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टेक कंपनियों की वो बड़ी गलती जिसने AI का गुब्बारा फोड़ दिया, क्यों वापस बढ़ रही है इंसानी राइटर्स की मांग?

AI Impact: क्या टेक कंपनियों का एआई से मोहभंग हो गया है! क्या ChatGPT के दौर में अब Human Writers की वापसी होगी? जानिए गार्टनर की रिपोर्ट और इंडस्ट्री के Tech कंपनियों के ताजा हालात क्या हैं.

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ChatGPT के दौर में अब 'ह्यूमन राइटर्स' की चांदी होने वाली है? (फोटो- AI)

पिछले दो साल का हाल याद है. हर तरफ बस एक ही शोर था. AI आ गया है, AI नौकरी खा जाएगा, एआई सब कुछ कर लेगा. बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों ने अपने दफ्तरों में इंसानी दिमागों को थैंक्यू बोलकर बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया. लगा कि बस, अब दुनिया बदल गई है. बिना किसी लागत के, सेकंडों में कंटेंट, कोडिंग और स्ट्रैटेजी बनाने वाली मशीनें आ गई हैं. दफ्तरों की मीटिंग्स में बस यही बात होती थी कि कंटेंट राइटर की क्या जरूरत है, जब चैटजीपीटी (ChatGPT ) बैठा है. 

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लेकिन अब दो साल बाद, माहौल बदल रहा है. हवा का रुख पलट चुका है और जो कंपनियां कल तक एआई के नशे में धुत थीं, आज वो अपनी गलती सुधारने के लिए वापस इंसानों की तलाश कर रही हैं.

यह कोई हवा-हवाई बात नहीं है. आज का बिजनेस डेटा गवाही दे रहा है कि एआई के अंधाधुंध इस्तेमाल ने कंपनियों की कमर तोड़ दी है. गूगल की रैंकिंग (Google Ranking) गिर गई है. कंज्यूमर का भरोसा उठ गया है. लोग अब एआई द्वारा जनरेट किए गए नीरस, बेजान और दोहराव वाले कंटेंट से ऊब चुके हैं. 

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बेंगलुरु के स्टार्टअप्स से लेकर नोएडा की आईटी कंपनियों तक, अब एआई के बजट को कम करने और इंसानों को वापस हायर करने की रणनीतिक बैठकें हो रही हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ कि 'एआई क्रांति' का गुब्बारा इतनी जल्दी फूट गया. आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं.

AI का गुब्बारा क्यों फूटा, Data क्या कह रहा है

गार्टनर (Gartner) की इस हफ्ते आई एक ग्लोबल टेक फोरकास्ट रिपोर्ट ने पूरी इंडस्ट्री में हड़कंप मचा दिया है. रिपोर्ट साफ कहती है कि अब कंपनियां 'जनरेटिव एआई' (GenAI) पर खर्च करने से कतरा रही हैं. क्यों? क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि एआई का इस्तेमाल जितना सस्ता दिखता था, वो उतना ही महंगा पड़ रहा है. एआई सिस्टम से जो कंटेंट निकल रहा है, उसमें सटीकता यानी एक्यूरेसी बहुत कम है. इसका सीधा असर कंपनियों की गूगल सर्च रैंकिंग पर पड़ रहा है.

गार्टनर की रिपोर्ट (Gartner Forecasts Worldwide GenAI Spending to Reach $644 Billion in 2025) यह स्पष्ट करती है कि भले ही वैश्विक स्तर पर एआई पर होने वाला खर्च 2026 तक 2.59 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 216 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंचने का अनुमान है. लेकिन यह निवेश मुख्य रूप से बड़े टेक वेंडर्स और हाइपरस्केलर्स तक सीमित है, न कि आम व्यावसायिक कंपनियों तक.

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इस डेटा का विश्लेषण करने से साफ पता चलता है कि कंपनियां अब एआई पर होने वाले खर्च को लेकर 'अंधाधुंध' रवैया छोड़कर कहीं अधिक 'रणनीतिक' हो गई हैं, क्योंकि वे अब केवल प्रयोगों पर भरोसा करने के बजाय एआई को लेकर बहुत सतर्क और व्यावहारिक रुख अपना रही हैं.

