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एक कविता रोज: 'कैसे छुपाऊं राज़-ए-ग़म'

हसरत मोहानी की पुण्यतिथि पर पढ़िए उनकी एक ग़ज़ल.

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फोटो - thelallantop

कैसे छुपाऊं राज़-ए-ग़म

हसरत मोहानी  - कैसे छुपाऊं राज़-ए-ग़म दीदा-ए-तर को क्या करूं दिल की तपिश को क्या करूं सोज़-ए-जिगर को क्या करूं शोरिश-ए-आशिक़ी कहां और मेरी सादगी कहां हुस्न को तेरे क्या कहूं अपनी नज़र को क्या करूं ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूं बसर सब ये क़ुबूल है मगर ख़ौफ़-ए-सहर को क्या करूं हाल मेरा था जब बुरा तब न हुई तुम्हें खबर बाद मेरे हुआ असर अब मैं असर को क्या करूं ***

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