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मां दूसरी शादी करे तो क्या नाबालिग बच्चे को मेंटेनेंस मिलेगा? कोर्ट ने जवाब दे दिया

Allahabad HC News: Allahabad High Court ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का जिक्र किया, जिनमें कहा गया है कि मेंटेनेंस कानून पैसे की तंगी से बचाने के लिए बने हैं. कोर्ट ने कहा कि दूसरी शादी करने या एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से एक महिला अपने पति से गुजारा भत्ता पाने का हक खो सकती है.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चे के मेंटेनेंस पर अहम फैसला सुनाया. (ITG)

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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि नाबालिग बच्चों को उनके जैविक पिता से मेंटेनेंस मिले, चाहे मां दूसरी शादी कर ले या पति-पत्नी के बीच विवाद हो, फैमिली कोर्ट का निर्णय पलट दिया।
  • यह मामला उस स्थिति से उत्पन्न हुआ जहां पति ने अपनी पत्नी की दूसरी शादी का हवाला देते हुए बच्चों के मेंटेनेंस देने से इनकार किया था, जिसके खिलाफ महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
  • इस आदेश के बाद बच्चों को कानूनी सुरक्षा मिली है कि उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी पिता पर बनी रहेगी, और अब मामले में पिता पर मेंटेनेंस देने की बाध्यता और स्पष्ट हो गई है।

पति-पत्नी के बीच झगड़ों में अक्सर बच्चों का नुकसान होता है. ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाई कोर्ट में पहुंचा, जहां नाबालिग बच्चों के गुजारा भत्ते पर विवाद था. शख्स ने दलील दी कि महिला ने दूसरी शादी कर ली है, इसलिए वह अपने बच्चों को मेंटेनेंस नहीं देगा. फैमिली कोर्ट ने भी उसके पक्ष में फैसला सुनाया था. हालांकि, हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलट दिया.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच झगड़ा नाबालिग बच्चों के कानूनी हक पर असर नहीं डालता. कोर्ट ने कहा कि महिला दूसरी शादी करती है, तो भी नाबालिग बच्चों के पास अपने असली पिता से मेंटेनेंस लेने का कानूनी हक है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस पदम नारायण मिश्रा ने यह बात एक महिला और उसके नाबालिग बच्चों की अर्जी को कुछ हद तक स्वीकार करते हुए कही. 20 मई के आदेश में जस्टिस पदम नारायण मिश्रा ने कहा कि एक पति पर अपने नाबालिग बच्चों की परवरिश का खर्च उठाने की पूरी जिम्मेदारी है.

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नाबालिग बच्चों के खर्च की जिम्मेदारी पिता पर

जस्टिस पदम नारायण मिश्रा ने आगे कहा कि इस मामले में केवल उन कानूनों के तहत ही छूट मिल सकती है, जिन्हें कानून में मान्यता मिली है. यह जिम्मेदारी ना तो पति-पत्नी के बीच शादी के झगड़ों की वजह से खत्म होती है और ना ही मां के कथित तौर पर दूसरी शादी करने की वजह से खत्म होती है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोहराया कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) का सेक्शन 125 (पत्नी, बच्चों और माता-पिता का भरण-पोषण) सामाजिक न्याय का एक तरीका है. इसका मकसद महिलाओं, बच्चों और माता-पिता को छोड़ देने पर आर्थिक तंगी आदि से बचाना है.

बच्चों की भलाई सबसे ऊपर

अपने ऑर्डर में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का जिक्र किया, जिनमें कहा गया है कि मेंटेनेंस कानून पैसे की तंगी से बचाने के लिए बने हैं. सर्वोच्च अदालत के फैसले बाकी सभी बातों से परे जाकर बच्चों की भलाई को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं.

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महिला मेंटेनेंस का हक खो सकती है

हाई कोर्ट ने कहा कि दूसरी शादी करने या एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से एक महिला अपने पति से गुजारा भत्ता पाने का हक खो सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नाबालिग बच्चे भी अपने जैविक पिता से मेंटेनेंस का हक खो देते हैं. हाई कोर्ट ने फैमिली हाई कोर्ट का फैसले को पलटते हुए कहा कि नाबालिग बच्चे अपने जैविक पिता से गुजारा भत्ता लेने का हक रखते हैं.

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