इंस्टाग्राम रील्स स्क्रॉल करते-करते कभी किसी ऐसी मॉडल पर नजर रुकी है जिसकी स्किन एकदम परफेक्ट हो. आंखें झील सी नीली हों और स्टाइल ऐसा कि बड़े-बड़े बॉलीवुड स्टार्स पानी कम चाय हो जाएं. उसे देखते ही आप लाइक ठोकते हैं. कमेंट में 'ब्यूटीफुल' लिखते हैं. और आगे बढ़ जाते हैं. कुछ लोग इसे फेवरेट में सेव भी कर लेते हैं, ताकि मन किया तो दोबारा लौट कर निहार लेंगे.
AI इन्फ्लुएंसर्स का नया दौर, जो इंसान हैं ही नहीं, वो हर महीने लाखों रुपये कमा रहे?
AI Influencers Making Money: इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर आजकल ऐसे मॉडल्स और इन्फ्लुएंसर्स की बाढ़ आ गई है जो असल में पैदा ही नहीं हुए. वे पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बनाए गए हैं. मिसाल के तौरपर मिकैला या फिर भारत की नैना. इस एआई इनफ्लूएंसर्स को बड़े-बड़े ब्रांड्स स्पॉन्सर भी कर रहे हैं.


अगर आप भी इन्हीं लोगों में से हैं तो ये ख़बर आपके लिए है. जिस सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर पर आप दिल हार रहे हैं, असल में इस दुनिया में उसका कोई वजूद ही नहीं है. वो न तो सांस लेते हैं. न खाना खाते हैं और न ही कभी बीमार पड़ते हैं. बिना लाग लपेट के कहें तो वो हाड़-मांस की इंसान ही नहीं हैं. बल्कि कंप्यूटर के बंद कमरों में कोड्स और प्रॉम्प्ट के जरिए पैदा की गई एक वर्चुअल परछाई हैं. जी हां, AI से बने इन्फ्लुएंसर.
वो क्या है ना गुरु, आज सोशल मीडिया पर इन एआई इन्फ्लुएंसर्स का ऐसा खौफनाक कब्जा हो चुका है कि देखकर असली क्रिएटर्स के भी होश फाख्ता हो जाते हैं. टेकक्रंच और वायर्ड जैसी बड़ी मैगजीन्स की ताजा केस स्टडीज देख लीजिए. या फिर आज के गूगल ट्रेंड्स का ग्राफ उठाकर देख लीजिए. सिर्फ मई 2026 के दौरान ही गूगल पर एआई इन्फ्लूएंसर्स सर्च कितना ट्रेंड कर रहा था, उसकी एक झलक इस ग्राफ में देख लीजिए.
Note: AI की मदद से तैयार ग्राफ, सोर्स- गूगल ट्रेंड
बात सिर्फ इतने पर ही रुक जाती तो भी ठीक था. येां तो ये एआई वाले इन्फ्लूएंसर्स, रियल इन्फ्लूएंर्स की रोजी-रोटी पर भी डाका डाल रहे हैं. एक वर्चुअल एआई मॉडल ने दुनिया के सबसे बड़े ब्रांड्स के साथ करोड़ो रुपये की एंडोर्समेंट डील साइन कर ली है. सोशल मीडिया की दुनिया में तहलका मचा दिया है. ‘जम्पफ्लाई’ की रिपोर्ट इस पर विस्तार से बात करती है.
चाहे मिकैला जैसी ग्लोबल मॉडल हो या फिर भारत की अपनी नैना. ये बिना पैदा हुए हर महीने लाखों-करोड़ों रुपये कूट रहे हैं. आइए, आज इस पूरी एआई इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलते हैं. आखिर ये धंधा कैसे चलता है.
कैसे काम करता है बिना इंसान वाला ये नोट छापने का बिजनेस?
हम तो कह रहे हैं कि ब्रांड्स के लिए ये घाटे का सौदा नहीं है. बल्कि सीधे-सीधे बंपर लॉटरी है. जरा सोचिए, एक असली मॉडल को शूट पर ले जाने के लिए कितने नखरे उठाने पड़ते हैं. फाइव स्टार होटल का खर्चा… मेकअप आर्टिस्ट की पूरी फौज… और महंगे कैमरे... न जाने क्या-क्या तामझाम करना पड़ता है. ऊपर से अगर मैडम या सर जी का मूड खराब हुआ या तबीयत बिगड़ी, तो लाखों का शूट बीच में ही ठप हो जाता है.
लेकिन एआई इन्फ्लुएंसर के मामले में ये सारा झंझट एकदम निल बटा सन्नाटा हो जाता है. इनके साथ नखरेबाजी का कोई चांस ही नहीं होता. एक बार कंप्यूटर पर सही प्रॉम्प्ट डाला और मॉडल पेरिस के एफिल टावर के सामने खड़ी होकर नए ब्रांड की ड्रेस का पोज दे देगी. अगले ही मिनट वो बिना किसी फ्लाइट टिकट के सीधे मालदीव के समंदर किनारे नजर आएगी. और हां AI इन्फ्लुएंसर Sick Leave भी नहीं लेते.
