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क्या असम जाने से पहले हर किसी को सरकार से परमिशन लेनी होगी?

‘एक विधान, एक निशान और एक प्रधान’ वाले भारत में नागरिकता किसे मिले, इसे लेकर हर कोई अपनी-अपनी लकीर पीटने में लगा है. इसका अंदाज़ा हर किसी को था कि नागरिकता संशोधन कानून के आते ही पूर्वोत्तर में विरोध प्रदर्शन होंगे. लेकिन उनकी तीव्रता का अंदाज़ा शायद सरकार को नहीं था. पूर्वोत्तर में भी सबसे ऊंची आवाज़ में विरोध किया असम ने, जहां एनआरसी आ चुका है. प्रधानमंत्री के दो-दो कार्यक्रम गुवाहाटी में नहीं हो पाए, क्योंकि प्रशासन सबकुछ ठीक रहने की गारंटी देने की स्थिति में ही नहीं था. अब केंद्र ने असम को शांत कराने की नई तरकीब निकाली है. हम असम शांति समझौते के क्लाज़ 6 की बात कर रहे हैं. रिपोर्ट तैयार है और एक हफ्ते के भीतर केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंपी जा सकती है.

पूर्वोत्तर में नागरिकता कानून का विरोध

केंद्र ने नागरिकता संशोधन कानून को बनाते हुए अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिज़ोरम को पूरी तरह CAA से बाहर रखा. इसके अलावा मेघालय, असम और त्रिपुरा के 6th schedule वाले इलाकों को भी CAA से बाहर रखा गया. भारतीय संविधान के 6th schedule में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के अनुसूचित जनजाति वाले इलाकों के लिए अलग प्रशासनिक नियम हैं. इसके तहत, ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल्स (ADC) बनाए गए. इन ADC को राज्य विधानसभा के अंतर्गत कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं. CAA में इन इलाकों को अलग रखा गया.

संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ असम में काफी तीव्र विरोध हुआ है. (File Photo)
संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ असम में काफी तीव्र विरोध हुआ है. (File Photo)

नियम बनाया गया कि CAA के अंतर्गत जिन शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी, उन्हें ADC वाले इलाकों में ज़मीन खरीदने का अधिकार नहीं होगा. वो इन इलाकों में नहीं बस सकेंगे. उन्हें वो सुविधाएं और अधिकार भी नहीं मिलेंगे, जो ख़ास तौर पर आदिवासियों को दी गई हैं. इसके अलावा, संविधान का 6th schedule, ACD को जो अधिकार देता है, वो CAA से ख़त्म नहीं होंगे और न ही इसका प्रभाव ACD के बनाए क़ानूनों पर ही पड़ेगा.

ADC के अलावा सरकार ने ‘इनर लाइन परमिट’ (ILP) इलाकों को भी छूट दी. अरुणाचल, नागालैंड (दीमापुर को छोड़कर) और मिज़ोरम में ILP की व्यवस्था है. इसे बंगाल इस्टर्न फ्रंटियर रेग्युलेशन ऐक्ट (BEFR) 1873 के तहत जारी किया जाता है. इसकी शुरुआत अंग्रेजों के जमाने से हुई थी. अंग्रेजों ने अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए ये व्यवस्था बनाई थी. देश की आजादी के बाद भी ये इनर लाइन परमिट लागू रहा, लेकिन वजह बदल गई.

इनर लाइन परमिट भारत सरकार की ओर से भारत के ही लोगों को दिया जाने वाला एक तरह का वीजा है.
इनर लाइन परमिट भारत सरकार की ओर से भारत के ही लोगों को दिया जाने वाला एक तरह का वीजा है.

भारत सरकार के मुताबिक, आदिवासियों की सुरक्षा के लिए ये ‘इनर लाइन परमिट’ जारी किया जाता है. बाहर वाले हमेशा के लिए यहां बस नहीं सकते, चाहें वो भारतीय नागरिक हों. आप कितने दिनों के लिए जा रहे हैं, कहां-कहां जा रहे हैं, ILP लेने के लिए ये सारी चीजें डिक्लेयर करनी होती हैं.

ILP को पूर्वोत्तर में ''बाहरियों'' के अतिक्रमण रोकने के हथियार की तरह देखा जाता है.
ILP को पूर्वोत्तर में ”बाहरियों” के अतिक्रमण रोकने के हथियार की तरह देखा जाता है.

आसान भाषा में कहें, तो इनर लाइन परमिट भारत सरकार की ओर से भारत के ही लोगों को दिया जाने वाला एक तरह का वीजा है. ये भी दो तरह का होता है. पहला है टूरिस्ट इनर लाइन परमिट और दूसरा है जॉब्स इनर लाइन परमिट. टूरिस्ट परमिट कम वक्त के लिए ही होता है, जबकि जॉब्स परमिट लंबे वक्त के लिए मिलता है.

