हर किसी का अपना एक नंबर होता है. मसलन धोनी का 7 है. वो 7 जुलाई को पैदा हुए थे. दिन भी 7वां और महीना भी. इसलिए उन्होंने अपनी टीशर्ट पर भी 7 लिखवाया है. कहते हैं 'ये मेरा फेवरिट नंबर है'. सचिन का 10 था. सहवाग का कोई नंबर ही नहीं था क्यूंकि वो इस सब से काफ़ी परेशान हो चुके थे. लेकिन बात जब क्रिकेट की चल रही हो तो इंडिया और ऑस्ट्रेलिया का फेवरिट नंबर क्या है? जवाब है 359. दोनों टीमें जब भी एक साथ होती हैं, 359 नंबर उनका पीछा करता रहता है. भयानक संयोग. हर कुछ वक़्त में ये नंबर दोनों टीमों की कुंडली में आ बैठता है. आपको यकीन नहीं होता है तो हम पांचांग खोलते हैं. आइये.
1. साल 2003
2003 का क्रिकेट विश्व कप. साउथ अफ़्रीका में खेला जा रहा था. इंडियन टीम एक बहुत बड़ी फ़ोर्स बन कर उभरी थी जो कि ग्रुप स्टेज में एक मैच हारने के बाद अजेय रही और फाइनल में पहुंची. पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैच जीतने के बाद हर किसी को ये मालूम था कि इंडिया को रोकना अब नामुमकिन होगा. लेकिन उसे रोका 359 नंबर ने. ऑस्ट्रलिया ने जोहांसबर्ग में पहले बैटिंग करते हुए 359 रन बनाये. श्रीनाथ, ज़हीर खान, हरभजन, कोई भी नहीं बख्शा गया. रिकी पोंटिंग ने 140 और डेमियन मार्टिन ने 84 गेंदों पर 88 रन बनाए. ऑस्ट्रेलिया का फाइनल स्कोर था - 359 रन पर मात्र 2 विकेट. इसके जवाब में इंडिया की टीम 234 रनों पर आउट हो गई. हर्षा भोगले ने मैच से पहले कहा था कि ऑस्ट्रेलिया और वर्ल्ड कप के बीच में सिर्फ़ सचिन तेंदुलकर खड़े हैं. पहले ही ओवर में सचिन का विकेट गिरा और इंडिया की हार की शुरुआत हुई. ये एक बुरा सपना है जो समूचा देश भूल जाना चाहता है. इन्टरनेट पर 'नाइन्टीज़ किड्स' टर्म काफ़ी चलन में है. हर भारतीय नाइन्टीज़ किड अपने दिल के एक कोने में इस हार की पीर लिए घूम रहा/रही है.
2. साल 2004
उस वर्ल्ड कप फाइनल के मात्र 322 दिन बाद. तारीख 8 फ़रवरी 2004. सिडनी में वीबी सीरीज़ का दूसरा फाइनल खेला जा रहा था. इस सीरीज़ में विजेता का फ़ैसला बेस्ट ऑफ़ थ्री के दम पर होता था. ऑस्ट्रेलिया पहला फाइनल जीत चुका था. ये वो वक़्त था जब इंडिया एकमात्र वो टीम दिखाई दे रही थी जो ऑस्ट्रेलिया की दिग्गजों से भरी टीम को टक्कर देती हुई दिखाई पड़ रही थी. ऑस्ट्रेलिया की टीम डॉक्टर जैकॉल सी थी. काईयां, चालाक, साम-दाम-दंड-भेद का हर संभव इस्तेमाल करने वाली टीम. उसके सामने गंगाधर को शक्तिमान बन ज़ोर आजमाइश करनी पड़ रही थी. जैकॉल का ख़तरा बस टल रहा था. वो हर बार कुछ न कुछ नया शिगूफ़ा ले आता और शक्तिमान उसी में बिंधा रहता. अंधेरे की सत्ता कायम अब भी थी. हर मैच जीतते आना और फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से हार जाना - इंडिया की ये आदत बन चुकी थी. आलम ये था कि हर कोई इसके लिए अपने आप को तैयार भी कर चुका था. इसी क्रम में पहला फाइनल हारने के बाद दूसरे में जब इंडिया ने बॉलिंग शुरू की तो 12 ओवर के अंदर पोंटिंग और हेडेन को आउट कर लेने के बाद हेडेन और मार्टिन ने मार-कुटाई चालू की. मार्टिन के आउट होने के बाद साइमंड्स आया जिसने कोई कोताही नहीं बरती. 50 ओवर ख़त्म हुए तो एक बार फिर बोर्ड पर टंगे हुए थे - 359 रन. लगभग साल भर पहले मिले घाव पर जैम आई पपड़ी को किसी ने तेज़ नाखूनों से रगड़ दिया था.
