तारीख 7 सितंबर 2010. अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आर्यस का एल मोनुमेंटल स्टेडियम. टीमें थीं- स्पेन और अर्जेंटीना. अभी दो महीने पहले ही स्पेन ने फीफा वर्ल्ड कप जीता था. वो नए-नवेले वर्ल्ड चैंपियन थे. अर्जेंटीना के खिलाफ इस मैच में स्पेन की ओर से वही सारे खिलाड़ी थे, जिन्होंने अपनी टीम को विश्व विजेता बनाया था. 11 जुलाई 2010 को नीदरलैंड्स को फाइनल मैच में हराया था. इसमें आंद्रेस इनिएस्ता भी थे, जो अर्जेंटीना के सबसे लाडले खिलाड़ी लियोनल मेसी के सबसे ‘लाडले’ दोस्त थे. बार्सिलोना टीम के ये दोनों ‘जांबाज’ उस दिन एक साथ नहीं बल्कि, एक दूसरे के खिलाफ खेल रहे थे. एक अर्जेंटीना से. एक अर्जेंटीना के खिलाफ.
स्पेन के उस शेफ ने 'ताना' न मारा होता, तो मेसी अर्जेंटीना की जर्सी में न होते
लियोनल मेसी के करियर का एक ऐसा दौर भी था, जब स्पेन उन्हें अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए खेलने को तैयार था और कोशिशें भी लगभग सफल हो गई थीं. लेकिन मेसी ने हर प्रस्ताव ठुकराकर सिर्फ अर्जेंटीना की जर्सी पहनने का फैसला किया.


‘ला मासिया’ बार्सिलोना फुटबॉल क्लब की युवा अकादमी का नाम है. इसे बार्सिलोना के लिए ‘खिलाड़ियों की फैक्ट्री’ कह सकते हैं. यहां काफी कम उम्र में बच्चों को भर्ती करके उन्हें फुटबॉल की ट्रेनिंग दी जाती है. मेसी और इनिएस्ता दोनों यहीं के थे. ला मासिया की मिट्टी से ही दोनों ने फुटबॉल की कारीगरी सीखी थी. दोनों ने साथ में बार्सिलोना के लिए सैकड़ों मैच खेले. इनिएस्ता पास देते. मेसी गोल पोस्ट भेद देते थे. मैदान की ये ‘जुगलबंदी’ निजी जिंदगी में भी जारी थी. दोनों पक्के दोस्त थे. हर जरूरत में साथ रहने वाले दोस्त. लेकिन उस दिन के मैच में ये ‘दोस्ती’ बार्सिलोना के किसी मैदान में बेंच पर रख दी गई थी.
मैच शुरू हुआ. 8 मिनट ही बीते थे. मेसी गेंद को अपने पैरों से चिपकाए हवा की रफ्तार से गोलपोस्ट की ओर बढ़ने लगे. तभी उनके सामने आए ‘दोस्त’ इनिएस्ता. लेकिन, मैदान पर दोस्ती के लिए कोई जगह नहीं होती. इनिएस्ता मेसी को रोकने के लिए एकदम तैयार थे. पर मेसी किसी के रोके नहीं रुक रहे थे. स्पेन के तीन डिफेंडरों को छकाते हुए वह एकदम स्पेन के गोलपोस्ट के पास पहुंच गए. गोलकीपर पेपे रेना डिफेंड करने के लिए आगे बढ़े लेकिन मेसी ने पैरों से ऐसी करामात दिखाई कि गेंद गोलपोस्ट के भीतर समा गई.
इस दिन अर्जेंटीना ने अभी-अभी विश्व चैंपियन बने स्पेन को 4-1 से रौंद दिया. उस स्पेन को जिसे उस समय हरा पाना तकरीबन असंभव माना जाता था. ये वो आखिरी मैच भी था, जब मेसी ने स्पेन के खिलाफ कोई इंटरनेशनल मैच खेला था. अब रविवार, 19 जुलाई को वह फिर से उसी स्पेन के सामने होंगे, जो उनकी ‘कर्मभूमि’ रही है. जहां उनका बचपन बीता. जिस देश ने मेसी को फुटबॉल सिखाया, अब उसी के खिलाफ पांव चलाने हैं.
