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कोहली एंड कंपनी की ऑस्ट्रेलिया में वो यादगार जीत, जो किसी भी वर्ल्ड कप से हज़ार गुना बड़ी थी

कितने ही दिग्गज इस दिन का सपना देखते हुए रिटायर हो गए.

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ये लाजवाब पल है.

शुरुआत अतीत से

साल 1999 का नवंबर महीना. इंडिया की स्टार स्टडेड टीम ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर निकलने ही वाली थी. तीन टेस्ट खेलने थे. टीम में सचिन, द्रविड़, लक्ष्मण, गांगुली जैसे दिग्गज थे. गेंदबाज़ी में श्रीनाथ, कुंबले और प्रसाद जैसे नाम. तमाम हिंदुस्तान को उम्मीद थी कि कम से कम इस बार तो टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया में कुछ ढंग का करके आएगी. ऐसे में BCCI के सेक्रेटरी जयवंत लेले ने एक ख़तरनाक बयान दिया. बयान क्या दिया, अप्रिय भविष्यवाणी कर दी. इन शॉर्ट, उम्मीदों से लटके असंख्य क्रिकेट फैंस के कानों में पिघला शीशा उड़ेल दिया. उन्होंने कहा,
"हमारा 3-0 से सफाया हो जाएगा. ऑस्ट्रेलिया तीनों मैच जीतेगी. इंडिया का कोई चांस ही नहीं बनता."
बवाल हो गया. अखबारों में मोटी-मोटी सुर्खियां छपीं. जयवंत लेले पर पिल पड़ी जनता. एक तरफ फैंस गालियां दे रहे थे, दूसरी तरफ क्रिकेट के पंडित इस भविष्यवाणी को सिरे से ख़ारिज कर रहे थे. लेकिन जब दौरा ख़त्म हुआ तो नज़ारा ऐन वैसा था, जैसा जयवंत लेले ने प्रेडिक्ट किया था. टीम इंडिया मुंह के बल गिर पड़ी थी. न सिर्फ हारी थी, बेहद बुरी तरह हारी थी. स्कोरलाइन 3-0 ही थी.
सीरीज़ दर सीरीज़ हार हमारे मुकद्दर में लिखी थी.
सीरीज़ दर सीरीज़ हार हमारे मुकद्दर में लिखी थी.

ये मेरा पहला अनुभव था, ऑस्ट्रेलिया से ह्युमिलियेट होकर लौटी टीम इंडिया से निराश-नाराज़ होने का. ये मौका अगले उन्नीस सालों में कई बार आया. और उससे पहले भी कई बार आया था.
फिर आया साल 2019.

71 सालों का इंतज़ार 

मेरे जैसे न जाने कितने क्रिकेट फैंस ऑस्ट्रेलिया में किस्मत बदलने का अंतहीन इंतज़ार करते ही रहें. 1947 से ही कर रहे थे. 12 सीरीज़ से . 48 टेस्ट मैचेस से. 71 साल से. साल दर साल, सीरीज़ दर सीरीज़ हम दहशत भरी निगाहों से देखते रहें और ऑस्ट्रेलियाई टीम हमें रौंदती रही. हम अपनी पूरी ज़िंदगी यही नज़ारा देखते आए हैं. यहां तक कि जादुई माने गए धोनी भी ऑस्ट्रेलियन धरती पर फेल रहें. ऑस्ट्रेलिया दौरे से ज़लील होकर लौटना टीम इंडिया का मुक़द्दर ही था जैसे. लेकिन 2019 में मातम की सियाही मिटाकर जश्न की इबारत लिख दी गई है. बरसों बहाया पसीना तब जा के कहीं सोना बना. फॉर अ चेंज, हमारी टीम ने सीरीज़ भी जीती और दिल भी.
उस पूरे दौरे में टीम इंडिया, ऑस्ट्रेलिया पर पूरी तरह हावी रही. पहली बार ये देखा गया कि इंडिया हमेशा एक कदम आगे थी. सीरीज़ का पहला मैच जीता. ऑस्ट्रेलिया ने दूसरा जीतकर बराबरी की, तो तीसरे में पलटवार करते हुए फिर बढ़त बना ली. ये तो लगभग एडिलेड में ही तय हो गया था कि इंडिया इस बार सीरीज़ जीतने जा रही है. ऑस्ट्रेलियन टीम का कॉन्फिडेंस पाताल छू रहा था. उनका कप्तान अगली हार के बहाने उसी मैच में गिना रहा था. तभी पता चल गया था कि कोहली के लड़कों ने मैदान और मैदान से बाहर की जंग जीत ली है. सिडनी में बस इसपर मुहर लगनी बाकी थी. भले ही बारिश की वजह से सिडनी में नतीजा न आया हो, लेकिन कोई दुर्लभ जीव ही होगा जिसे शक हो कि सिडनी की सुलतान कौनसी टीम बनी.
कमाल का प्रदर्शन.
कमाल का प्रदर्शन.

