इंडिया की महिला टीम में यही देखने को मिला. बैटिंग कर पाने वाली बैट्सवुमेन भी हरमनप्रीत कौर के आउट होते ही पूनम राउत के हवाले वतन कर के चलती बन रही थीं. वेद कृष्णमूर्ति ने शायद पूरे टूर्नामेंट का सबसे गैर ज़िम्मेदाराना शॉट मारा था. आउटसाइड ऑफ पड़ी गेंद को क्रॉस बैट के साथ स्लॉग मारने की ज़रूरत मैच के उस समय पर नहीं थी जब खेल सिंगल-डबल करके निकाला जा सकता था. उनके आउट होने के बाद कुछ सेन्स ज़रूर आया और झूलन के पहली गेंद पर आउट होने के बाद शिखा पांडे और दीप्ति शर्मा ने इनिंग्स रोल करनी शुरू की. गेंद हवा में कम और ज़मीन पर ज़्यादा नज़र आने लगी. लेकिन फिर इंग्लैंड की बड़ी ताकत - उनकी कीपर सारा टेलर का कमाल का कीपिंग सेन्स और इंडिया का उतना ही बकवास कम्युनिकेशन ले डूबा. शिखा ने बॉल सीधे पॉइंट की ओर टैप की और दौड़ पड़ीं. दीप्ति को मालूम था कि रन सम्भव नहीं है लेकिन शिखा हर बॉल पर रन निकालने के फ़ितूर में क्रीज़ से काफी आगे निकल चुकी थीं. टेलर ने गेंद कलेक्ट कर काम तमाम कर दिया.
हमने झूलन गोस्वामी को पहले खेलने भेज दिया. झूलन गोस्वामी बैटिंग के मामले में अजीत अगरकर हैं. अजीत अगरकर वो हैं जिन्होंने जब आठ इनिंग्स बाद पहला सिंगल लिया था तो ऑस्ट्रेलिया के दर्शकों ने खड़े होकर तालियां बजाई थीं और अगरकर ने बाकायदे बल्ला उठाकर दिखाया था. झूलन भी उसी लीग की बैट्सवुमेन हैं. बावजूद इसके उन्हें शिखा पांडे के आगे भेज दिया गया.
इन तमाम खामियों के बावजूद हम इस बात पर फ़ख्र करते रहे कि हम इतना आगे आ पाए, यही बहुत बड़ी बात है. और यही एक बड़ी समस्या है जो कम से कम इस देश में महिला क्रिकेट को नीचे खींचती रहेगी. हम जब तक एक कठोर मां की तरह इन्हें लताड़ेंगे नहीं, इनकी खामियों को उघाड़ेंगे नहीं, कुछ भी सही नहीं होने वाला है. पार्क में खेलता एक बच्चा भी जीतने के लिए खेलता है. वो हारकर इस वजह से संतोष में नहीं जीता रहता है क्यूंकि कम से कम उसे पार्क में खेलने को ही मिल रहा है जबकि इससे पहले तो बस ईंटों के विकेट बनाकर गली में खेलने को मिलता था. आज जब हम सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड हैं और देश में सबसे ज़्यादा क्रिकेट का खेल ही खेला और देखा जाता है, हम इस बात से कतई संतुष्ट नहीं हो सकते कि लड़कियों की यही जीत है. 'अंत में क्रिकेट की जीत हुई' और 'भाग लेना ही सब कुछ होता है' और 'दिल जीत लिया' हमेशा उन्हें कहा जाता है, जो हारते हैं. जीती हुई टीम ट्रॉफी के साथ सेल्फी ले रही होती है. इस बात को अपने अन्दर बिठा लीजिये कि हम हारे हैं. जीते कुछ नहीं. हम दूसरे नम्बर पर रहे.
