'जब मैं छोटा था, मुझे टेनिस सीखने से नफरत थी. ऐसा नहीं था कि मुझे ये खेल नहीं पसंद था, बल्कि मुझे अलसुबह एगमोर, मद्रास यानी अब की चेन्नई स्थित इस अकैडमी के कोर्ट के अनगिनत चक्कर काटने से कोफ्त होती थी. कोच रॉबिन मैनफ्रेड की इस अकैडमी में मैं जूनियर प्रोग्राम का हिस्सा था. उस वक्त मेरी उम्र बमुश्किल सात साल रही होगी. यह अकैडमी हमारे घर से लगभग पांच किलोमीटर दूर थी. सुबह-सुबह कोर्ट के चक्कर काटना हमारे वॉर्म-अप का हिस्सा था. लेकिन समस्या ये थी कि मैं बस वॉर्म-अप ही कर पाता था, गेंद को कूटने के मौके तो मिलते ही नहीं थे. हमें ग्रुप में बांटकर चार फोरहैंड और चार ही बैकहैंड शॉट लगाने को मिलते थे. और बस, दिन की ट्रेनिंग खत्म. और मेरा मानना था कि सुबह 5:30 बजे उठने के बाद मिलने वाली ये खुशी बहुत कम है. और मुझे यह सोचकर भी आश्चर्य होता था कि मेरे मम्मी-पापा मुझे एक कोर्ट के इर्द-गिर्द भगाने के लिए इतने अधिक पैसे क्यों खर्च कर रहे. ट्रेनिंग के नाम पर जो कुछ भी हो रहा था वह मेरी फैंटेसीज पर एक आघात था. वह फैंटेसीज जिनमें मैं अपने हीरो जॉन मैक्नरो की तरह कोर्ट पर उछलते-कूदते हुए कमाल के शॉट्स खेलता था. ये अलग है कि मेरे पास ना तो मैक्नरो जैसे शॉट्स थे और ना ही मैं उनकी तरह कमाल का दिखने वाला गबरू जवान था. लेकिन किस्मत से मेरे पास चेस थी.'लीजिए, चेस का ज़िक्र आ ही गया. हां तो बात ये है कि आनंद की माताजी वकीलों के परिवार से थीं. और ये वकील सब अपने घर में टाइमपास के लिए चेस खेलते थे. आनंद की मां ने उन्हें खेलते देखा और बचपन से ही उन्होंने भी इन 64 खानों में प्यादे घुमाने शुरू कर दिए. और फिर शादी के बाद जब आनंद और उनके भाई-बहन पैदा हुए तो सभी ने शुरू से ही इस खेल को देखा. और आनंद से पहले उनके भाई-बहन ने यह खेल खेलना शुरू किया. आनंद सबसे छोटे थे और हम सबकी तरह उन्होंने भी अपने बड़े भाई-बहनों को फॉलो किया. आनंद बताते हैं कि उनकी टू डू लिस्ट में हर वो काम होता था जो उनके बड़े भाई-बहन करते थे. यहां जानना जरूरी है कि आनंद के भाई उनसे 13, तो बहन 11 साल बड़े थे. और फिर छह साल की उम्र में आनंद ने इस ब्लैक एंड व्हाइट दुनिया में अपना पहला कदम रखा. और जल्दी ही इस खेल में अपनी मां को हराने लगे.
'यहां होने वाले हर वीकेंड टूर्नामेंट में आनंद का नाम लिख दें.'क्लब से कायदे से जुड़ने के तीन दिन बाद आनंद अपने पहले टूर्नामेंट में उतरे. और यहां लगातार तीन मैच हार गए. फिर आया चौथा मैच. आनंद के सामने वाला प्लेयर वक्त पर नहीं पहुंचा. और फिर आनंद मन ही मन प्रार्थना करने लगे कि अब ये आए ही ना तो बेहतर. उनकी प्रार्थना रंग लाई और वो प्लेयर देर से भी नहीं आया. मतलब आया ही नहीं और आनंद को बाइ डिफॉल्ट विजेता घोषित कर दिया गया. यह किसी भी टूर्नामेंट में आनंद की पहली जीत थी. और इसके बाद का इतिहास तो सब जानते ही हैं.
हैप्पी बर्थडे ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद.
