टीम एफर्ट का नायाब नमूना 

उस जीत की सबसे ख़ास बात ये थी कि ये किसी स्टार खिलाड़ी के इर्द-गिर्द नहीं बुनी गई. के एल राहुल और मुरली विजय के फेलियर को छोड़ दिया जाए, तो उस महल में लगभग हर एक ने अपनी ईंट जोड़ी थी. गेंदबाज़ों के करिश्मासाज़ प्रदर्शन के अलावा जिसको जहां मौक़ा मिला, उसने वहां अपनी उपयोगिता दर्ज कराई. जैसे,
# तीसरे टेस्ट में ओपनिंग करने उतरे हनुमा विहारी ने 66 गेंदें खेलीं और ऑस्ट्रेलियन तेज़ गेंदबाज़ी का डंक निकालकर बाकियों का काम आसान किया. 
# जब पहले टेस्ट की पहली पारी में टीम इंडिया बिखर रही थी, पुजारा चट्टान बनकर खड़े रहे. 
# पर्थ की दूसरी इनिंग्स में शमी ने जादुई स्पेल फेंका और इनिंग में 6 विकेट्स झटक लिए. 
# जब एडिलेड में शॉन मार्श जमे रहने की कसम खाकर आए थे, बुमराह ने उन्हें उस साल की सबसे शानदार गेंद फेंकी. 
ऐसे तमाम छोटे-छोटे पलों में ही इंडिया ने बड़ी जंग जीतने की भूमिका लिखी. कोहली, पंत, रहाणे, अश्विन, जडेजा, कुलदीप सबकी मेहनत का सिला थी वो जीत.
शमी ने लंबे-लंबे स्पेल फेंके.
शमी ने लंबे-लंबे स्पेल फेंके.

कहरबरपा बॉलिंग 

गेंदबाज़ों पर तो अलग से बात होनी चाहिए. हर क्रिकेट एक्सपर्ट कहते नहीं थक रहा था कि उसने भारत के पास ऐसा पेस अटैक कभी नहीं देखा. इशांत, बुमराह और शमी ने पूरी सीरीज़ भर ख़तरनाक बॉलिंग की. ख़ास तौर से बुमराह ने. उन्होंने 17 की एवरेज से 21 विकेट लिए. कितने ही स्पेल उनके ऐसे रहे, जो बल्लेबाज़ों की टांगें कंपा दे. शमी ने एक मशीन की तरह लगातार ओवर फेंके. नई गेंद से इशांत खौफ पैदा करते नज़र आए. ये आंखें चौंधियाने वाला प्रदर्शन था. इतना ही नहीं पहले टेस्ट में अश्विन और आखिरी टेस्ट में कुलदीप ने स्पिन का जादू भी दिखाया.
ये बात ज़रूर है कि स्मिथ और वॉर्नर की एब्सेंस में ऑस्ट्रेलिया की बैटिंग थोड़ी कमज़ोर तो रही. लेकिन, यही बात फिर इंडिया के लिए भी थी. कोहली और पुजारा के अलावा इंडियन बैटिंग में कोई ज़्यादा बड़ा नाम नहीं था. और ऑस्ट्रेलिया की गेंदबाज़ी में कोई खामी नहीं थी. पैट कमिंस ने कितनी ही बार टीम इंडिया को मुश्किलों में डाला. नैथन लायन बुमराह के साथ मिलकर टॉप विकेट टेकिंग बॉलर रहें. मिचेल स्टार्क तो खैर था ही बड़ा नाम. इसके बावजूद टीम इंडिया की बैटिंग कभी सरेंडर करती नज़र नहीं आई. छोटी-छोटी लेकिन ज़रूरी पारियां बहुतों ने खेलीं. इस जीत में जितना योगदान गेंदबाज़ों का है, बल्लेबाज़ों का उससे थोड़ा ज़्यादा ही होगा. आखिरकार ऑस्ट्रेलिया की धरती पर, टॉप क्वालिटी बॉलिंग अटैक के आगे टिके रहकर रन बनाना कोई आसान काम नहीं. भारत के बल्लेबाज़ों का रेज़िस्टेंस सबसे बड़ा फर्क रहा दोनों टीमों में. ये बड़ा दुर्लभ सीन था कि ऑस्ट्रेलिया में हुई किसी सीरीज़ में टॉप थ्री रन बनाने वाले इंडियन थे.
चेतेश्वर पुजारा में द्रविड़ की झलक नहीं, द्रविड़ ही नज़र आए.
चेतेश्वर पुजारा में द्रविड़ की झलक नहीं, द्रविड़ ही नज़र आए.

सचिन, गांगुली, कपिल, गावस्कर, द्रविड़, धोनी, अज़हर, वाडेकर जैसे न जाने कितने दिग्गज खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया में सीरीज़ जीत का सपना देखते-देखते क्रिकेट के मैदान से गायब हो गए. कोहली एंड कंपनी ने उन सबका ख़्वाब हकीकत में बदल डाला. न सिर्फ उनका बल्कि करोड़ों इंडियन क्रिकेट फैंस का भी. वो विजय किसी वर्ल्ड कप से भी ज़्यादा अहमियत रखती है. इस जीत के बाद ऑस्ट्रेलिया से डरे-सहमे खिलाडियों का ग्रुप नहीं, बल्कि सीना फुलाए और चेहरे पर चौड़ी मुस्कान चिपकाए घूमते फियरलेस लड़ाकों का जत्था आया.
वेल डन टीम इंडिया!


वीडियो:

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