लेकिन क्या आपको पता है, इतिहास के रास्ते पर एक मोड़ ऐसा भी आया था, जब मेसी की पहचान बन चुकी आसमानी-सफेद जर्सी लाल भी हो सकती थी. अब तो ये कल्पना भी मुश्किल है लेकिन ये सच बात है कि उस समय मेसी की सिर्फ एक ‘हां’ स्पेन के फुटबॉल के इतिहास की धारा बदल देती. मेसी स्पेन के खिलाड़ी हो सकते थे और ये करीब-करीब हो भी गया था. यही वजह है कि 19 जुलाई को जब स्पेन के खिलाफ, मेसी मैदान पर उतरेंगे तो उनके लिए यह विश्वकप फाइनल की बजाय ‘कर्मभूमि बनाम जन्मभूमि’ का भावनात्मक मुकाबला ज्यादा होगा.
क्या कहानी है ये इस पर आएंगे. पहले उस दिन वाले मैच के बाद मेसी के प्रतिद्वंद्वियों की प्रतिक्रिया पर चलते हैं.
अर्जेंटीना से 4-1 से करारी हार के बाद स्पेन के खिलाड़ी इनिएस्ता बोले कि ‘अच्छा है कि मेसी बार्सिलोना में मेरे साथ खेलते थे. मैं उनके खिलाफ खेलकर बेइज्जती बार-बार नहीं झेलना चाहता.’ वहीं, स्पेन के उस समय के कोच विसेंटे डेल बॉस्के ने तो यहां तक कह दिया कि ‘काश मेसी हमारी टीम में खेलते.’
इस ‘काश’ के पीछे जो ‘आकाश’ है, उसी में मेसी की वो कहानी बहती है, जिसमें ‘कृतज्ञता’ और ‘देशप्रेम’ के बीच द्वंद्व है. एक लंबा इंतजार भी है. स्तब्ध करने वाला टैलेंट है और उस टैलेंट को उसकी असली जगह तक पहुंचाने के लिए कायनात की हैरान करने वाली कवायद का मुजाहिरा है.
मेसी अर्जेंटीनी हैं या नहीं?आज भले मेसी अर्जेंटीना का पर्यायवाची हों लेकिन एक समय ये सवाल उनसे टकराता था कि क्या वो सच में ‘अर्जेंटीनी’ हैं? बार-बार उन्हें अपने देश के लिए वफादारी साबित करनी पड़ती थी. अपने किसी इंटरव्यू में मेसी ने खुद कहा था,
लोग मुझे ‘कैटालन’ (कैटेलोनिया, स्पेन का रहने वाला) कहते हैं तो बुरा नहीं लगता, लेकिन मुझे गुस्सा आता है कि वे सोचते हैं कि मैं ‘अर्जेंटीनी’ नहीं हूं.
आसमानी और सफेद जर्सी पहनने के बावजूद मेसी से अक्सर पूछा जाता कि क्या वह देश के लिए खेलते हुए भी उतनी जान लगाते हैं, जितना बार्सिलोना के लिए? हालांकि, 2022 में अर्जेंटीना के लिए विश्व कप ट्रॉफी उठाकर मेसी ने ऐसे लोगों का मुंह बंद कर दिया, लेकिन सवाल तो ये है कि मेसी जैसे ‘जादूगर’ खिलाड़ी के लिए ऐसी बातें क्यों कही गईं? उनकी देशभक्ति और उनके खेल पर शक कैसे कर लिया गया? इसे समझने के लिए हमें इतिहास में कई दशक पीछे जाना होगा.
वो दौर जब अर्जेंटीना की खान से निकले इस ‘कोहिनूर’ पर स्पेन की नजर थी. उसने लगभग मेसी को स्पेन की लाल जर्सी पहना ही दी थी. तब अगर स्पेन अपनी कोशिश में कामयाब हो जाता तो हो सकता था कि 2026 के फीफा वर्ल्ड कप के फाइनल में मेसी आसमानी-सफेद नहीं, लाल जर्सी में दिखते और उस पर देश का नाम लिखा होता- स्पेन.
क्या है मेसी की कहानी?मेसी की कहानी शुरू से जानने के लिए 2000 के दशक में चलते हैं. नई सदी ने आंखें खोली ही थीं. ठीक इसी समय अर्जेंटीना के रोसारियो में पैदा हुए एक होनहार बच्चे की प्रतिभा भी अंखुआ रही थी. लेकिन, 13 साल के इस दुबले-पतले लड़के लियोनल मेसी के शरीर में ग्रोथ हार्मोन्स की कमी थी. परिवार के पास इलाज कराने के पैसे नहीं थे. इलाज का खर्च भारी-भरकम था. ठीक इसी समय मेसी ने स्पेन के बार्सिलोना में मौजूद ‘ला मासिया’ अकादमी में कदम रखा.