3. साल 2013
समय बदल चुका था. इंडिया क्रिकेट की और क्रिकेट में आये पैसे की भी सुपरपावर बन चुका था. देश में अच्छे दिन आ चुके हैं, ऐसा कहा जाने लगा था. ऑस्ट्रेलिया की टीम इंडिया की ज़मीन पर खेल रही थी. वन-डे सीरीज़ के पहले मैच में ऑस्ट्रेलिया ने 72 रनों से मैच जीत के सीरीज़ में 1-0 की बढ़त बना ली थी. इस मैच में भी स्कोर 300 रनों के पार गया था. लें दूसरे मैच में फ़िंच ने जो रगड़ा देना शुरू किया तो इंडिया उससे कभी भी उबर नहीं पाया. फ़िंच, ह्यूज़, वॉटसन, बेली और मैक्सवेल - ऑस्ट्रेलिया के टॉप 5 ने 50 से ज़्यादा रन बनाए. विनय कुमार ने 9 ओवर में 73 रन लुटा डाले. एक बार फिर बोर्ड पर लिखा था - 359 रन. इंडिया को फिर से इतने रनों का पीछा करना था. मगर ये साल दूसरा है वो साल दूसरा था. इंडिया ने ये मैच 9 विकेट से जीता. रोहित शर्मा ने 123 गेंदों पर 141 रन बनाए और आउट ही नहीं हुए. शिखर धवन 86 गेंदों पर 95 रन बनाकर आउट हुए. विराट कोहली वन-डाउन आये और 52 गेंदों पर 100 रन ठोंक दिए. जयपुर में इंडिया ने 359 के मिथक को हल्की चोट पहुंचाई. लेकिन अब भी 2003 के ज़ख्म हरे के हरे ही थे.
4. साल 2019
अच्छे दिनों की परीक्षा की स्कीम अनाउंस हो चुकी थी. मगर इस दफ़ा दांव उल्टा पड़ा था. 2003 के वर्ल्ड कप फाइनल में 359 रन लुटवाने के 15 साल, 11 महीने और 15 दिन बाद इंडिया ने 50 ओवर में 359 रन बनाए. रोहित शर्मा ने शानदार बैटिंग की और शतक से चूके. शिखर धवन ने कम-बैक किया और सेंचुरी मारी. कोहली सस्ते में निकल लिए लेकिन हर मैच ऑडिशन की तरह खेल रहे विजय शंकर ने 15 गेंद पर 26 रन और धोनी के जूतों का साइज़ नाप रहे ऋषभ पंत ने 24 गेंदों में 36 रन बनाए. आख़िरी गेंद पर बुमराह ने छक्का जड़ा और इंडिया को 359 पर पहुंचा दिया. जवाब में पहली ही गेंद पर फ़िंच के ख़िलाफ़ एलबीडब्लू की अपील और चौथी गेंद पर उनके क्लीन बोल्ड होने के बाद ऑस्ट्रेलिया को 10-12 मिनट के अंदर और झटका लगा. स्कोर था 12 रन पर 2 विकेट. गेंद हवा में तैर रही थी. लिहाज़ा मैक्सवेल को, जो कि अमूमन वन-डाउन आ रहे थे, टू-डाउन भी नहीं भेजा गया. पीटर हैंड्सकूम्ब ने सेंचुरी मारी और उस्मान ख्वाजा के साथ गेम को धीरी स्पीड में ही सही, बढ़ाते रहे. इंडिया को विकेट्स भले ही नहीं मिल रहे थे लेकिन एक निश्चिंतता थी. आस्किंग रन रेट 8 से 9 रन प्रति ओवर के बीच था. बुमराह और भुवी के ओवर बचे हुए थे. सब कुछ आसान दिखाई दे रहा था. लेकिन फिर ओस पड़ने लगी और बॉलर्स गेंद को पकड़ने में मुश्किल का सामना करने लगे. नतीज़ा ये हुआ कि इंडिया की पकड़ मैच से भी ढीली हो गई. कुछ कैच छूटे और अपना दूसरा मैच खेल रहे ऐश्टन टर्नर ने खेल को अपनी धुरी पर घुमा कर रख दिया. 43 गेंदों पर 84 रन मारे और मैन ऑफ़ द मैच लूट लिया. ऑस्ट्रेलिया ने एक बार फिर 359 रनों का पहाड़ तोड़ दिया.