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'काशी का महात्म्य है, बनारस का जादू है, पटना का क्या है'

एक कविता रोज़ में पढ़िए शुभम श्री की कविता-

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फोटो - thelallantop

शुभम श्री हिंदी कविता की नौजवान खेप का हिस्सा हैं. शुभम वो नहीं लिखतीं जो सब लिखते हैं. होती है वो कविता, अलग कलेवर की. जो शब्द कविता की पहचान माने जाते हैं. वो आपको यहां नहीं मिलेंगे. चाहे पांच सेल वाली टॉर्च जलाकर खोजो. भाषा और ताजगी का नया ही एहसास कराती हैं शुभम की कविताएं. पढ़िए उन्हीं की ये कविता-

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प-ट-ना

  पता नहीं वो कौन से सनम हैं जिनके महबूब शहर हुआ करते हैं. उन आशिकों की माशूका गलियां, गालियां, नुक्कड़, दुकानें, मिठाइयां तमाम मार लिफाफियां बुद्धू सा कोई पढ़ने वाला तो खिंचा चला जाए उस शहर में जैसे कि बनारस आदमी गोबर से बचे कि पान की पीक से चप्पल चोर से बचे कि पंडों से सबसे बचे तो बित्ते भर की जगह में घुसी चली आती साइकिल से कैसे बचे और बच भी जाए तो बजबजाती गंगाजी में चहक चहक कर पेशाब करते लड़कों की बगल में नहाने से कैसे बचे काशी का महात्म्य है बनारस का जादू है पटना का क्या है हलुआ! पूरा शहर एक विशाल कूड़ेदान है समझ लें कि एक बड़ा पीकदान है जिसमें कुल्ले से लेकर पान और गुटके से लेकर गुल, कहीं भी थूका जा सकता है मौसम कोई भी हो पानी इतना जरूर जमता है कि लोग पैदल सड़क पार करने से ज्यादा तेज ईंटों पर तालाब पार कर लें और यह सब प्रपंच होता रहता है दिनरात शहर के शाश्वत संगीत राग टेंपूध्वनि पर इसी बैकग्राउंड में रियाज करता है पटनावासी सप्तम सुर पर हीरोगिरी प्रकट करते महिन्द्रा मोटर्स पर अश-अश करता देश भर में जितने स्कॉर्पियो, बोलेरो होंगे उतने सिर्फ बेली रोड पर ही और उनपर शोभायमान वार्ड पार्षद, ब्लॉक सचिव सहित छात्र मोर्चा अध्यक्ष जिनके शीशों से टकराकर बदबू की तेज लहर लौट जाती है किसी रिक्शेवाले के नाक में घुसने के लिए इस जमाने में बीस रुपइया गिलास सत्तू बेचने पर आदमी ठेलेवाले को पाकिस्तान भेज दे रहा है यहां नेता तय ही नहीं कर पा रहा है किसको पाकिस्तान भेजे अजीब मुसीबत है जातियों के अखिल भारतीय महासम्मेलन हो रहे हैं बेटे आईआईटी कंपीट कर रहे हैं बेटियां मेडिकल कंपीट कर रही हैं कोचिंग पढ़ाने वाले रेंज रोवर चला रहे हैं अब पटना यूनीवर्सिटी के लिए भी यही बेहतर होगा कि एक बोर्ड लगा ले ‘यहा तइयारी करने बाले बिद्यार्थीयो को डिगरी दिलाया जाता है, सीघ्र संपर्क करे’ जिस तरह महावीर मंदिर की लाइन फ्रेजर रोड तक पहुंच रही है, कोई शक नहीं अगले कुछ साल में वैष्णो देवी और तिरुपति को डाउन कर देगा महाबिर मंदिर मॉल बन रहा है, लिट फेस्ट हो रहा है, डोमिनोज खुल रहा है पटना अब वही पटना रहा क्या पटना बहूत एडभांस हो गया (अब तो जनानियां भी खुलेआम सूट पहनने लग गई हैं) हाय रे पसिंजर, इसी पटना के गुमान में भर रस्ता बिलाई बनके आने के बाद बक्सर से तुमको गर्मी चढ़ जाता है यही, जहां रिक्सा मीठापुर बस स्टैंड जाने के लिए पचास रुपइया भाड़ा मांग के तुम्हारा गर्मी झाड़ देता है
शुभम की कुछ और कविताएं यहां पढ़िए- 

'बुखार, ब्रेकअप, आई लव यू'

'पोएट्री मैनेजमेंट'

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