‘ला मासिया’ बार्सिलोना क्लब की फुटबॉल ट्रेनिंग अकादमी है, जहां बच्चों को फुटबॉलर बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है.
बार्सिलोना क्लब ने लड़के के इलाज का खर्चा उठाने का फैसला किया. तकरीबन एक हजार डॉलर महीना. ये वो खर्च था, जिसे उठाने में अर्जेंटीना के बड़े-बड़े क्लबों ने हाथ खड़े कर दिए थे, लेकिन बार्सिलोना क्लब ने ये जिम्मेदारी ली. इतना ही नहीं, क्लब ने मेसी के पिता होर्खे मेसी को 70 हजार डॉलर सालाना की नौकरी भी दी.
गाड़ी चल निकलीमेसी की गाड़ी चल निकली. ला मासिया में साथ ट्रेनिंग लेने वाले खिलाड़ी इस लड़के की प्रतिभा से हैरान होेते. खुश होते. गर्व करते. लेकिन जब इस स्पेशल टैलेंटेड खिलाड़ी के भविष्य को अंधियारे में देखते तो दुखी हो जाते. मेसी के जीवन के इस कोने में एक अजीब सा सन्नाटा था. अकेलापन था. गजब की प्रतिभा होने के बावजूद निराशा थी. क्लब में मेसी के साथ खेलने वाले खिलाड़ी अपनी नेशनल टीम के साथ खेलने चले गए.
हर हफ्ते ला मासिया के ‘स्टूडेंट्स’ अपने देश की जर्सी पहने बाहर निकलते लेकिन मेसी के लिए कहीं से कोई पुकार नहीं आती. उनके अपने देश अर्जेंटीना के लोगों को तो पता भी नहीं था कि समुंदर के पार स्पेन में एक ऐसा तूफान उठने के लिए तैयार हो गया है, जो उनकी अपनी जमीन और देश का है. यह बेजोड़ खिलाड़ी अपने देश की नेशनल टीम में आने के लिए बेताब है, लेकिन जौहरियों की नजर है कि हीरे पर पड़ती ही नहीं.
स्पेन की नजर मेसी परअर्जेंटीना भले आंखें फेरकर बैठा हो लेकिन स्पेन की नजर तो मेसी पर थी. यहां के खेल जगत में मेसी के खेल की धमक ने अपना असर छोड़ना शुरू कर दिया था. स्पेनिश फुटबॉल फेडरेशन के मन में इस विचार के बीज पड़ गए थे कि वो मेसी को स्पेन के लिए हथिया सकते हैं और माहौल भी इसके लिए पूरी तरह से अनुकूल है. जिनेस मेलेंदेज स्पेन के फुटबॉल जगत का बड़ा नाम हैं. वह खुद बार्सिलोना पहुंचे. मेसी का खेल देखकर उनके होश उड़ गए. बाद में उन्होंने एक इंटरव्यू में ये तक कह दिया कि ‘जब मैंने लियो को खेलते देखा तो मेरे मन में एक ही बात आई- इसे किडनैप कर लो.’
मेलेंदेज ने कहा कि मेसी कमाल का खिलाड़ी था, लेकिन अर्जेंटीना उसके लिए कुछ नहीं कर रहा था. ऐसे में उन्हें लगा कि इसे स्पेन की टीम में लाना चाहिए. लेकिन ये काम आसान नहीं था. स्पेन को अर्जेंटीनी फुटबॉल संघ से अपने संबंध खराब नहीं करने थे. इसके अलावा मेसी के मन पर भी ये काफी हद तक निर्भर था कि वो कहां से खेलना चाहेंगे. उन्हें स्पेन के लिए खेलने को मनाना मुश्किल काम था.
मेसी के लिए स्पेन को चुनना फिर भी आसान था. उनके सारे दोस्त यहां थे. उनका बचपन यहां बीता. इसी देश ने उन्हें जीवनदान दिया. उनके पिता को नौकरी दी, लेकिन 13 साल के इस बच्चे के दिमाग में कुछ और ही था. मेसी ने खुद इस बारे में बताया कि उन्हें काफी अप्रोच किया गया. इनडायरेक्टली जानने की कोशिश की गई कि क्या वो स्पेन के लिए खेलेंगे? लेकिन उन्होंने हमेशा एक ही जवाब दिया कि वह सिर्फ अर्जेंटीना के लिए खेलना चाहते हैं. यही रंग है, जो उनका अपना है.
