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डेढ़ लाख की आबादी वाला ये देश कैसे कर गया FIFA World Cup के लिए क्वालिफाई?

दुनिया के नक्शे में क्यूरासाओ नीदरलैंड्स से लगभग 8000 किलोमीटर की दूरी पर है. और केवल 444 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है.

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कुरासाओ फुटबॉल पहली बार फीफा वर्ल्ड कप में खेलने वाला है. (Photo-Curacao Football Team)

वेनेजुएला से 60 किलोमीटर नॉर्थ चलेंगे तो नीदरलैंड्स किंगडम का एक छोटा सा देश दिखेगा. नाम ‘क्यूरासाओ’ (Curaçao). Caribbean Sea में पड़ने वाला ये देश सफेद बीचेज़ के लिए काफी फेमस है. लेकिन इस वक्त ये फुटबॉल की दुनिया में हेडलाइन बना हुआ है. हो भी क्यों न, महज डेढ़ लाख की आबादी वाले इस देश ने वह कारनामा कर दिया है, जो भारत आज तक नहीं कर पाया. क्यूरासाओ FIFA World Cup 2026 में अपना डेब्यू करने वाला है. वो इस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाला अभी तक का सबसे छोटा देश है. 

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टूरिज़म के सहारे चलने वाला देश फुटबॉल की दुनिया में इतना बड़ा कैसे बन पाया? इस देश की फुटबॉल टीम ने वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई कैसे किया? पूरी कहानी विस्तार से जानते हैं.

क्यूरासाओ देश का इतिहास

पहले तो यह जान लेते हैं कि यह देश हैं कहां? क्योंकि नीदरलैंड्स के नाम से जाएंगे, तो कन्फ्यूज हो जाएंगे. वैसे तो ये देश नीदरलैंड्स किंगडम का हिस्सा है. लेकिन दुनिया के नक्शे में ये देश नीदरलैंड्स से लगभग 8000 किलोमीटर की दूरी पर है. केवल 444 स्क्वायर किमी में फैला हुआ है. क्यूरासाओ कितना छोटा है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा लीजिए कि नई दिल्ली का एरिया 1483 स्क्वायर किमी है. माने, क्यूरासाओ नई दिल्ली का एक तिहाई ही है. 

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काफी सालों पहले ये स्पेनिश कॉलोनी का हिस्सा था. 1634 में डच ने इस देश पर कब्जा किया. उस समय यहां कैटल फार्मिंग काफी की जाती थी. हालांकि, 1662 में उन्होंने इस आईलैंड को ह्यूमन स्लेव ट्रैफिकिंग का हेडक्वार्टर बना लिया. 

2010 मे क्यूरासाओ को आजादी मिली. लेकिन क्यूरासाओ में नीदरलैंड्स का दखल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. वह डिफेंस से लेकर चुनावों, और कई तरह के प्रोग्राम्स के जरिए इंटरफियर करता रहा. क्यूरासाओ में ज्यादातर लोगों की भाषा डच ही रही. यही कारण है कि इस देश में अब भी डच कल्चर का असर दिखता है. 

ये तो रही इतिहास और कल्चर की बात. अब आते हैं असल मुद्दे पर. क्यूरासाओ में फुटबॉल के इतिहास की बात करते हैं.

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क्यूरासाओ फुटबॉल का सुनहरा दौर

1930 से 1955 तक क्यूरासाओ फुटबॉल टीम अपने इसी नाम से ही टूर्नामेंट में हिस्सा लेती रही. 1950 में हुए सेंट्रल अमेरिकन कैरिबियन गेम्स में इस देश ने गोल्ड मेडल भी अपने नाम किया. 

इसके बाद टीम नीदरलैंड्स एंटीलीज के नाम से खेलने लगी. 1959 से 1970 तक ऐसा ही रहा. टीम ने कई बड़े टूर्नामेंट्स में मेडल्स जीते. इस दौर को उनके फुटबॉल का गोल्डन पीरियड भी कहा जाता है. टीम इस CONCACAF चैंपियनशिप और गोल्ड कप में दो बार ब्रॉन्ज मेडल जीता.

कोच ने सब कुछ बदला

1970 से 2010 के बीच चीजें अच्छी नहीं रही. 2010 में मिली आजादी के बाद से टीम फिर से ‘क्यूरासाओ’ के नाम से खेलने लगी. अलग-अलग कोचे ने टीम की किस्मत बदलने की कोशिश की. लेकिन वह अपने प्लान में सफल नहीं हो पाए.

