भारतीय पोल वॉल्ट एथलीट देव मीणा और कुलदीप यादव ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी गेम्स में हिस्सा लेने मैंगलोर पहुंचे. कुलदीप ने यहां मीट रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीता. नेशनल रिकॉर्ड देव मीणा के लिए भी ट्रेनिंग के लिहाज से यह टूर्नामेंट अच्छा रहा. हालांकि मैंगलोर से उनकी वापसी का सफर एक बुरी याद बन गया. देव मीणा और कुलदीप यादव को ट्रेन में चढ़ने से रोक दिया गया. इसकी वजह थी उनके पोल्स, जिन्हें साथ लेकर वह सफर कर रहे थे.
गोल्ड मेडलिस्ट नेशनल एथलीट को घंटों स्टेशन पर रोका, कोच ने बहुत हाथ जोडे़, TTE ने एक न सुनी
कुलदीप यादव और देव मीणा पोल वॉल्ट एथलीट हैं. यह खिलाड़ी आमतौर पर अपने पोल्स साथ लेकर ही सफर करते हैं. दोनों खिलाड़ी हमेशा की तरह पोल्स के साथ ही सफर को निकले थे.
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कुलदीप यादव और देव मीणा पोल वॉल्ट एथलीट हैं. यह खिलाड़ी आमतौर पर अपने पोल्स साथ लेकर ही सफर करते हैं. दोनों खिलाड़ी हमेशा की तरह पोल्स के साथ ही सफर को निकले थे. उन्हें पनवेल स्टेशन से दूसरी ट्रेन लेनी थी. वह अपने पोल्स लेकर उतरे ही थे कि उसी समय उनको ट्रेवलिंग टिकट एक्जामिनर (TTE) ने रोक लिया. खिलाड़ियों के साथ मौजूद कोच घनश्याम ने लल्लनटॉप से बात करते हुए पूरा घटनाक्रम बताया.
खिलाड़ियों पर लगाया भारी भरकम फाइनचीफ टिकट इंसपेक्टर आरके नायर ने उनसे पोल्स के बारे में पूछा, कोच ने उन्हें बताया कि वह पोल्स लेकर ट्रेन से ही सफर कर रहे हैं. वह पोल्स को पंखे के ऊपर रखकर लाए हैं ताकि किसी को कोई परेशानी न हो. नायर की मांग थी कि पोल्स को लगेज सेक्शन में रखे. हालांकि खिलाड़ी और कोच इसके लिए तैयार नहीं थे और यहीं से बहस शुरू हो गई. कोच ने बताया,
हमसे कहा गया कि हम पोल्स को लगेज सेक्शन में भेजें. लेकिन एक पोल दो लाख से भी ज्यादा रकम का होता है. हमारे लिए वो बहुत अहम है. यह पोल सरकार के हैं और उन्हें कुछ भी होने पर हम ही जिम्मेदार होंगें और हमें ही पैसे देने होंगे. ऐसे में हम कैसे इसे किसी लगेज सेक्शन में रख सकते हैं, जहां बहुत लापरवाही से चीजों को रखा जाता है? नायर ने भी 80 किलो वजन का हिसाब लगाते हुए 8880 रुपये की मांग की जबकि एक पोल का वजन दो से तीन किलो का होता है. ऐसे में यह संभव ही नहीं था कि वजन 80 किलो वजन हो जाए.
यहां साफ कर दें कि बयान में घनश्याम ने कहीं-कहीं TTE को स्टेशन मास्टर कह दिया है, जबकि उन्हें रोकने वाले और फाइन लगाने वाले नायर चीफ टिकट इंसपेक्टर हैं.
इस दौरान घनश्याम ने अपने पास मौजूद सभी परमिशन और लेटर्स दिखाए. घनश्याम ने बताया कि मध्य प्रदेश के स्पोर्ट्स डायरेक्टर राकेश गुप्ता के कहने पर भोपाल के डिविजनल रेलवे मैनेजर ने कोच को पत्र लिखकर दिया जिसमें कहा गया कि उन्हें रोका न जाए. इसके अलावा घनश्याम ने नायर की रेलवे स्पोर्ट्स ऑफिसर रंजीत मेहसरी से भी बात कराई. मौके पर मौजूद जीआरपीएफ के लोगों ने खिलाड़ियों और कोच की आईडी से लेकर तमाम दस्तावेज चेक किए. घनश्याम के मुताबिक इस दौरान उनसे ‘बदतमीजी’ भी की गई.
