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बंदर मारो, पूंछ दिखाओ, 5 रुपये ले जाओ !

हिमाचल प्रदेश के चमियाणा गांव के लोगों ने बताई मुश्किल और समाधान.

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हिमाचल प्रदेश में हमीरपुर जिले के चमियाणा गांव में लोग बंदरों के आतंक से परेशान हैं.
हिमाचल प्रदेश का हमीरपुर जिला. बाबा बालक नाथ के मंदिर के लिए मशहूर. यहां का एक गांव है चमियाणा. हमीरपुर से सुजानपुर के रास्ते पर पड़ता है. ये रास्ता टूरिस्ट भी लेते हैं. क्योंकि आगे टेरा है, जहां राजा संसार चंद की गढ़ी है. जहां बारादरी और हवा महल अब भी देखे जा सकते हैं. फिर सुजानपुर भी है, जहां के चौगान मैदान के चार तरफ चार बिरादरी बसाई गई थीं. राजा इस मैदान में होली खेलने आते थे. होली मतलब धमाल. कभी-कभी उत्पात भी. और इस इलाके में बारहों महीने उत्पात करते हैं बंदर. उत्पाद के इस चक्कर में ऐसी तैसी हो जाती है. गांव के लोग, फिर चाहे वह किसान हों या छोटे दुकानदार या फिर नौकरीपेशा, सब इससे परेशान हैं. और इसका इलाज क्या है…उसके लिए ये वाकया सुनिए.
हमीरपुर के चमाणा गांव पहुंची लल्लनटॉप की टीम मोती.
हमीरपुर के चमियाणा गांव पहुंची लल्लनटॉप की टीम मोती. (फोटो- रजत सैन/ द लल्लनटॉप)

हम लल्लनटॉप की चुनावी यात्रा के लिए हमीरपुर पहुंचे. यहां से लिया सुजानपुर का रास्ता. रास्ते में पड़ा एक गांव. मंदिर, जिसके किनारे कई महिलाएं बैठी थीं. चुनाव में महिलाएं कम मुखर होती हैं. हमें मौका दिखा. उतरे, आंटी लोगों से राम-सलाम किया. वे बस का इंतजार कर रही थीं. बात के लिए राजी हो गईं. तभी वहां एक टोपीधारी बुजुर्ग आ गए. कुछ-कुछ कहने लगे. लेकिन अपने राम वीडियो शुरू कर चुके थे. वही ठठकरम. ओपनिंग कहां से ली जाए. मंदिर के सामने रोड की परली तरफ स्कूल था. वहीं कैमरा ठहरा. चलने के लिए. प्रस्तावना बना बोर्ड. शिक्षार्थ आइए. सेवार्थ जाइए. गांव-चमियाणा. प्रखंड-सुजानपुर. हमारे गांव का नाम चमारी है. प्रखंड कदौरा लगता है. राब्ता कायम हो गया. मगर महिलाओं से पहले उन बुजुर्ग की सुननी पड़ी. उनकी आवाज तेज होती जा रही थी. महिलाएं मुस्कुरा रही थीं. बुजुर्ग का नाम, बीआर जसवाल. रिटायर्ड फौजी. इंडियन नेवी में रहे. 1965 और 1971 की लड़ाई लड़े. वह हमें बांह पकड़ मंदिर के किनारे की एक दीवार तरफ ले गए. वहां एक पत्थर लगा दिखा. अंग्रेजी में. उस पर लिखा था कि इस गांव से 7 दर्जन से ज्यादा लोग पहला वर्ल्ड वॉर लड़े थे. उसमें दहाई की संख्या में शहीद भी हुए. इस पर बात हुई. फिर आंटी जी सब से बात करने बढ़े. मगर सुजानपुर की तरफ से बस बढ़ी आ रही थी. ज्यादातर महिलाएं उसमें बैठ चली गईं. अब बचे गांव के अंकल. उनसे बात शुरू की. पर आगे एक आंटी आएंगी. सो दम साधे रखें .
इंडियन नेवी से रिटायर्ड फौजी बीआर जसवाल टीम मोती को मिले, जिन्होंने 1965 और 1971 की लड़ाई में हिस्सा लिया था.
इंडियन नेवी से रिटायर्ड फौजी बीआर जसवाल टीम मोती को मिले, जिन्होंने 1965 और 1971 की लड़ाई में हिस्सा लिया था. (फोटो- रजत सैन/ द लल्लनटॉप)

