गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही हर कोई कहीं न कहीं घूमने का प्लान बनाने लगता है. एक राज्य से दूसरे राज्य जाने की तैयारी होती है. कोई फ्लाइट की टिकट देख रहा है, कोई ट्रेन की सीट बुक कर रहा है, तो कोई होटल के चक्कर काट रहा है. लेकिन क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि स्क्रीन पर टिकट का दाम 4000 रुपये दिख रहा हो, और जैसे ही आप सारी डिटेल भरकर पेमेंट वाले आखिरी पेज पर पहुंचे, तो वो दाम चुपके से बढ़कर 5500 रुपये हो गया?
4000 की टिकट के लिए देना पड़ता है 5500, क्या है वो डार्क पैटर्न जिससे लग रहा आपको फटका?
ऑनलाइन टिकट बुक कराते समय क्या आपके साथ ऐसा हुआ है कि जब शुरू किया था तो टिकट 4000 रुपये का था. मगर जब पेमेंट की बारी आई तो चुकाने पड़े 5500 रुपये. जानिए कंपनियों का वो डार्क पैटर्न जो आपकी जेब काट रहा है.


कमाल है ना भाई! भोला-भाला आम आदमी सोचता है कि शायद उसने ही कोई टैक्स जोड़ने में गलती कर दी होगी, या इंटरनेट का कोई चार्ज बढ़ गया होगा. लेकिन ये कोई गलती नहीं है, बल्कि आपके साथ ऑनलाइन किया गया एक बहुत बड़ा खेला है बॉस. इंटरनेट दुनिया में इसे 'डार्क पैटर्न' यानी भ्रामक डिजिटल हथकंडा कहा जाता है. ये वो चोर रास्ता है जिसके जरिए ई-कॉमर्स कंपनियां और ट्रेवल पोर्टल्स आपकी मर्जी के बिना चुपचाप आपकी जेब से पैसे निकाल लेते हैं.
ऐसा है ना गुरु कि वैसे तो ‘उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय’ (Minister for Consumer Affairs, Food & Public Distribution) ने इस डार्क पैटर्न को पूरी तरह से बैन किया हुआ है. लेकिन इसके बाद भी कंपनियां नए-नए पैंतरे आजमाकर धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल कर रही हैं. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण यानी CCPA ने ई-कॉमर्स और ट्रेवल पोर्टल्स के खिलाफ 'भ्रामक और जबरन शुल्क' वसूलने को लेकर जो सख्त एडवाइजरी जारी की थी, उसके अनुपालन की समीक्षा इस महीने से शुरू हो रही है. आइए, आज के इस एक्सप्लेनर में डिकोड करते हैं कि ये कंपनियां हमारी आंखों के सामने कैसे हमारी जेबों पर डाका डालती हैं.
क्या होता है ये डार्क पैटर्न और कैसे कंपनियां बनती हैं शातिर चोर?
डार्क पैटर्न का सीधा सा मतलब है डिजिटल दुनिया की वो चालाकी, जो यूजर को ऐसा काम करने के लिए मजबूर कर दे जो वो असल में करना ही नहीं चाहता. इसे ऐसे समझिए कि आप सिर्फ एक फ्लाइट टिकट बुक करने गए थे. कंपनियों की वेबसाइट का डिजाइन ऐसा होता है कि वो आपको बिना बताए कई तरह के एक्स्ट्रा चार्ज आपके बिल में जोड़ देती हैं.
ऑनलाइन सारे कॉलम भरते हुए जैसे ही आप आखिरी स्क्रीन पर पहुंचेंगे, आपको पता चलेगा कि वहां 'सीट सिलेक्शन फीस', 'कन्वीनियंस फीस' और 'कंपलसरी इंश्योरेंस' जैसी चीजें पहले से ही टिकमार्क की हुई हैं. कई बार तो 'फ्री कैंसिलेशन' के नाम पर जबरन कुछ रुपये जोड़ दिए जाते हैं.
अगर आप बहुत ध्यान से एक-एक चीज को अनचेक नहीं करेंगे, तो वो एक्स्ट्रा पैसा आपके फाइनल अमाउंट में जुड़ जाएगा और पेमेंट होते ही आपकी जेब कट जाएगी. कंपनियां जानती हैं कि आखिरी मोमेंट पर यूजर टिकट कैंसिल होने के डर से या जल्दबाजी में उस बढ़े हुए दाम को बिना सोचे-समझें पे (Pay) कर देता है. इसी मजबूरी का फायदा ये कंपनियां उठाती हैं.
कंपनियों की तीन बड़ी चालाकियां
अब आप सोच रहे होंगे कि भाई आखिर ये कंपनियां किस तरह के हथकंडे अपनाती हैं? तो गुरु, इनके तीन सबसे बड़े और फेमस तरीके हैं जिन्हें आज हम रीयल स्क्रीनशॉट्स के उदाहरण से डिकोड करने जा रहे हैं.
पहला तरीका बास्केट स्नीकिंग है: ये वो चालाकी है जहां आपके शॉपिंग कार्ट में बिना पूछे कोई सर्विस जोड़ दी जाती है. जैसे ही आप ट्रेवल पोर्टल पर टिकट बुक करेंगे, आखिरी पेज पर चुपचाप 199 रुपये का ट्रैवल इंश्योरेंस या चैरिटी डोनेशन अपने आप जुड़ जाता है. इसका बटन इतना छोटा या छुपा हुआ होता है कि आम यूजर की नजर ही नहीं पड़ती.