गूगल का एल्गोरिदम आज के समय में बहुत स्मार्ट हो गया है. उसे समझ आ जाता है कि कौन सा कंटेंट इंसान ने दिल और दिमाग से लिखा है और कौन सा किसी मशीन ने उगल दिया है. एआई कंटेंट में अक्सर वो गहराई नहीं होती, वो इमोशन नहीं होता, जिसे पढ़कर यूजर वेबसाइट पर रुकता है. जब यूजर कंटेंट पढ़कर तुरंत वापस चला जाता है, तो बाउंस रेट बढ़ जाता है और गूगल साइट की रैंकिंग गिरा देता है. यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे कंपनियां अब समझ रही हैं.

बेंगलुरु और नोएडा की कंपनियों में मची खलबली

बेंगलुरु और नोएडा में जो कंपनियां पिछले कुछ समय से 'ह्यूमन-फ्री' मॉडल पर चल रही थीं, वहां का माहौल अब तनावपूर्ण है. कई स्टार्टअप्स ने पिछले महीनों में अपनी कंटेंट और मार्केटिंग टीम को पूरी तरह से एआई पर शिफ्ट कर दिया था. लेकिन नतीजा क्या निकला? सेल्स गिर गई. ब्रांड की वैल्यू कम हो गई. अब इन कंपनियों के मैनेजमेंट को एहसास हो गया है कि एआई एक अच्छा असिस्टेंट तो हो सकता है, लेकिन वह 'राइटर' की जगह नहीं ले सकता.

आजकल इन टेक हब में जो मीटिंग्स हो रही हैं, उनका एजेंडा एआई नहीं, बल्कि 'क्वालिटी कंट्रोल' है. कंपनियां अब उन लोगों को ढूंढ रही हैं जो एआई टूल्स का इस्तेमाल करके उसे 'इंसानी टच' दे सकें. यानी एआई को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा रहा, लेकिन उसे लगाम दी जा रही है. अब इंसान बॉस है और एआई नौकर. पहले एआई को मालिक बना दिया गया था, यही सबसे बड़ी गलती थी.

AI के जरिए ईजाद की जाने वाली तकनीक के पेटेंट में भी अब दिक्कत आने लगी है. AI एक्सपर्ट डॉ गौरव संथालिया बताते हैं,

पहले जिन पेटेंट आवेदनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जाती थी, उनमें बस "AI की मदद से तैयार" लिख देना काफी होता था. मगर अब ऐसे पेटेंस आवेदनों में विस्तार से बताना पड़ेगा कि पेटेंट के लिए AI को क्या कमांड दिा गया और उसके लिए जरूरी बैकएंड डेटा या जानकारी का ओरिजनल सोर्स क्या है.

डॉ संथालिया इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए कहते हैं,

एक बड़ा सवाल ये है कि AI की मदद से अगर कोई आविष्कार किया जाता है तो उसका पेटेंट किसे मिलेगा. वो कंपनी जिसने एआई की मदद से आविष्कार किया है या फिर वो शख्स या कंपनी, जिसने उस AI को बनाया है.

मतलब Google Gemini का इस्तेमाल करके बुलंदशहर के शर्मा जी ने कोई दवा का फॉर्मूला ईजाद किया और पेटेंट ले उड़े सुंदर पिचाई.

क्या एआई सच में फेल हो गया है

इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है. डिजिटल मार्केटिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि एआई का इस्तेमाल एक 'शॉर्टकट' की तरह किया गया, जो कभी सस्टेनेबल नहीं था. टेक सलाहकार और कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट, विक्रम सिंह कहते हैं, 

एआई में जानकारी तो है, लेकिन उसमें विवेक (Judgment) नहीं है. कंटेंट राइटिंग का मतलब सिर्फ शब्दों को जोड़ना नहीं है, बल्कि एक कहानी कहना है. एआई डेटा तो दे सकता है, लेकिन वो अनुभव नहीं ला सकता जो एक इंसान के पास होता है. पिछले दो साल में कंपनियों ने जो एआई का अंधाधुंध प्रयोग किया, उसका खामियाजा उन्हें गिरती हुई वेब ट्रैफिक और कम होते कन्वर्जन रेट के रूप में भुगतना पड़ा है. अब दौर 'ह्यूमन-एडेड एआई' का है, ना कि 'एआई-ओनली' का.
 

नोएडा की एक बड़ी आईटी कंपनी में एचआर हेड के तौरपर काम कर रहे नवीन जैन बताते हैं,

हमने पिछले साल बहुत से राइटर्स को निकाला था. आज मुझे उन्हें वापस फोन करना पड़ रहा है. कारण साफ है. एआई टूल्स से हम बल्क में कंटेंट तो बना लेते हैं, लेकिन उसमें कोई दम नहीं होता. क्लाइंट्स अब डिमांड कर रहे हैं कि उन्हें वह कंटेंट चाहिए जो किसी इंसान के दिमाग की उपज हो. हम अब एआई का बजट कम कर रहे हैं और टैलेंट एक्विजिशन पर निवेश बढ़ा रहे हैं.