जसवाल साहब के बाद बात हुई सुरेंद्र सिंह से. लकड़ी का काम करते हैं. मंदिर के पास ही उनकी वर्कशॉप है. ये टू इन वन है. फ्रंट पार्ट में गौशाला है. दो भैंस और एक उसका बच्चा. आगे वाली भैंस रास्ता छेके पसरी. उठाया गया तो सूसू कर किनारे हुई. ये जैसे दूसरी वाले के लिए सिग्नल था. उन्होंने भी मल त्याग कर सर्किल पूरा किया. हम अंदर गए तो देखा पीछे की तरफ मशीन लगी है. बुरादे का ढेर और कुछ कटे छंटे फट्टे. सुरेंद्र सिंह और जसवाल साहब, दोनों से पूछा. अगली सरकार से आप लोगों को क्या चाहिए. उम्मीद थी कि जवाब में बिजली-सड़क-पानी या फिर स्वास्थ्य और रोजगार जैसी चीजें सुनने को मिलेंगी. मगर वह बोले कि हमें बंदरों से छुटकारा चाहिए. उन्होंने हमें गौशाला के किनारे ले जाकर अपने पहाड़ी खेत दिखाए. जिनमें खरपतवार उगी थी. बताया कि ज्यादातर फसल बंदर बर्बाद कर देते हैं. घरों से सामान उठा ले जाते हैं. बच्चों-बूढ़ों को खुखिया देते हैं. झुंड के झुंड आते हैं. सरकार नहीं आती हमारे बचाव के लिए.
सुरेंद्र सिंह ने लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी को गांव में बंदरों के आतंक की बात बताई.
सुरेंद्र सिंह ने लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी को गांव में बंदरों के आतंक की बात बताई. (फोटो- रजत सैन/ द लल्लनटॉप)

हमने पूछा, बात तो सरकार तक पहुंच जाएगी, मगर इलाज भी तो बता दीजिए. तो जसवाल ने कहा कि जगदेव चंद (जनता पार्टी और भाजपा सरकार में मंत्री रहे हमीरपुर के बड़े नेता) के टाइम पर एक नियम था. हम बंदर मारते थे. पूंछ ले जाकर दिखाते थे. तो पांच रुपये मिलते थे. इससे क्या होता था कि बंदरों का जत्था आबादी की तरफ नहीं आता था. खाने भर की सब्जी-फसल हो जाती थी. लेकिन बाद में सरकार बदल गई. नियम बदल गया. जसवाल ने मनेका गांधी का जिक्र किया. बोले, उनका भी तो वही जानवर वाला कुछ डिपार्टमेंट है. वहां बैठे-बैठे सख्ती करती रहती हैं, यहां की हालत पता नहीं उन्हें.
इस समस्या का सरकारी समाधान क्या निकला था. यही कि बंदरों की पकड़कर नसबंदी कर दो. प्रजनन नहीं कर पाएंगे बंदरिया के साथ. मगर नसबंदी कागजों पर खूब हुई और असल में कम दिखी. फिर हुआ कि बंदरों को आबादी वाले इलाकों से पकड़कर घने जंगलों में छोड़ दो. ये बात हमें वैसे लगी जैसे कोई बड़ी-बड़ी छोड़ दे. एक तो बंदरों को कैसे पकड़ोगे. कितने पकड़ोगे और जो छोड़ आओगे तो वे वहीं पिलकर बसे रहेंगे क्या.
हमारा सफर आगे बढ़ा. हमने शुक्रिया कहा. अपने काम को. जो हमें देश को देस में जाकर देखने समझने का मौका देता है. बंदरों का उत्पात हमारे जालौन-उरई में भी खूब है. मगर लोग सिर्फ कोसते हैं. मारते नहीं. हनुमान जी वाला कनेक्शन रोक देता है. मगर यह भी एक देस है. जहां पूंछ के पांच रुपये मिलते थे. और बकौल जसवाल मिलने चाहिए. पांच रुपये के लिए नहीं. आतंक से मुक्ति के लिए. और इसके पीछे उनका तर्क-
पहले इंसान बचाएंगे कि जानवर…और जानवर तो हम भी बचाते हैं, मगर इंसान की कीमत पर तो नहीं न. 
पीएस- ऊपर एक आंटी के आने की बात थी. आंटी आईं. सर पर चारा का गट्ठा लिए. हमने इसरार किया तो रुककर बात करने लगीं. सुरेश चंद ने उनका चारा उतरवा किनारे रख दिया. वह प्रधान थीं. तीन किलोमीटर दूर की च्लो पंचायत की. हमने तो प्रधान को बुलेरो या बुलेट में ही देखा. मगर ये सरौता देवी थीं. ये हिमाचल था. यहां सब कुछ अभी जमीन पर ही था. ज्यादातर जगहों पर.
च्लो पंचायत की प्रधान सरौता देवी
च्लो पंचायत की प्रधान सरौता देवी खुद के सिर पर चारे का गट्ठर लादे जाते टीम लल्लनटॉप को मिलीं. (फोटो- रजत सैन/ द लल्लनटॉप)

खैर, सरौता देवी ने भी बताया. कि अभी गट्ठर लेकर आ रही थी तो बंदर ऊपर चढ़ गए. फिर दस मिनट तक उन्हें हंसिया दिखा भगाने में ही लगी रहीं. सरौता देवी ने उसके बाद मोदी सरकार को भी हंसिया दिखाया. बोलीं, लोकसभा चुनाव में आए थे. सुजानपुर रैली करने. बोले थे गरीब का जनधन अकाउंट खुलेगा जिसमें 2 लाख रुपये आएंगे. कहां गए वो रुपये. हमने 15 लाख वाला तंज सुना था. ये आंकड़ा नया था. वैसे नया हमारे लिए हिमाचल भी है. क्योंकि ये टूरिस्ट मैप वाला नहीं, असली हिमाचल है. गांव-देहात वाला. जहां आपको जसवाल, सुरेंद्र और सरौता मिलते हैं. जय जनादेश.


लल्लनटॉप वीडियो देखें- 
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