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कुंवर नारायण की एक कविता ‘नीम के फूल’

साहित्यिक मठाधीशी से दूर शांति से अपना काम करने वाला एक ऐसा कवि जो शब्दों में समाज को ढालता था और शब्दों से समाज को ढालता था

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एक कड़वी-मीठी औषधीय गंध से भर उठता था घर जब आंगन के नीम में फूल आते. साबुन के बुलबुलों से हवा में उड़ते सफ़ेद छोटे छोटे फूल दो-एक मां के बालों में उलझे रह जाते जब कि तुलसी घर पर जल चढ़ा कर आंगन से लौटती.

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