एक टेप ने बदल दी कहानीइधर, स्पेन हार नहीं मान रहा था. उसकी कोशिशें जारी थीं. मेसी के एजेंट थे, होरासियो गाग्जियोली. स्पेन ने पहले उन पर दबाव बनाने की कोशिश की. लेकिन गाग्जियोली ने साफ कह दिया कि ये मेसी के परिवार को तय करना है कि वो किस देश से खेलना चाहता है. गाग्जियोली चाहते थे कि मेसी अर्जेंटीना से खेलें लेकिन अर्जेंटीना तो अपनी दुनिया में मस्त था. उसकी नजर इस हीरे पर जा ही नहीं रही थी. फिर आया साल 2002. इसने कहानी में नया मोड़ ला दिया.
अर्जेंटीना की सीनियर टीम फुटबॉल खेलने स्पेन आई थी. उस समय टीम के कोच थे- मार्सेलो बिएल्सा. मार्सेलो अपने असिस्टेंट क्लाउडियो विवास के साथ स्पेन आए थे. गाग्जियोली को ये सही मौका लगा. वह बार्सिलोना क्लब में मेसी के मैच की एक रिकॉर्डिंग का टेप लेकर वहां पहुंच गए, जहां अर्जेंटीना की टीम ठहरी थी. उन्होंने ये टेप विवास को दे दिया. विवास बिजी थे. पहले तो उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया लेकिन गाग्जियोली बार-बार उनके दरवाजे पर दस्तक देते रहे. तब जाकर विवास ने होटल के कमरे में टेप चलाया. मेसी का खेल देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं. छोटे कद का लंबे बालों वाला लड़का, विपक्षी टीम के डिफेंडरों को ऐसे छका रहा है, जैसे वो फुटबॉलर न हों, सिर्फ पत्थर हों.
विवास भागे-भागे कोच बिएल्सा के पास गए. मेसी के बारे में बताया. काफी बिजी दिख रहे बिएल्सो ने बेपरवाही से पूछा कि क्या वो सच में इतना अच्छा है? विवास ने जवाब दिया-
'No. He's not just good. He's unbelievable.' यानी सिर्फ अच्छा नहीं. वो अविश्वसनीय है.
बिएल्सा ने खुद वीडियो देखा. स्ट्रीम देखकर विवास से कहा, वीडियो फास्ट फॉरवर्ड पर क्यों चला रहे हो? मुझे पूरा मैच आराम से देखना है. जवाब आता है, सर वीडियो नॉर्मल स्पीड पर है. ये मेसी की रफ्तार है. वो इतने ही तेज हैं. बिएल्सा हैरानी से मैच देखते रहे.
मेसी के जीवन में अब कुछ बदला था. अर्जेंटीना को भनक लग गई थी कि कोई खिलाड़ी है, तूफान की तरह तैयार हो रहा है. अगर ये हाथ से चला गया तो इतिहास कभी उन्हें माफ नहीं करेगा.
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शेफ की वो बातलेकिन, कभी-कभी किस्मत का दरवाजा खुलते-खुलते खुलता है. मेसी के साथ भी यही हो रहा था. उन्हें अर्जेंटीना की टीम में लाने की कवायद की रफ्तार मैदान में उनकी रफ्तार के ठीक उल्टी थी. उनके खेल का टेप कुछ समय बाद अंडर-20 टीम के कोच ह्यूगो टोकाली के पास पहुंच गया. टोकाली पहले से ही मेसी के खेल से प्रभावित थे. टेप देखकर और हो गए लेकिन उनके सामने एक मजबूरी थी. फिनलैंड में अंडर-20 टीम का वर्ल्ड कप होना था. इसके लिए टीम चुनी जा चुकी थी. चुने गए लोग दो साल से तैयारी कर रहे थे. टोकाली ने कहा कि सिर्फ एक खिलाड़ी की वजह से वो उन बाकी खिलाड़ियों की दो साल की मेहनत बेकार नहीं कर सकते. अगर मेसी के लिए किसी को ड्रॉप किया तो उसका दिल टूट जाएगा. ये चीज वो नहीं चाहते.
बात 2003 की है. अंडर-17 वर्ल्ड कप के एक मैच में स्पेन ने अर्जेंटीना को हरा दिया था. मैच के बाद दोनों टीमें एक ही होटल में डिनर कर रही थीं. स्पेन की टीम का जो मेन शेफ था, वो इसी समय टोकाली के पास आया. उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा,
अगर बार्सिलोना के उस लड़के को अपनी टीम में रख लोगे तो तुम्हारी टीम वर्ल्ड कप जीत जाएगी.
टोकाली ने कहा कि ‘क्या तुम मेसी की बात कर रहे हो?’ इस पर शेफ ने कहा, ‘मतलब तुम उसे जानते हो, फिर भी वो तुम्हारी टीम में नहीं है.’
