चेक बाउंस और उसके बाद तहत कानूनी डिमांड नोटिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने केरल हाई कोर्ट का फैसला पलट दिया. हाई कोर्ट ने एक मामले में ड्रॉअर (चेक जारी करने वाले) की सजा को रद्द कर दिया था. इसका आधार दिया था कि कानूनी डिमांड नोटिस व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि उसकी मां को मिला था. वह ड्रॉअर की ओर से दिए गए पते पर रहती हैं.
चेक बाउंस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, 'नोटिस सही पते पर पहुंचा, देना होगा पूरा पैसा'
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (30 सितंबर) को SAINABA VERSUS STATE OF KERALA & ANR केस में कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) के तहत कानूनी डिमांड नोटिस को सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं माना जा सकता कि वह ड्रॉअर (चेक जारी करने वाले) के परिवार के किसी सदस्य को मिला था, जबकि नोटिस ड्रॉअर के सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (30 सितंबर) को यह फैसला पलट दिया. कोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) के तहत कानूनी डिमांड नोटिस को सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं माना जा सकता. नोटिस ड्रॉअर के परिवार के किसी सदस्य को मिला था. इस आधार पर सजा रद्द नहीं की जा सकती है. ध्यान देने की बात है कि नोटिस ड्रॉअर के सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया था.
3 लाख रुपये के लोन का मामलाLive Law की रिपोर्ट के मुताबिक, SAINABA VERSUS STATE OF KERALA & ANR केस में मामला NI Act की धारा 138 के तहत एक शिकायत से जुड़ा है. यह अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी नंबर 2 को दिए गए 3 लाख रुपये के लोन से संबंधित था. प्रतिवादी द्वारा जारी किया गया चेक बाउंस हो गया. इसके बाद शिकायतकर्ता ने 31 अगस्त 2016 को प्रतिवादी के सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से कानूनी डिमांड नोटिस भेजा. ये नोटिस उनकी मां अमीना ने रिसीव किया. इसके बाद भी प्रतिवादी ने नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया और ना लोन चुकाया.
ट्रायल कोर्ट ने 10 जुलाई 2019 को उसे दोषी ठहराया और छह महीने की साधारण कैद और 3 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई. आगे अपीलीय अदालत ने भी 16 फरवरी, 2023 को Conviction को बरकरार रखा. लेकिन मामले में दिलचस्प मोड तब आया जब केरल हाई कोर्ट ने CrPC की धारा 397 के तहत अपने रिविजनल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए दोषसिद्धि रद्द की. कोर्ट ने माना कि धारा 138 के प्रोविज़ो (b) के तहत कानूनी जरूरत का पालन नहीं किया गया था. इसकी वजह नोटिस प्रतिवादी (Respondent) को खुद मिलने के बजाय उसकी मां को मिलने का आधार बताया गया.
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सुप्रीम कोर्ट ने पलटा फैसलाकेरल हाई कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर शिकायतकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. अपील मंजूरी करते हुए जस्टिस मनमोहन के फैसले को दोहराया गया. इसमें कहा गया कि एक बार कानूनी अनुमान (Statutory Presumption) लागू हो जाने के बाद, शिकायतकर्ता के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि ड्रॉअर को असल में नोटिस मिला था. या शिकायतकर्ता ने जान-बूझकर नोटिस लेने से इनकार किया.
कोर्ट के अनुसार,
कानून के तहत शिकायतकर्ता को ड्रॉअर के सही पते पर नोटिस भेजना होता है. शिकायतकर्ता के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण नोटिस मिलने के अनुमान (Presumption of Service) को गलत नहीं ठहराया जा सकता है.
कोर्ट ने कहा,
"सही पते पर नोटिस भेजे जाने के बाद 'नोटिस देने' की ज़रूरत पूरी हो जाती है. इसके बाद ड्रॉअर की ज़िम्मेदारी है कि वह इस धारणा को गलत साबित करे. ड्रॉअर को साबित करना होगा कि उसे अपने पते पर नोटिस आने की कोई जानकारी नहीं थी. या नोटिस सही पते पर नहीं भेजा गया. या पोस्टल एंडोर्समेंट गलत है."
कोर्ट ने पाया कि ऐसे ठोस सबूत मौजूद हैं, जिनसे पता चलता है कि कानूनी नोटिस प्रतिवादी (Respondent) के सही पते पर भेजा गया. इसके बाद उसी पते पर भेजे गए समन के जवाब में प्रतिवादी कोर्ट में पेश हुआ. उसके वकालतनामा, अपील और रिविज़न याचिकाओं में भी वही पता लिखा था। इसके अलावा, धारा 313 CrPC के तहत अपने बयान में प्रतिवादी ने कभी भी पते की सही होने पर कोई सवाल नहीं उठाया. महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ऐसा कोई मामला नहीं है, जिससे यह पता चले कि प्रतिवादी और उसकी मां अलग-अलग रह रहे हैं. या उनके रिश्ते ऐसे हैं कि मां को नोटिस मिलने पर भी प्रतिवादी को उसकी जानकारी नहीं मिल पाती.
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि रेस्पॉन्डेंट उस धारणा को गलत साबित करने में नाकाम रहा, जो कानूनी डिमांड नोटिस के साथ जुड़ी होती है. खासकर तब जब नोटिस ड्रॉअर के सही पते पर भेजा गया हो. नतीजतन, अपील मंज़ूरी की गई और इस तरह रेस्पॉन्डेंट की सज़ा बहाल कर दी गई.
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