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चीन अपनी 'दैत्याकार' खुदाई मशीनें कंट्रोल कर भारत के बनते काम बिगाड़ पाएगा?

चीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा और 'दोहरे उपयोग' (नागरिक और सैन्य दोनों उपयोग) का हवाला देते हुए टनल बोरिंग मशीनों, वॉकिंग एक्सेलेटर और पठारी क्षेत्र की नम शॉटक्रीट मशीनों पर नए निर्यात नियंत्रण लागू किए हैं. यह व्यवस्था 18 नवंबर, 2026 से प्रभावी हो रही है.

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बुलेट ट्रेन और मेट्रो प्रोजेक्ट्स पर मंडराया संकट?

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  • चीन ने 18 नवंबर 2026 से टनल बोरिंग मशीनों सहित भारी निर्माण उपकरणों पर सख्त निर्यात नियंत्रण नियम लागू करने की घोषणा की है, जिससे भारत को इन मशीनों की सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
  • चीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा और दोहरे उपयोग को आधार बनाकर टनल बोरिंग मशीन जैसे उपकरणों पर निर्यात प्रतिबंध लगाए हैं, जिनका भारत के कई बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स में व्यापक उपयोग होता है।
  • भारत ने घरेलू स्तर पर टनल बोरर बनाने के प्रयास तेज कर दिए हैं और इसमें लार्सन एंड टुब्रो समेत अन्य कंपनियां प्रोटोटाइप विकसित कर रही हैं ताकि चीन पर निर्भरता कम की जा सके।

अगर किसी दिन आपको खबर मिले कि अटल टनल या अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन जैसा कोई बड़ा प्रोजेक्ट होल्ड पर चला गया है तो उसके पीछे ‘चीन की साजिश’ हो सकती है. अगर भारत में कोई बड़ी परियोजना इसलिए होल्ड पर चली जाए क्योंकि सुरंग खोदने वाली मशीनें उपलब्ध न हों तो इसके पीछे भी पड़ोसी चीन का हाथ हो सकता है. ऐसा हम कोई हेडलाइन मैनेज करने के लिए नहीं कह रहे. ऐसा वाकई हो सकता है. चीन भारत में टनल-डिकर्स (सुरंग खोदने वाली मशीनों) की सप्लाई में खेल कर सकता है.

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चीन ने किया क्या है?

चीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा और 'दोहरे उपयोग' (नागरिक और सैन्य दोनों उपयोग) का हवाला देते हुए टनल बोरिंग मशीनों (TBM), वॉकिंग एक्सेलेटर और पठारी क्षेत्र की नम शॉटक्रीट मशीनों को लेकर नए निर्यात नियंत्रण नियम लागू किए हैं. यह व्यवस्था 18 नवंबर, 2026 से प्रभावी हो रही है. इसके तहत एक सख्त लाइसेंसिंग सिस्टम लागू किया गया है. इस महीने के अंत से लागू होने जा रहे इन नए प्रतिबंधों का भारत पर एक अलग ही तरह का असर पड़ सकता है.

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भारत पर क्या असर होगा?

बीजिंग के नए निर्यात कंट्रोल रूल्स का मुख्य निशाना बड़े निर्माण उपकरण हैं. इनमें टनल-बोरिंग मशीनें शामिल हैं, जिनका उपयोग सबवे (मेट्रो) बनाने या पहाड़ों को काटकर सड़कें और रेलवे ट्रैक बिछाने के लिए किया जाता है. बताने की जरूरत नहीं कि वैश्विक बाजार में चीन का दबदबा है और भारत उसके मुख्य ग्राहकों में से एक है. चीनी स्टेट मीडिया के अनुसार, इस उद्योग में चीन की वैश्विक हिस्सेदारी लगभग 70% है. उनके चाइना रेलवे इंजीनियरिंग इक्विपमेंट ग्रुप का कहना है कि उसके उपकरणों का उपयोग डेनमार्क और फ्रांस सहित 36 देशों में किया जाता है.

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के विशेष निर्माण उपकरणों पर सरकारी कंट्रोल कुछ बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को धीमा कर सकता है. इनमें भारत की हिमालयी सीमा के पास रणनीतिक निर्माण भी शामिल है. चीन ने अतीत में सुरंग खोदने वाले उपकरणों के मुख्य निर्यातक के रूप में अपनी ताकत दिखाई है. 2024 में उसने जर्मनी की कंपनी हेरेनक्नेक्ट एजी (Herrenknecht AG), जो चीन में अपनी कुछ बोरिंग मशीनों का निर्माण करती है, के कामकाज को स्लो कर दिया था. ये वही कंपनी है जो अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन और दिल्ली मेट्रो जैसी परियोजनाओं के लिए भारत को ये मशीनें बेचने वाली थी.