ILP को पूर्वोत्तर में ‘बाहरियों’ का अतिक्रमण रोकने के हथियार की तरह देखा जाता है. हाल के वक्त में ILP को CAA की काट की तरह देखा जा रहा है.

11 दिसंबर, 2019 को खबर आई थी कि सरकार पूर्वोत्तर के दूसरे हिस्सों में भी ILP लागू कर रही है. लेकिन इस सब के बावजूद पूर्वोत्तर में प्रदर्शन नहीं रुके. देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री लंबे वक्त तक प्रदर्शनों के चलते पूर्वोत्तर जा ही नहीं पाए. अब सरकार ने पूर्वोत्तर को शांत करने के लिए एक और कदम उठाया है. गृह मंत्रालय ने जस्टिस बिप्लब शर्मा (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में 13 सदस्यों की एक कमेटी बनाई थी, जिसे असम अकॉर्ड के क्लॉज़ 6 को लागू करने पर अपनी रिपोर्ट देनी थी.

असम आंदोलन के बाद केंद्र, असम सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन AASU के बीच एक समझौता हुआ था. इसे कहते हैं असम अकॉर्ड या असम शांति समझौता. इसका क्लाज़ 6 असमिया लोगों की संस्कृति, सामाजिक और भाषाई पहचान और विरासत को बचाने और आगे बढ़ाने की बात करता है. अकॉर्ड के तहत सरकार को इसके लिए विधायी और प्रशासनिक उपाय करने हैं.

असम अकॉर्ड राजीव गांधी के पीएम रहते हुआ था. (File Photo)
असम अकॉर्ड राजीव गांधी के पीएम रहते हुआ था. (File Photo)

पिछले दिनों पीएम मोदी जब बोडो शांति समझौते के बाद पहली बार कोकराझार गए थे, तब उन्होंने क्लाज़ 6 कमेटी की रिपोर्ट आते ही उस पर अमल करने की बात की थी.

क्या कहा है कमेटी ने?

कमेटी ने असम में ILP लागू करने का सुझाव दिया गया है. कमेटी का तर्क है कि ILP से सूबे में ‘बाहरियों’ का बेरोक-टोक आना-जाना रुकेगा. परमिट कमेटी का दिया अकेला सुझाव नहीं है. साल 1951 तक असम में आए लोगों को यहां का ‘Indigenous’ या ‘मूल रहवासी’ मानने की सिफारिश भी की गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, 1951 से असम में रहते आए लोगों के सभी वंशजों को मूल रहवासी माना जाएगा. इसमें जाति, धर्म, भाषा या समाज का भेद नहीं होगा.

असम देश का अकेला राज्य है, जहां NRC बना है. इस कवायद में भी कटऑफ डेट को लेकर अच्छा-खासा विवाद रहा है. अब असम में एक नई कटऑफ डेट आने जा रही है. ये कटऑफ डेट भी विवाद जन सकती है. क्यों? क्योंकि कमेटी का सुझाव है कि असम की 67 फीसदी लोकसभा और विधानसभा सीटें इन मूल रहवासियों के लिए आरक्षित रहें. कमेटी के कुछ सदस्यों ने तो यहां तक कहा कि विधानसभा में ये आरक्षण 100 फीसदी हो.

असम में सीएए पर विरोध के चलते सरकार बैकफुट पर है.
असम में सीएए पर विरोध के चलते सरकार बैकफुट पर है.

एक और बात है. 67 फीसदी आरक्षण पहले से मिले आरक्षण से अलग होगा. माने अनुसूचित जाति-जनजाति को दिया गया 16 फीसदी आरक्षण बना रहेगा. तो कुल आरक्षण हो जाएगा 80 फीसद के पार, जो कि सुप्रीम कोर्ट में और याचिकाओं को मौका दे सकता है. सरकारी नौकरियों में भी असम के रहवासियों को 80 फीसदी आरक्षण देने की बात की गई है.

क्लॉज़ 6 पर अमल करना असम के प्रति केंद्र का उत्तरदायित्व है. लेकिन अगर असम में NRC के अनुभव से सरकार कुछ भी सीखी है, तो वो ये जानती होगी कि क्लॉज़ 6 कमेटी के सुझाव लागू करने के लिए उसे अच्छा खासा परिश्रण करना पड़ेगा. रही बात नागरिकता की बहस पर इन सुझावों के असर की, तो उसके लिए इस रिपोर्ट के विधिवत पेश होने का इंतज़ार कर लीजिए. असम में जनता अपनी राय सरकार तक पहुंचाने में कभी कोतही नहीं करती है.


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