धूप बहुत है आँखों को धो लिया जाये अरसा हुआ जी भर के रो लिया जाये सफ़र लंबा है और कोई साथ नहीं जाने वाला घड़ी दो घड़ी के लिए तो सो लिया जाये सबके अपने गुनाह हैं अपनी नेकियाँ क्यों न बगीचे में आइना बो लिया जाये जिंदगी की धूप ने छीन लिया माँ के आँचल में सिमटने का सुकून चलो किसी यतीम को गोद ले लिया जाये *** अज्ञानता और ज्ञान के बीच एक अबोध मन को कितना कुछ दे जाती है किताबों की माथापच्ची रिश्तों की रोशनाई से सुफैद बचपन लिखने लगता है अंतहीन प्रेम जीवन के इस छोर से उस छोर तक सपने हरे होने लगते हैं इतने जैसे भोर में उगे हों सूरज की पहली किरण की खाद में पले जिंदगी से लबरेज मगर वक्त के साथ कितना कुछ बदल देता है ज्ञान होने का गुमान किताबों से ऊपर उठ जाने की आत्ममुग्धता अबोध मन पर हावी हो जाता है दिमाग गुणा भाग और हासिल प्रेम की जगह फिर मरने लगते हैं रिश्ते और सपने जलती दोपहरी में तेज धूप
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