी आजादी होनी चाहिए कि वह चाहे जब घर लौट आए. पत्नी की आँखों में ही हो, पति पत्नी के अरमान में ही हो लेकिन लौटने के लिए एक घर होना चाहिए. इस सुखद ख्याल से कि रफीक के पास लौटने के लिए लोग हैं, घर है, नींद ने मुझे हर तरफ से घेर लिया.


किताब का नाम – वैधानिक गल्प

लेखक – चन्दन पाण्‍डेय

प्रकाशन –  राजकमल प्रकाशन

पेज संख्या – 142

कीमत – 144/- रुपये


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