क्या अब राइटर की चांदी होने वाली है

यह सवाल बहुत जरूरी है. क्या वाकई राइटर की नौकरी सुरक्षित है? देखिए, दुनिया पूरी तरह वापस पीछे नहीं जाएगी. एआई कहीं नहीं जा रहा है. वह एक पावरफुल टूल है. लेकिन अब बदलाव यह आएगा कि जो राइटर सिर्फ टाइपिंग या बेसिक रिसर्च करते थे, उन्हें अपनी स्किल्स बदलनी होंगी.

अब कंपनियों को ऐसे लोगों की जरूरत है जो एआई का इस्तेमाल करके उसे एडिट कर सकें, उसे बेहतर बना सकें, उसमें अपना नजरिया जोड़ सकें. यानी अब 'प्योर राइटर' से ज्यादा 'एडिटर' और 'स्ट्रेटजिस्ट' की मांग बढ़ेगी. जो लोग एआई के डर से खुद को अपडेट नहीं कर रहे थे, अब उनके लिए समय आ गया है कि वे एआई को अपना हथियार बनाएं.

भारत के मिडिल क्लास के लिए खबर के मायने

भारत के लिए यह एक बड़ा मौका है. हम दुनिया के सबसे बड़े टैलेंट पूल में से एक हैं. हमारी एजुकेशन सिस्टम में भाषा और कला पर काफी जोर दिया जाता है. एआई के इस पतन से यह साफ हो गया है कि क्रिएटिविटी का कोई विकल्प नहीं है.

मिडिल क्लास परिवार जो अपनी नौकरी को लेकर डरे हुए थे, उन्हें यह समझना चाहिए कि तकनीक बदलती है, लेकिन काम का तरीका बदल जाता है. अब वे लोग आगे रहेंगे जो एआई को मैनेज करना जानते हैं.

सरकार की तरफ से भी 'डिजिटल इंडिया' मिशन के तहत ऐसे स्किलिंग प्रोग्राम्स पर जोर दिया जा रहा है जो एआई के साथ-साथ ह्यूमन-सेंट्रिक एप्रोच सिखाएं. आने वाले समय में पॉलिसी मेकर्स भी यह देखेंगे कि कैसे एआई का इस्तेमाल एथिकल और प्रभावी हो.

भविष्य की तस्वीर: अब क्या होगा

आने वाले समय में, हम एक हाइब्रिड मॉडल देखेंगे. बड़ी कंपनियां अब यह तय करेंगी कि कौन सा कंटेंट एआई बना सकता है (जैसे रूटीन अपडेट्स, डेटा टेबल) और कौन सा कंटेंट इंसान को ही लिखना होगा (जैसे ओपिनियन पीस, ब्रांड स्टोरीटेलिंग, एनालिटिक्स).

कुल मिलाकर कहें तो एआई का भविष्य 'सर्च' में नहीं, बल्कि 'सपोर्ट' में है. कंपनियां अब एआई टूल्स पर अंधाधुंध पैसा नहीं बहाएंगी. गार्टनर की रिपोर्ट इसी बदलाव की ओर इशारा कर रही है. यह एक तरह से इंडस्ट्री का 'करेक्शन' है. जो कंपनियां इस करेक्शन को जल्दी समझ लेंगी, वही रेस में आगे रहेंगी.

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क्या गुब्बारा फूट गया?

तो क्या चैटजीपीटी ने एआई का गुब्बारा फोड़ दिया? नहीं, चैटजीपीटी ने नहीं, बल्कि कंपनियों की लालच और शॉर्टकट अपनाने की आदत ने यह गुब्बारा फोड़ा है. एआई खुद में बुरा नहीं है, उसका इस्तेमाल करने का तरीका बुरा था. अब वक्त आ गया है कि हम वापस लौटें और यह स्वीकार करें कि इंसान के पास वह 'स्पार्क' है जिसे कोई एल्गोरिदम कभी नहीं पकड़ पाएगा.

अगर आप राइटर हैं, तो डरिए मत. बस अपनी स्किल्स को अपग्रेड कीजिए. अब एआई के साथ मुकाबला नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाकर काम करने वालों का दौर है.

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