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इंदिरा के वक्त के लोगों से जब नसबंदी के बारे में पूछो, तो ये जवाब मिलता था

डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता हैं. लोक में खास दिलचस्पी है, जो आपको यहां देखने को मिलेगी. अमरेंद्र हर हफ्ते हमसे और आपसे रू-ब-रू हो रहे हैं. ‘देहातनामा’ के जरिए. पेश है इसकी पांचवीं किस्त:


ये जून महीने का वही आख़िरी सप्ताह है, जिसे 1975 में हमारा देश आपातकाल के पहले सप्ताह के रूप में भोग रहा था. इसी महीने की 26 तारीख़ को इमरजेंसी लगे 42 साल पूरे हुए. इस घटना का असर इतना अधिक है कि वर्तमान में जब भी सरकार मनमानी, दमन और ‘सेंसर’ के कारनामे दिखाती है, लोग आपातकाल के दिनों को याद करने लगते हैं. हम लोगों से पहले की, 70 के दशक वाली और उससे भी पहले की पीढ़ी ने आपातकाल के दिन देखे हैं. लेकिन, हमने तो जो जाना है, सुन-पढ़कर ही जाना है.

गांवों में मैंने इमरजेंसी से अधिक ‘नसबंदी’ की चर्चाएं सुनी हैं. वैसे तो खास घटना के संदर्भ में ये दोनों एक-दूसरे से इतना अलग-अलग भी नहीं हैं. जब उमर कम थी, तो एक बार एक सज्जन से पूछ बैठा कि ये क्या होता है, नसबंदी? वे थोड़ा मजाक-मारू आदमी थे. सनकार कर हिहियाते हुए बोले, ‘फलां की अम्मा से पूछो, फलां के बप्पा से पूछो.’

लेकिन मैं इतना भी भोला न था. जानता था कि वे जो सनकार रहे हैं, उसमें कुछ पेंच तो जरूर है. जब बड़ा हुआ, तो समझ में आया कि जिन फलां-फलां से पूछने को वे कह रहे थे, दरअसल वे बेचारे इमरजेंसी के भुक्तभोगी थे.

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जून वही महीना है, जिसमें किसान धान की नर्सरी डाल चुके होते हैं. बरसात हो गई, तो बढ़िया मौका है अरहर बोने के लिए. नई फसल की योजना मन-ही-मन बनने लगती है. इसी बीच दिल्ली से खबर आती है कि देश में आपातकाल लगा दिया गया है. घोषणा, 26 जून की सुबह आठ बजे. रेडियो से. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज़, ‘राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा कर दी है. इसमें घबराने की कोई बात नहीं है.’

लेकिन, ये घबराने की बात साबित हुई. कुछ लोग दौड़े कि अखबार में देखा जाए कि क्या खबर है, लेकिन अखबार ही नहीं मिले. 25 जून की रात में ही सारी तैयारी हो गई थी. अखबार के दफ्तरों की बिजली रातों-रात काट दी गई थी. अखबार ले जाने वाली गाड़ियां पुलिसवालों ने रोक दी थीं. अखबार न आने देना भी आपातकाली तैयारी का हिस्सा था. सहज सूचना-प्रवाह ठप्प हो गया था.

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इमरजेंसी क्यों, इसका कोई संतोषजनक और निश्चित उत्तर किसी के पास नहीं. कोई जानना चाहे, तो कोई तरीका भी नहीं. अब जितने मुंह उतनी बातें. कोई कहता पड़ोसी देश ने हमला कर दिया है शायद.. कोई सुरक्षा को लेकर उठाया कदम मानता. कोई कहता कि सरकार की मनमानी है. सरकार अपने विरोधियों को बर्दाश्त नहीं कर पा रही, उन्हें निपटाने में लगी है. सरकार के विरोध की खबरें पिछले कई महीनों से आ ही रही थीं.

अवध के स्थानीय अखबार ‘जनमोर्चा’ को लोगों का पर्याप्त विश्वास हासिल था. गांव में एक समर्पित जनमोर्चा पाठक थे, नाम ही पड़ गया था, जनमोर्चा काका. आपातकाल लगते ही जनमोर्चा ने इसी जन-विश्वसनीयता की कीमत चुकाई. पहले से भी ये अखबार उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की आंख की किरकिरी बना हुआ था. आपातकाल इस अखबार पर वज्रपात की तरह गिरा. इसके लखनऊ संस्करण पर ताला लगा दिया गया. वहां काम कर रहे लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. जनमोर्चा का लखनऊ संस्करण, सांध्य संस्करण होता था. 26 जून की सुबह ही कार्रवाई हो गई. सांझ से अखबार आना बंद हो गया.