China 5000Ton Digging Machines Could Hit India Infrastructure Push
Herrenknecht की टनल बोरिंग मशीन (तस्वीर साभार: Herrenknecht)
चीन को किस बात की चिंता है?

दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले दोनों देशों के बीच हिमालयी सीमा लंबे समय से तनाव का केंद्र रही है. हाल ही में वहां फिर तनाव देखने को मिला था. भारत इस क्षेत्र में रेलवे लाइनें और सड़कें बना रहा है, ताकि सैनिकों की तैनाती के समय को कम किया जा सके. जाहिर है इसके लिए उन्हें भारी संख्या में सुरंगों की आवश्यकता होगी.

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यूक्रेन और ईरान के युद्धों ने भूमिगत सुविधाओं (underground facilities) के बढ़ते सैन्य महत्व को उजागर कर दिया है. रिपोर्ट में बीजिंग स्थित सिंघुआ यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंटरनेशनल सिक्योरिटी एंड स्ट्रेटजी के फेलो सुन चेंगहाओ (Sun Chenghao) कहते हैं, “चीन के लिए मुख्य चिंता यह है कि चीनी इंजीनियरिंग क्षमताओं का उपयोग कहां किया जाता है और क्या वे किसी अन्य देश के सैन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत कर सकते हैं.”

भारत क्या कर सकता है?

नई दिल्ली स्थित ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि किसी भी "प्राथमिकता वाली परियोजना" के लिए भारत अन्य साइटों से उपकरण स्थानांतरित कर सकता है. माने देश में जहां पहले से ऐसी मशीनें हैं, वहां से मंगा ली जाएं. लेकिन यहां भी एक पेच है.

चीन के नए प्रतिबंध पुर्जों (components) पर भी तो लागू होते हैं. अजय श्रीवास्तव ने कहा, "जब इन मशीनों में भारी टूट-फूट होती है, तो हमें पुर्जों की नियमित आपूर्ति की आवश्यकता होती है." 

यानी चीनी कंट्रोल से नई मशीनों की खरीद के साथ-साथ मौजूदा मशीनों के स्टॉक पर भी असर पड़ेगा.

हेरेनक्नेक्ट के अलावा, अमेरिका और जापान में अन्य निर्माता भी हैं जो संभावित विकल्प तैयार कर सकते हैं. रिपोर्ट में हेरेनक्नेक्ट के एक प्रवक्ता ने कहा कि फर्म चीनी प्रतिबंधों का बारीकी से अध्ययन कर रही है. लंबे समय में, चीन के ये प्रतिबंध इन कंपनियों के लिए भारत में प्रोडक्शन का दरवाजा खोल सकते हैं. हालांकि फिलहाल ग्राहकों के लिए चीनी सप्लाई से तुरंत नाता तोड़ना मुश्किल है.

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि भारत का लक्ष्य अगले पांच सालों में सुरंग निर्माण पर 9.6 अरब डॉलर तक का निवेश करना है और उन्होंने स्थानीय उद्योग से बोरिंग मशीनें खुद बनाने का आग्रह किया है. खबरों के अनुसार सरकार निर्माण उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए 1.2 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना पर विचार कर रही है.

लार्सन एंड टुब्रो की तैयारी

मुंबई स्थित इंजीनियरिंग दिग्गज लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड के अध्यक्ष आर. शंकर रमन ने कहा कि उनकी कंपनी एक प्रोटोटाइप टनल-बोरर बना रही है. अगर उनका प्रयोग सफल साबित होता है तो कंपनी खुद की मशीनरी तैयार कर सकती है और दूसरों को भी बेच सकती है. लेकिन चूंकि भारत इसके शुरुआती चरण में है और चीन इसे बड़े और एडवांस पैमाने पर कर रहा है, इसलिए कीमत के मामले में मुकाबला करना फिलहाल नामुमकिन है. उन्होंने कहा, "अगर लोग अभी भी चीनी कीमत से तुलना करेंगे और चीन से आयात करने के रास्ते तलाशेंगे, तो भारत घाटे में रहेगा".

'अर्जुन' भी है लक्ष्य भेदने के लिए

भारत को पता है कि चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आएगा. इसलिए MEIL ने जर्मनी की कंपनी Herrenknecht के साथ मिलकर टनल बोरिंग मशीन 'अर्जुना' को चेन्नई फ़ैक्टरी में बनाया है. ये विशालकाय मशीन MMRDA प्रोजेक्ट के तहत मुंबई में ज़मीन के नीचे सड़क सुरंगें बनाने के लिए बनाई गई है. 

China 5000Ton Digging Machines Could Hit India Infrastructure Push
अर्जुन को MMRDA प्रोजेक्ट के तहत मुंबई में ज़मीन के नीचे सड़क सुरंगें बनाने के लिए बनाया गया है 

चलो इसी बहाने सुरंगों से चीनी कम होगी. अंग्रेजी में इसे blessing in disguise कहवे हैं. 

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