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किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समन्दर को जा रहा है, ये वक़्त क्या है?

एक कविता रोज़ में आज आपको जावेद अख्तर की नज़्म के साथ दो बोनस ग़ज़लें भी पढ़वा रहे हैं.

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फोटो - thelallantop
पांच राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, छः फिल्मफेयर पुरस्कार, पद्म श्री, पद्म भूषण, साहित्य अकादमी जैसे ढेरों प्रतिष्ठित पुरस्कार पा चुके जावेद अख्तर का शायरी और नज़्मों से रिश्ता जनरेशन पुराना है.
जावेद अख्तर के पिता जांनिसार अख्तर प्रगतिशील राइटर्स आंदोलन का एक हिस्सा थे. उनकी ग़ज़लें मुशायरों और उनके गीत बॉलीवुड में काफी पसंद किए जाते थे. एक बानगी देखिये:
अशआ'र मिरे यूं तो ज़माने के लिए हैं कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं.
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं.
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं.
आंखों में जो भर लोगे तो कांटों से चुभेंगे ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं.
देखूं तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं.
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं.
जावेद अख्तर के दादा मुज़्तर खैरबादी, उनके परदादा के बड़े भाई बिस्मिल खैरबादी और उनके दादा के दादा फ़ज़ल-ए-हक़ खैरबादी भी एक कवि/नज़्मकार थे. जनाब फ़ज़ल-ए-हक़ ने तो मिर्ज़ा ग़ालिब के अनुरोध पर उनके पहले दीवान को भी संपादित किया था और बाद में उन्होंने अपनी मूल जगह खैराबाद में रहते हुए 1857 की क्रांति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था. कैफ़ी आज़मी जावेद अख्तर के ससुर हैं ये तो सब जानते ही हैं. बात निकल पड़ी है तो कैफ़ी आज़मी की भी एक ग़ज़ल पेश-ए-नज़र:
झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं
तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं
वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं
तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूं दुनिया को तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं
मतलब अगर एक लाइन में कहें तो जावेद अख्तर का परिवार लेखन के क्षेत्र में वही रुतबा रखता है जो कपूर और चौपड़ा परिवार फ़िल्म निर्माण में.
जावेद अख्तर के साथ और बाद वाली जनरेशन तो बॉलीवुड में भी काफी नाम कम चुकी है.
जावेद अख्तर की फैमिली में दूर दूर तक कोई ऐसा नहीं जो 'सेलिब्रिटी' न हो

जावेद अख्तर की फैमिली में दूर दूर तक कोई ऐसा नहीं जो 'सेलिब्रिटी' न हो
उनकी पत्नी शबाना आज़मी एक मशहूर अभिनेत्री हैं और अपनी कमाल की एक्टिंग के लिए जानी जाती हैं. ‘रॉक ऑन’,’भाग मिल्खा भाग’, ‘दिल चाहता है’ फेम उनके सुपुत्र फ़रहान अख्तर का नाम भी किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. ज़ोया अख्तर, जो उनकी सुपुत्री हैं की डायरेक्ट की हुई फ़िल्म, ‘ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा’ को निर्देशन के लिए फिल्मफेयर, IIFA, ज़ी सिने और अप्सरा अवार्ड मिल चुका है.
‘शोले’,’मिस्टर इंडिया’,’दीवार’, ‘जंज़ीर’ और ‘सीता और गीता’ जैसी फिल्मों के लिए सलमान खान के पिता सलीम खान के साथ मिलकर स्क्रिप्ट राइटिंग कर चुके अख्तर सा’ब आजकल सोशल मिडिया में अपने बोल्ड बयानों के लिए भी कम सुर्ख़ियों में नहीं रहते. ‘इंडियन आइडल’ शो को होस्ट/जज करते वक्त वो गायकों को उनके तल्फ्फुज़(डिक्शन) पर संजीदगी से टिप्पणियां देते थे.
उनकी नज़्मों, कविताओं और ग़ज़लों का संग्रह,'तरकश' न केवल उनके लेखन बल्कि उनके खट्टे-मीठे अनुभवों को, जो किताब के कुछ शुरूआती पन्नों में शेयर किए गये हैं, जानने के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए.
तरकश में एक जगह वे लिखते हैं - मेरी उम्र आठ बरस है. बाप बम्बई में है, मां कब्र में.
तरकश में एक जगह वे लिखते हैं - मेरी उम्र आठ बरस है. बाप बम्बई में है, मां कब्र में.
आज हम एक कविता रोज़ में उनकी नज़्म ‘वक़्त’ आपको पढ़वा रहे हैं. इस नज़्म को उन्होंने रिसाईट भी किया है इस दौरान उनकी पत्नी शबाना ने इस नज़्म का अंग्रेजी तज़रुमा रिसाईट किया था.
ये रहा उसका यू-ट्यूब वीडियो:

ये वक़्त क्या है? ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था, तब कहां था कहीं तो होगा गुज़र गया है तो अब कहां है कहीं तो होगा कहां से आया किधर गया है ये कब से कब तक का सिलसिला है ये वक़्त क्या है

ये वाक़ये हादसे तसादुम हर एक ग़म और हर इक मसर्रत हर इक अज़ीयत हरेक लज़्ज़त हर इक तबस्सुम हर एक आंसू हरेक नग़मा हरेक ख़ुशबू वो ज़ख़्म का दर्द हो कि वो लम्स का हो ज़ादू ख़ुद अपनी आवाज हो कि माहौल की सदाएं ये ज़हन में बनती और बिगड़ती हुई फ़िज़ाएं वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल तमाम एहसास सारे जज़्बे ये जैसे पत्ते हैं बहते पानी की सतह पर जैसे तैरते हैं अभी यहां हैं अभी वहां है और अब हैं ओझल दिखाई देता नहीं है लेकिन ये कुछ तो है जो बह रहा है ये कैसा दरिया है किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समन्दर को जा रहा है ये वक़्त क्या है

कभी-कभी मैं ये सोचता हूं कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो तो ऐसा लगता है दूसरी सम्त जा रहे हैं मगर हक़ीक़त में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं तो क्या ये मुमकिन है सारी सदियां क़तार अंदर क़तार अपनी जगह खड़ी हों ये वक़्त साकित हो और हम हीं गुज़र रहे हों इस एक लम्हें में सारे लम्हें तमाम सदियां छुपी हुई हों न कोई आइन्दा न गुज़िश्ता जो हो चुका है वो हो रहा है जो होने वाला है हो रहा है मैं सोचता हूं कि क्या ये मुमकिन है सच ये हो कि सफ़र में हम हैं गुज़रते हम हैं जिसे समझते हैं हम गुज़रता है वो थमा है गुज़रता है या थमा हुआ है इकाई है या बंटा हुआ है है मुंज़मिद या पिघल रहा है किसे ख़बर है किसे पता है ये वक़्त क्या है

मुसलसल- लगातार, तसादुम- संघर्ष, मसर्रत- ख़ुशी, अज़ीयत - तकलीफ़, तबस्सुम - मुस्कराहट, लम्स - छुअन, साकित - ठहरा हुआ, गुज़िश्ता - भूतकाल, मुंज़मिद - जमा हुआ


कुछ और कविताएं यहां पढ़िए:

‘पूछो, मां-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं’

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‘ठोकर दे कह युग – चलता चल, युग के सर चढ़ तू चलता चल’

मैं तुम्हारे ध्यान में हूं!
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