इसी अखबार का दूसरा संस्करण था, फैजाबाद संस्करण. इस संस्करण ने काफी तेजी दिखाई. ये सांध्य का नहीं था, सुबह का संस्करण था. सरकारी कार्रवाई की देरी का लाभ उठाते हुए इस अखबार ने जल्दी-जल्दी खबरों को संकलित करने का काम कर लिया और ‘सेंसर’ की कार्रवाई से पहले ही 27 जून का अखबार अपने ‘फ्लेवर’ को कायम रखते हुए प्रकाशित कर दिया. मुश्किलें तमाम आईं, लेकिन स्थानीय जनता देर-सबेर खबरों से जुड़ सकी. बहुत जल्द ही सरकार की ‘सेंसर’ नीति सभी अखबारों पर लागू हो गई. अब जो खबर जानी होती, वो सेंसर से पास होकर ही आगे बढ़ पाती.

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जब बहुत से अखबार समझौते कर रहे थे और लाभ लेने की हालत में पहुंच रहे थे, तब भी कुछ अखबारों ने अपने को मौकापरस्त नहीं बनने दिया. जनमोर्चा ऐसा ही अखबार था. इसके संपादक शीतला सिंह ने तय कर रखा था कि वो ‘सेंसर’ के मुताबिक खबर रोक भले दें, लेकिन सेंसर की बात छापने या सेंसर के कहे मुताबिक लिखने का काम हरगिज नहीं करेंगे. ये वही कशमकश है, जिसके नतीजे में अखबारों के संपादकीय पृष्ठ खाली ही जाते थे. इमरजेंसी के वक्त जनमोर्चा ने धारा के उलट जो पत्रकारिता की, उस पर अलग से काम होना चाहिए.

कांग्रेस पार्टी और सरकार में संजय गांधी की काफी चलती थी. पार्टी के युवा वर्ग की ताकत उनके साथ थी. संजय गांधी के पांच-सूत्री कार्यक्रम को इंदिरा का समर्थन प्राप्त था. ये पांच सूत्र थे:- वयस्क शिक्षा, वृक्षारोपण, दहेज-प्रथा खात्मा, परिवार नियोजन और जाति-उन्मूलन. संजय ने आपातकाल के दौरान अनेक ऊधमबानी कारनामे दिखाए. सौंदर्यीकरण के नाम पर तुर्कमान गेट की झुग्गियों को बलात् हटवा देने की चर्चा आज तक होती है. नसबंदी उनका ऐसा परिवार नियोजनी ऊधम था, जिसने जनता के बीच से कांग्रेस की विदाई का रास्ता लगभग तैयार कर दिया.

इंदिरा गांधी के साथ संजय गांधी
इंदिरा गांधी के साथ संजय गांधी

आपातकाल में सामान्य ग्राम्य-जीवन अपनी चाल चल रहा था. वहां अभी ज्यादा विक्षोभ नहीं आया था. लोगों की राय मिली-जुली थी. इंदिरा को लेकर आकर्षण का भाव भी था. 1971 में भारत की विश्व-राजनीतिक कामयाबी से लोगों में उनकी सकारात्मक और ‘बोल्ड’ छवि बन गई थी. आपातकाल में सरकारी कामकाज समय से होने लगा था. घूसखोरी, मिलावट नहीं होती थी. बसें, रेलगाड़ियां समय पर चलती थीं. धोखाधड़ी नहीं थी. इससे सामान्य जन थोड़ी राहत भी महसूस कर रहा था.

संत विनोबा ने इसी सब से प्रभावित होकर इमरजेंसी को ‘अनुशासन पर्व’ तक कह दिया था. हां, उन पढ़े-लिखे लोगों के लिए दिक्कत कहीं से कम नहीं थी, जो लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण देख रहे थे. अभिव्यक्ति की आजादी पर हर जगह अंकुश था. ये उनके लिए स्याह समय था.

लेकिन नसबंदी के कदम ने उन सकारात्मक बातों को मिट्टी में मिला दिया, जिनको लोग थोड़ी राहत की तरह महसूस कर रहे थे. नसबंदी से ग्राम्य-जीवन में व्यापक अफरा-तफरी मच गई. इंदिरा की निंदा में अब सबके मुंह खुलने लगे. जिन्हें मजबूत इरादों के चलते पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दुर्गा कहा था, अब वो अपना दलनकारी संहारक अवतार ले चुकी थीं.

अटल बिहारी वाजपेयी
अटल बिहारी वाजपेयी

ग्रामीणों ने उनको नया नाम दे दिया था, आपात-काली! साक्षात् खप्पर लिए रक्त बटोरते-पीते. मुंड-माला-धारी! 1974 में बाबा नागार्जुन ने कविता लिखी थी ‘बाघिन’:

चबा चुकी है ताजे शिशु मुंडों को गिन-गिन,
गुर्राती है टीले पर बैठी है बाघिन!

और फिर, सालभर बाद नाम लेकर बाबा ने पूछा, ‘इंदिरा जी, इंदिरा जी, क्या हुआ है आपको / बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को?’

वो दौर गांववालों को दहशत के दौर की तरह याद आता है, जिसमें नसबंदी अभियान चल रहा था. नसबंदी के लिए सारी सरकारी मशीनरी तैनात कर दी गई थी. अधिकारियों के लिए कोटे निर्धारित कर दिए गए थे कि इतनी नसबंदियां ये अफसर कराएगा, इतनी वो. कोटा पूरा करने के लिए अधिकारियों ने क्या-क्या नहीं किया. नई उम्र के युवाओं से लेकर बच्चे पैदा करने में अक्षम वृद्धों तक की नसबंदी कर दी गई. मंदबुद्धि, अविवाहितों तक को नहीं छोड़ा गया. कोटा पूरा करना था!