इसके बाद एंट्री हुई डिक एडवोकाट की. 78 साल के इस कोच को फीफा वर्ल्ड कप का 'बिग मैन' कहा जाता है. वह 11 अलग-अलग देशों के हेड कोच की भूमिका निभा चुके है. 1994 में उन्होंने नीदरलैंड्स को क्वार्टर फाइनल में पहुंचाया था. उस वक्त टीम ब्राजील से हार गई थी. इसके बाद वो 2006 में वह कोरिया के कोच बने.

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2023 का साल आया. क्यूरासाओ फुटबॉल फेडरेशन ने एडवोकाट को कोच बनने का ऑफर दिया. लेकिन एडवोकाट ने मना कर दिया. उनका कहना था कि जब तक फेडरेशन का काम सही तरीके से नहीं चलता, वह टीम से नहीं जुड़ेंगे.  

ये वो समय था जब क्यूरासाओ फुटबॉल खराब दौर से गुजर रहा था. फेडरेशन के पास पैसा नहीं था. मैनेजमेंट की आपस में बन नहीं रही थी. FIFA भी नजर गड़ाए बैठा हुआ था. पर एडवोकाट ने जब ऑफर ठुकराया, तो फेडरेशन ने अपनी स्थिति संभाली. 2024 में कई स्पॉन्सर फेडरेशन से जुड़े. मैनेजमेंट में कई बदलाव किए गए. इसके बाद 2024 में एडवोकाट टीम से जुड़ गए. 

डिक एडवोकाट  का जादू

एडवोकाट जानते थे कि क्यूरासाओ की डेढ़ लाख की जनसंख्या से टीम तैयार करना आसान नहीं होगा. उन्होंने उन खिलाड़ियों को कॉन्टैक्ट करना शुरू किया, जो क्यूरासाओ से ताल्लुक रखते थे और खेलने के लिए एलिजिबल थे. 

इसमें कई बड़े नाम शामिल थे. मसलन, जस्टिन क्लाईव, राशेद ली बाजूर, अरमांडो ओइसपो, जोशुआ ब्रेनेट, तहित चोंग, सांतिया हैंसन, शिरांडे सैंपल और टॉमी सेंट जागो. केवल सेंट जागो और क्लाइव ने तो यह ऑफर ठुकरा दिया. बाकी सभी अपने देश के लिए खेलने के लिए तैयार थे.

टैलेंट पूल में ज्यादातर वही खिलाड़ी थे जो कि नीदरलैंड्स सेटअप के थे. तहित चोंग टीम के इकलौते प्लेयर थे जो कि क्यूरासाओ में पैदा हुए. वह भी 8 साल की उम्र में नीदरलैंड्स चले गए थे. एडवोकाट जब कोच बने, तब उनकी टीम रैंकिंग में 91वें नंबर पर थी. एडवोकाट अपने साथ-साथ अपना कोचिंग स्टाफ भी लेकर आए. टीम को प्रोफेशनलिज्म का पाठ पढ़ाया. कई बदलाव किए. धीरे-धीरे टीम की रैंकिग सुधरी. टीम 82 नंबर पर आई.

क्यूरासाओ का रोड टू वर्ल्ड कप

इसके बाद क्यूरासाओ ने फीफा वर्ल्ड कप 2026 को टारगेट किया. CONCAF क्वालिफाइंग के दूसरे राउंड के साथ अपना सफर शुरू किया. यहां उन्होंने अपने सभी चार मैच जीते और तीसरे राउंड में पहुंच गए. वह इस राउंड में बर्मूडा, त्रिनिदाद और टोबागो-जमैका के साथ थे. उन्होंने यहां दो मैच ड्रॉ किए और तीन में जीत हासिल की. 

टीम के लिए जमैका के खिलाफ मैच करो या मरो वाला था. मैच रोमांचक था और 0-0 से ड्रॉ रहा. इस ड्रॉ हुए मैच ने क्यूरासाओ को फीफा वर्ल्ड कप का टिकट दिला दिया.

क्यूरासाओ की टीम 14 जून को जर्मनी के खिलाफ अपना पहला वर्ल्ड कप मैच खेलने उतरेगी. ऐतिहासिक क्वालिफिकेशन के बाद टीम का सफर कितना ऐतिहासिक होता है, यह 14 जून के बाद ही पता चलेगा.

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