दूसरा तरीका जबरन विकल्प है: कई बार वेबसाइट्स ऐसी स्क्रीन सामने लाती हैं जहां आपको 'नो' कहने का सीधा रास्ता ही नहीं मिलता. जैसे सीट चुनते समय हर सीट पर कोई न कोई चार्ज लिखा होता है. अगर आप बिना सीट चुने आगे बढ़ना चाहें, तो स्क्रीन पर लाल रंग का पॉप-अप आ जाएगा कि 'सीट चुनना जरूरी है', जबकि सरकारी गाइडलाइन के मुताबिक बिना चार्ज वाली फ्री सीटें देना कंपनियों की जिम्मेदारी है.

तीसरा तरीका छिपे हुए दाम का खेल है: शुरुआत में आपको टिकट का दाम बेहद सस्ता दिखाया जाएगा ताकि आप लालच में आकर उस पर क्लिक कर दें. लेकिन जैसे ही आप अपना नाम, मोबाइल नंबर और बाकी डिटेल भरकर पेमेंट गेटवे पर पहुंचेंगे, वहां अचानक 400 से 500 रुपये की कन्वीनियंस फीस जोड़ दी जाएगी. ये वो दाम होते हैं जो शुरू में जानबूझकर छुपाए जाते हैं.

सरकार की सख्ती और आपकी जागरूकता ही असली इलाज
इस पूरी लूटपाट को रोकने के लिए सरकार ने नियम तो कड़े कर दिए हैं, लेकिन कंपनियों की चालाकी कम नहीं हो रही है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की गाइडलाइंस के मुताबिक किसी भी यूजर को इस तरह के हिडन चार्ज देने के लिए मजबूर करना पूरी तरह गैर-कानूनी है.
अगर आज से शुरू हो रही सीसीपीए की समीक्षा में कोई भी ट्रेवल पोर्टल या ई-कॉमर्स वेबसाइट इन नियमों का उल्लंघन करती हुई पाई गई, तो उन पर भारी-भरकम जुर्माना लग सकता है. लेकिन कंपनियों के सुधरने के भरोसे बैठने से अच्छा है कि हम खुद अपनी आंखें खुली रखें.
जब भी कोई ऑनलाइन बुकिंग करें, तो आखिरी पेमेंट पेज पर कम से कम दो मिनट का समय जरूर दें. एक-एक लाइन को ध्यान से पढ़ें कि कहीं कोई एक्स्ट्रा चार्ज चुपके से तो नहीं जोड़ दिया गया है. अगर ऐसा कुछ दिखे, तो उसे तुरंत अनचेक करें. अगर कोई कंपनी जबरदस्ती पैसे वसूलती है, तो आप नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन पर इसकी सीधी शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं. वक्त आ गया है कि इन डिजिटल ठगों की चालाकियों को समझा जाए ताकि हमारी मेहनत की कमाई इस तरह के हवाई किलों की भेंट न चढ़े.
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