गांव में नसबंदी करवाने के लिए अधिकारी आते, तो गांववाले भर-भर भर-भर भागते. पुलिस भेजी जाती उन्हें पकड़कर लाने के लिए. जो हत्थे चढ़ जाते, वो नसबंदी के लिए राजी किए जाते. सीधे मानें तो ठीक, वरना दरेरा देकर. सन्पाते लोग घर छोड़कर खेत-खलिहान में होना बेहतर समझते. बाहर पड़े रहते. लोगों ने अपने यहां काम करने वाले हरवाहों-चरवाहों को बहला-फुसलाकर उनकी नसबंदी करा दी, कोटा पूरा करवाने के लिए. लूले-लंगड़े-कोढ़ी भी कोटा पूरने के काम आए. हजारों लोग तो इस नसबंदी अभियान में जान से हाथ धो बैठे.

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नसबंदी के लिए अलग-अलग प्रलोभन भी दिए जाते. कभी जमीन का, कभी अर्थ का, कभी नौकरी का. जो सेवा-क्षेत्र में थे, उन्हें भी नसबंदी कराने पर जोर डाला गया. इस दौरान एक चीज़ और हुई. वो है फर्जी नसबंदियां. डॉक्टरों ने बहुत गोपनीय तरीके से मोटी रकम लेकर कुछ लोगों को नसबंदी के सर्टिफिकेट दे दिए. लेकिन ऐसा चतुर लोगों ने ज्यादा किया. सामान्य और गांव-गिरांव के लोग असल नसबंदी के शिकार हुए. जिन लोगों ने अपनी नहीं करवाई, अपनी पत्नी की करवा दी. ये ऐसा कदम था, जिसके खिलाफ सब थे.

आपातकाल के दौर में महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक गांव में ‘फील्ड वर्क’ कर रहे Lee I. Schlesinger ने अपने लंबे लेख The Emergency in an Indian Village में लिखा है, ‘साल के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में पुरुष नसबंदी अभियान ने ग्राम्य-जीवन में बड़े व्यवधान पैदा किए. तब गांववाले मूंगफली की खेती को निपटाने में लगे थे, संकर फसल ज्वार-बाजरा की तैयारी कर रहे थे, रवी की फसल के लिए खेत बना रहे थे और अपने सबसे बड़े व खर्चीले त्यौहार दीवाली की प्रतीक्षा कर रहे थे. इस महत्वपूर्ण समय में कृषि क्षेत्र से एक किसान की अनुपस्थिति उस पर निर्भर कई दूसरों के कार्यों को प्रभावित करता. भले वो दिहाड़ी मजदूर हो या जुताई-बोवाई ‘टीम’ का हिस्सा हो. परिवार नियोजन अत्यधिक तबाही वाला अभियान था. जब ये लागू हुआ, तबाही मची.’ यही सच्चाई दूसरे गांवों की भी थी.

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आपातकाल में जेलें भरी हुई थीं. विरोध में खड़े हुए बड़े नेताओं (लोकनायक जय प्रकाश, राजनारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडिस आदि) को बहुत पहले ही जेल पहुंचा दिया गया था. आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) के तहत जो सरकार के विरोध में चूं भी करता, जेल में डाल दिया जाता. कांग्रेस के छोटे से कार्यकर्ता का भी रुतबा इतना बढ़ा हुआ था कि उसकी चापलूसी बड़ा अधिकारी करता था. अपराधियों को भी सख्ती से जेल में वहीं पहुंचाया गया, जहां लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज उठाने वालों को ठूंसा गया था. उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने आपातकाल के दौरान जेल में बंद लोगों को ‘लोकतंत्र रक्षक सेनानी’ के रूप में पेंशन देना शुरू किया, तो इसका लाभ इलाके के कुछ चोरों और गुंडों को भी मिल रहा है, जो उस दौरान मीसा के तहत जेल में डाल दिए गए थे.

अचानक 1977 की 18वीं जनवरी को इंदिरा गांधी ने घोषणा की कि मार्च में चुनाव कराया जाएगा. विरोध मे सभी नेताओं ने चुनाव में इकट्ठा होने का फैसला किया. कह सकते हैं कि जेल में ही जनता पार्टी का जन्म हुआ. मार्च में हुए चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी. जनता पार्टी की सरकार बनी. 24 मार्च 1977 को मोरार जी के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार अस्तित्व में आई. जेल में बंद लोग आजाद हुए. जनता में खुशी की लहर दौड़ गई. कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था, ‘गाय-बछड़ा’.

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लोकगीतों में आपात-काली कांग्रेस की पराजय को गाया गया:

‘गैया बछड़वा सब गइलैं पराई
संजय रोवैं माई-माई हो, नेतन कै एलनवा!
पीएम मोरार जी देसाई भइलैं हो, नेतन कै एलनवा!’


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