अखिलेश्वर समकालीन कविता का जाना-पहचाना चेहरा हैं. पेशे से पत्रकार हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. अभी झारखंड में पड़ाव है इनका. झारखंड के कोल्हान में तेजी से गायब हो रही आदिम जनजाति 'सबर' पर इनका जरूरी शोध-कार्य है. कविता संग्रह 'पानी उदास है' प्रकाशित हो चुका है. एक कविता रोज़ में आज पढ़िए इन्हीं की एक नई कविता -
'एक मादा पक्षी से प्यार करता हूं'
आज पढ़िए अखिलेश्वर पांडेय की कविता 'कामना'.
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फोटो - thelallantop
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कामना
मैं चींटियों के घर में रहता हूं मुसाफिर की तरह उनके लाए चावल और चीनी पर पलता हूं प्रेम कहानियां डूब कर पढ़ता हूं एक मादा पक्षी से प्यार करता हूं तितली बन चूमता हूं आसमान का माथा पहाड़ पर बैठा बूढ़ा बाज हूं गौर से देखता हूं नदी को बुझाता हूं आंखों की प्यास टहनी से विलग होते पत्ते की अंतहीन पीड़ा मेरे भीतर देर तक प्रतिध्वनित होती है शापग्रस्त पीठ पर पश्चाताप की गठरी की तरह मैं इंतजार में हूं एक ऐसे यायावर की... जो बच्चों के लिए मुस्कान लेकर आएगा एक ऐसे क्षण की... जब लोग प्रार्थना के बजाय कविताओं को मंत्र की तरह पढ़ेंगे और यह धरती पवित्र हो जायेगी पहले की तरह हमेशा-हमेशा के लिए!कुछ और कविताएं यहां पढ़िए:
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‘जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख'
‘दबा रहूंगा किसी रजिस्टर में, अपने स्थायी पते के अक्षरों के नीचे’
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वीडियो देखें- https://www.youtube.com/watch?v=Gcv71ct_HpE&t=134s






