हमने सोच लिया कि हम एक-एक कदम से आगे बढ़ेंगे. लेकिन अगर हर कदम के बाद पिछले कदम के जश्न में डूब जायेंगे तो सफ़र तय करने में वक़्त लगेगा. ज़रूरी ये है कि इस बात पर ज़ोर दिया जाए कि ये टीम खेलती रहे. और उसमें भी, पिछले खेल से बेहतर खेले. जिस दिन उनका खेल अग्रेसिव और एक नम्बर हो जायेगा, लोग खुद-ब-खुद उन्हें देखेंगे. आप उन्हें सीरीज़-दर-सीरीज़ खिलाते रहिये और वो दोयम दर्ज़े का खेल खेलती रहें तो यकीन मानिए उनके लिए ऑडियंस जुटाना मुश्किल हो जायेगा. इसे इस तरह से समझिये कि जब तक साइना नेहवाल, पीवी सिन्धु, ज्वाला गट्टा को हमने नहीं देखा था, हम बैडमिन्टन नहीं देखते थे. आज हम बैडमिंटन लीग चलाते हैं. इंडियन एथलेटिक्स टीम हर ओलम्पिक में शिरकत करती है. लेकिन दीपा कर्माकर जब प्रोदुनोवा वॉल्ट करके मेडल राउंड में पहुंच जाती है तो लोग उसे टीवी पर देखने लगते हैं. दफ्तरों में पीवी सिन्धु के नाम के नारे लगते हैं. हमें मालूम चलता है कि कोई कैरोलिना मरीन नाम की स्पैनिश प्लेयर भी है. विम्बलडन में रॉजर फेडरर का मैच देखा गया. सोशल मीडिया पर इसके बारे में बात हुई. नडाल और जोकोविच के बाहर होने की बातें हुईं. लेकिन किसी भी इंडियन प्लेयर की बात नहीं हुई. वहां तो दोष डालने को क्रिकेट का खेल भी नहीं था. (लड़कों वाला क्रिकेट का खेल.) विम्बलडन 2017 में रोहन बोपन्ना, जीवन, लिएंडर पेस, पूरव राजा, दिविज शरन और सानिया मिर्ज़ा वो नाम हैं जो इंडिया से विम्बलडन का टिकट कटाकर पहुंचे थे. लेकिन इनका कहीं कोई ज़िक्र नहीं हुआ. वजह ये कि इन्होंने ख़ास खेल नहीं दिखाया. इनके गेम्स टीवी पर भी नहीं आये. क्यूंकि ये उस स्टेज तक भी नहीं पहुंचे जहां इनके खेल टीवी पर दिखाए जाएं. अब अगर आप कहें कि सचिन तेंदुलकर कोट पैंट पहनकर रॉजर फेडरर का खेल देखने गए और इन इंडियन प्लेयर्स का खेल क्यूं नहीं देखा, तो मैं सच कह रहा हूं आप भोले होने की ऐक्टिंग बढ़िया कर लेते हैं. लड़कों वाला क्रिकेट ज़्यादा पॉपुलर है क्यूंकि उसमें क्वॉलिटी है. क्यूंकि वो ग्यारह लड़के जब अपने पे आ जाएं तो पहले टी-20 वर्ल्ड कप के सेमी फाइनल में रिकी पोंटिंग को बिठा दिया जाता है. जब ये अपनी पे आ जाएं तो ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ एक ही टेस्ट मैच की दो इनिंग्स में एक प्लेयर दो-दो सेंचुरी मार देता है. जब ये अपनी पे आ जाएं तो एक कप्तान के हाथ में वर्ल्ड कप, टी-20 कप, चैम्पियंस ट्रॉफी और टेस्ट मैच की गदा दिखाई देती है. इन प्लेयर्स के लिए 'दिल जीत लिया' शब्द मायने नहीं रखता. पिछले 20-25 सालों में शायद ही कभी इंडिया की मेन्स टीम की हार पर कहा गया हो कि वो मैच तो हार गए पर उन्होंने दिल जीत लिया.
वो समय बीत गया है कि जब हम 2005 में वर्ल्ड कप फाइनल के देश में न दिखाए जाने का रोना रोयें. इस चीज का भी रोना न रोया जाए कि देश में महिला क्रिकेट को ऑडियंस नहीं मिल रही. मिताली राज स्टेडियम में मौजूद भीड़ को देखकर रन नहीं बनाती हैं. झूलन गोस्वामी की फेंकी गेंद की स्पीड इस बात से नहीं तय होती कि स्टैंड्स में कितने दर्शक मौजूद हैं. वो कम भीड़ में स्पिन गेंदबाजी नहीं करने लगती हैं. हरमनप्रीत ने ऑस्ट्रेलिया को इसलिए नहीं मारा क्यूंकि मैच टीवी पर आ रहा था. वो मैच सहारा के रेगिस्तान में भी हो रहा होता तो भी उस दिन हरमनप्रीत उतने ही विश्वास के साथ और उसी ऐटिट्यूड के साथ खेल रही होतीं.
बाकी, लड़कियों के लिए ऐसा है कि उन्होंने मैच बुरी तरह गंवाया है. आज हम वर्ल्ड कप ट्रॉफी लिए बैठे हो सकते थे. लेकिन ये कहते जा रहे हैं "कोई बात नहीं, होता है." ये फ़र्जीफिकेशन है. बकवास बातें हैं. कठोरता से मेहनत की जाए और उतनी ही कठोरता से इन लड़कियों की गलतियां सामने लाई जाएं. ये एकमात्र सूत्र है जो लड़कियों के क्रिकेट का कुछ भला कर सकता है. वरना बैठे रहिएगा और 'हाय मर्दाना क्रिकेट' का रोना रोइएगा.
दिल हमारी प्राइवेट चीज़ है. इसे बचाए रखें. ज़्यादा लोग न जीतें तो बेहतर. क्यूंकि एक ही तो दिल है मोदी जी...
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