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वीडियो: सौरव गांगुली जब ट्रेन में चढ़े तो अपनी ही सीट पर नहीं बैठ पाए

15 साल बाद चढ़े थे ट्रेन में. शायद अब कभी नहीं बैठेंगे.

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फोटो - thelallantop
आदमी सब कुछ दे सकता है. दिल, जिगर, आंख, गुर्दा, जायदाद और न जाने क्या क्या, लेकिन ट्रेन की सीट नहीं दे सकता. चाहे कुछ हो जाये. सामने चाहे जो कोई भी हो. आदमी लाइन में लगता है, खून-पसीने की कमाई लगाता है, लोगों से लड़ता है, भिड़ता है, फॉर्म भरता है, पहले से घुसे दो-तीन हाथों के बीच टिकट विंडो में अपना हाथ घुसाता है, छुट्टे पैसे के लिए चिक-चिक करता है, और फिर बाद में कहता है "अमां जित्ता है वही दे देओ." ये सब नहीं किया तो घर पे बैठे IRCTC में कैप्चा ही गेस करने में खर्च हो जाता है. कहना पड़ोसी अभिषेक का - "जले-जले कैप्चा समझौ, तले तले टिकसेन मा आगि लागि जात है." और इन सब से जान बचाकर आप सीट पा जायें और जब आप अपनी सीट पर पहुंचे तो वहां कोई और बैठा मिले. कैसा लगेगा?  
  सियालदाह रेलवे स्टेशन पर सौरव गांगुली ऐसे ही एक आदमी की सीट के सामने खड़े हो गए. उससे इन्होंने कहा कि 'भइय्या सीट दे दो'. उनने नहीं दी. इन्होंने फिर कहा 'भइय्या सीट दे दो.' उनने फिर नहीं दी. इनने कहा कि हम पुलिस बुला लेंगे. उनने फिर नहीं सुनी. थाना पुलिस हो गया. हुआ ये कि सौरव गांगुली क्रिकेट असोसिएशन ऑफ़ बंगाल (CAB) के जॉइंट सेक्रेटरी अभिषेक डालमिया के साथ पदातिक एक्सप्रेस में चढ़े. उनके साथ CAB के और लोग भी थे. लेकिन जो सीट सौरव गांगुली को मिलनी थी, उस पर पहले से ही कोई और बैठा हुआ था. दोनों पार्टियों में बातचीत हुई और फिर वो थोड़ी देर में गरम हो गई. गांगुली झल्ला के एसी-1 कोच से नीचे उतर आये. स्टेशन पर उन्हें देखकर भीड़ बढ़ गई और सीआरपीएफ़ वाले आ गए. उन्होंने मामला समझा और तुरंत हरकत में आये, गांगुली को एसी-2 कोच में जगह दिलवाई और मामला शांत हुआ. गांगुली बलूरघाट जा रहे थे, जहां उनकी ही मूर्ति लगाई जाने वाली थी.

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