‘हत्याएं और आत्महत्याएं एक जैसी रख दी गई हैं'
आज एक कविता रोज़ में पढ़िए आलोक धन्वा की कविता ‘फर्क’.
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फोटो - thelallantop
‘दुनिया रोज़ बनती है’ शीर्षक से कविताओं की एक किताब रचने वाले आलोक धन्वा के यहां कविता रोज़ नहीं बनती है. लेकिन जब भी बनती है काबिले-गौर बनती है. बहरहाल, मुल्क में माहौल इन दिनों कुछ यों है कि दुर्भाग्य से आलोक धन्वा की एक कभी भी पुरानी न पड़ने वाली कविता याद आ रही है. आज एक कविता रोज़ में पढ़िए उनकी ये कविता :
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