अब इन सबका नतीजा क्या निकलता है? होता ये है कि ब्रांड्स को बस एक बार इसके पीछे बैठे डेवलपर या एजेंसी को पैसा देना होता है. इसके बाद न तो कोई टाइम की पाबंदी और न ही किसी कॉन्ट्रोवर्सी का डर. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को मैनेज करने वाली एक एजेंसी की फाउंडर वनिता रघुवंशी लल्लनटॉप से बात करते हुए कहती हैं.
असली सेलिब्रिटी तो कभी किसी कॉन्ट्रोवर्सी में फंसकर ब्रांड की थू-थू करवा सकते हैं. लेकिन ये डिजिटल पुतले हमेशा वही बोलेंगे और करेंगे, जो ब्रांड का मालिक चाहेगा. येी वजह है कि बड़ी-बड़ी टेक और फैशन कंपनियां अब असली इंसानों को छोड़कर इन वर्चुअल चेहरों पर पैसा पानी की तरह बहा रही हैं.
वो जादुई टूल्स और प्रॉम्प्ट्स जो इन चेहरों में फूंकते हैं जान
अब आप सोच रहे होंगे कि भाई आखिर ये जादुई चेहरा बनता कैसे है? क्या इसके लिए कोई बहुत भारी कोडिंग सीखनी पड़ती है? तो गुरु, ऐसा बिल्कुल नहीं है. आज के दौर में कुछ ऐसे धांसू एआई टूल्स मार्केट में आ चुके हैं जो सिर्फ आपके लिखने भर से ऐसी तस्वीरें बना देते हैं कि असली और नकली का फर्क करना नामुमकिन हो जाए.
मिडजर्नी और स्टेबल डिफ्यूजन जैसे टूल्स इस खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. इनके भीतर बस कुछ खास तरीके के टेक्स्ट प्रॉम्प्ट डालने होते हैं. जैसे हाइपर-रियलिटी, 8के रेजोल्यूशन, सिनेमैटिक लाइटिंग और स्किन टेक्सचर. इसके बाद ये टूल ऐसा चेहरा बनाकर सामने रख देता है जिसे देखकर अच्छे-खासे फोटोग्राफरों के दिमाग का शॉर्ट सर्किट हो जाए.
इसके बाद नंबर आता है कंसिस्टेंसी यानी हर फोटो में चेहरा एक जैसा रखने का. इसके लिए रूपा या फेसस्वैप जैसी एआई तकनीकों का इस्तेमाल होता है. एक बार जो चेहरा फाइनल हो गया, उसे किसी भी मॉडल के शरीर पर एकदम सटीक फिट कर दिया जाता है. वीडियो बनाने के लिए हेजेन या सॉरा जैसे वीडियो जनरेटर टूल्स का इस्तेमाल होता है. इससे ये डिजिटल किरदार एकदम इंसानों की तरह बात करते और मुस्कुराते दिखाई देते हैं.
असली क्रिएटर्स की नौकरी पर मंडराता खतरा
इस पूरी चकाचौंध के पीछे एक बहुत ही कड़वा और डरावना सच भी छिपा है. ये पूरी की पूरी इंडस्ट्री हमारे समाज के असली क्रिएटर्स, मॉडल्स, फोटोग्राफर्स और मेकअप आर्टिस्ट्स की रोजी-रोटी पर सीधा डाका डाल रही है. जो काम पहले पांच लोगों की टीम मिलकर करती थी, अब वो काम एक बंदा बंद कमरे में लैपटॉप पर बैठकर चाय की चुस्की लेते हुए निपटा देता है.
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ग्लोबल टेक कम्युनिटी में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है. अगर येी हाल रहा, तो आने वाले कुछ सालों में मिडिल क्लास क्रिएटर्स के लिए मार्केट में कोई जगह ही नहीं बचेगी. बड़ी कंपनियां अपना बजट बचाने के चक्कर में पूरी तरह एआई की तरफ शिफ्ट हो रही हैं.
ये हमारी डिजिटल दुनिया का सबसे बड़ा विरोधाभास है. हम जिस तकनीक को अपनी सहूलियत के लिए बना रहे थे, वही अब इंसानों को रिप्लेस करने पर आमादा है. सोशल मीडिया पर जो इन्फ्लुएंस कभी इंसानी जुड़ाव और भरोसे से बनता था, अब उसे कंप्यूटर के एल्गोरिदम से कंट्रोल किया जा रहा है. वक्त आ गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इसके लिए कड़े नियम बनाएं. वर्चुअल मॉडल्स पर एआई जनरेटेड का लेबल लगाना अनिवार्य होना चाहिए. ताकि आम जनता को पता रहे कि वो जिस पर प्यार लुटा रहे हैं, वो असल में कोई इंसान है या सिर्फ कंप्यूटर के पिक्सल का मायाजाल.
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