कोच के मुताबिक सारे पत्र देखकर टीटीई ने कहा,
कोच को जोड़ने पड़े हाथहमें ऊपर से कहा गया है कि फाइन लेना है. बिना फाइन दिए आप नहीं जा सकते.
कोच घनश्याम ने फिर हाथ जोड़कर अपील की लेकिन उनकी नहीं सुनी गई. उन्हें ऐसा लगा कि नायर ने पूरे मुद्दे को ‘अपने ईगो का मुद्दा बना’ लिया. इसी वजह से उनकी कोई बात नहीं सुनी गई. 5 घंटे बाद 1864 रुपये का फाइन लेकर उन्हें जाने की परमिशन मिली, लेकिन तब तक ट्रेन जा चुकी थी. घनश्याम को इस बात का दुख है कि देव मीणा और कपिल जैसे उभरते हुए खिलाड़ियों को इस तरह की स्थिति से दो चार होना पड़ा. उन्हें यह एहसास दिलाया गया कि उनकी मेहनत, उनके रिकॉर्ड्स और उनके मेडल्स की कोई अहमियत नहीं है.

खिलाड़ियों और कोच की अपील
खिलाड़ियों और कोच की अब सरकार से एक ही अपील है. वह चाहते हैं कि खिलाड़ियों के लिए अपने स्पोर्ट्स इक्विपमेंट साथ लेकर जाने के लिए कोई गाइडलाइन जारी कर दी जाए. एक सिस्टम तैयार किया जाए, जिससे यह तय हो जाए कि इस तरह की स्थिति में क्या करना है, किसकी परमिशन चाहिए या कितना चार्ज होगा. इससे न तो सिस्टम में मौजूद लोगों को कोई परेशानी होगी और न ही खिलाड़ियों को.
पोल के साथ सफर क्यों करते हैं खिलाड़ी?
इससे पहले डेकेथलॉन एथलीट तेजस्विन शंकर ने भी यह बात कही थी कि खिलाड़ियों के लिए पोल के साथ सफर करना एक चुनौती है. साल 2023 में इंटर स्टेट चैंपियनशिप में उन्हें अपने पोल्स के साथ सफर करने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी थी. इसी कारण उन्होंने तब बयान दिया था,
मैंने अपनी परेशानी देखकर अन्य पोल वॉल्ट खिलाड़ी से बात की. उसने बताया कि यह तो उनका रोज का है. इसके बाद से मेरे दिल में उनके लिए इज्जत बढ़ गई है.
लेकिन ऐसा होता क्यों है. खिलाड़ियों के लिए पोल साथ ले जाना अहम क्यों है. पोल वॉल्ट के खेल में खिलाड़ियों के पास एक पोल होता है. वह उसे पकड़ कर भागते हैं, इसके बाद उसको एक जगह टिकाकर उसी के सहारे सामने लगे बार के ऊपर से जंप करने की कोशिश करते हैं. अगर एथलीट बिना बार को गिराए और उसे हाथ लगाए जंप कर लेता है तो इसे वैध माना जाता है.
हर खिलाड़ी अलग-अलग तरह के पोल का इस्तेमाल करता है. इन सबकी हाइट भी अलग-अलग होती है. आमतौर पर खिलाड़ी उसी पोल के साथ सहज होता है जिससे वह ट्रेनिंग करता है. इसी वजह से चाहे देश में हो या विदेश में खिलाड़ी पोल साथ लेकर जाते हैं. इस इवेंट का वर्ल्ड रिकॉर्ड स्वीडन के मोंडो डुप्लेंटिस के नाम है जिन्होंने 6.27 का जंप किया है. वहीं भारत में यह रिकॉर्ड देव मीणा के ही नाम है.
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