टोकाली ने बाद में याद किया कि ये बात उन्हें नश्तर की तरह चुभी. उनका भ्रम टूट गया था. अर्जेंटीना लौटते ही उन्होंने अर्जेंटीनी टीम के मैनेजर से कहा,
मेसी के पिता के मुंह से निकला- आखिरकार…मुझे नहीं पता तुम क्या करोगे… कैसे करोगे? लेकिन जैसे भी हो. जहां से भी हो. बार्सिलोना के उस लड़के को लेकर यहां आओ.
अर्जेंटीना टीम के मैनेजर ओमार साउतो के पास मेसी का कोई नंबर नहीं था. न तो उनके परिवार का पता था. वो सिर्फ एक नाम जानते थे- मेसी. उनके लिए इतना भी काफी था. मेसी की तलाश की शुरुआत उन्होंने ऐसे की कि वह एक टेलीफोन बूथ में घुसे. टेलीफोन डायरेक्ट्री मंगवाई और मेसी नाम के जितने लोग थे, सबको फोन मिला दिया. सैकड़ों पेसो खर्च करने के बाद आखिरकार एक बुजुर्ग महिला ने फोन उठाया और बताया कि वह लियोनल मेसी की नानी सेलिया ओलिवेरा कुच्चितीनी है. नानी ने राउतो को मेसी के चाचा का नंबर दिया. चाचा ने मेसी के पिता होर्खे का स्पेन वाला नंबर दिया. साउतो ने तुरंत होर्खे मेसी को फेन मिलाया और कहा कि वह अर्जेंटीना फुटबॉल एसोसिएशन से बोल रहे हैं.
इतना सुनते ही होर्खे मेसी के मुंह से सिर्फ इतना ही निकला- “Finally.” (आखिरकार)
अर्जेंटीना में मेसी युगहोर्खे ने राउतो को मेसी के बारे में पूरी जानकारी दी. बताया कि उसका नाम लियोनल मेसी है. वह तो कबसे अर्जेंटीना के बुलावे का वेट कर रहा है. इसके कुछ दिन बाद ही एसोसिएशन ने बार्सिलोना क्लब को एक फैक्स भेजा. इसमें मेसी को अर्जेंटीना की जूनियर टीम के लिए रिलीज करने की मांग की. ये वो ऐतिहासिक फैक्स था, जो अर्जेंटीना के गौरवशाली फुटबॉल इतिहास का नींव रख रहा था, लेकिन इसी कागज पर मेसी का नाम गलत लिखा था. फैक्स में Lionel Messi की जगह लिखा था- LEONEL MECCI.
मेसी का अर्जेंटीना की राष्ट्रीय टीम में आने का रास्ता साफ हो गया. 29 जून 2004, ये वो ऐतिहासिक तारीख है, जब पराग्वे के खिलाफ एक दोस्ताना मैच में मेसी पहली बार आसमानी-सफेद जर्सी में अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखे. मैदान पर उतरते ही गोल दागकर मेसी ने जैसे दुनिया के सामने ऐलान कर दिया कि ‘मौसम बिगड़ने नहीं बनने वाला है. सब कुर्सी की पेटी बांध लें. क्योंकि वो आ गए हैं.’
इस U-20 इंटरनेशनल डेब्यू के साथ अर्जेंटीना के इतिहास की किताब में मेसी नाम के महान अध्याय की शुरुआत हो गई. 17 अगस्त 2005 को उन्होंने हंगरी के खिलाफ अर्जेंटीना के लिए सीनियर डेब्यू भी कर लिया. लेकिन एक चैप्टर था, जो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया था. मेसी का स्पेन चैप्टर. स्पेन की फुटबॉल टीम का रास्ता उनके लिए हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गया. वो रास्ता, जिस पर अगर मेसी जाते तो स्पेनिश फुटबॉल का तेवर अलग होता.
जबसे फीफा वर्ल्ड कप फाइनल में अर्जेंटीना-स्पेन का मुकाबला तय हुआ है, तबसे एक फोटो वायरल हो रही है. स्पेन के लमीन यमाल के साथ मेसी की तस्वीर. मेसी बेबी लामिन यमाल को एक टब में नहला रहे हैं. लेकिन स्पेन और मेसी का कनेक्शन सिर्फ ये फोटो भर नहीं है. स्पेन के साथ उनका गहरा और भावनात्मक रिश्ता है, जिसे न कभी मेसी भूल पाएंगे. न स्पेन.
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