राकेश रंजन असल अर्थों में एक लोक-कवि हैं. उनकी कविताओं की पहली किताब 'अभी-अभी जन्मा है कवि' ने कविता-प्रेमियों का काफी ध्यान खींचा था. अब एक अरसे बाद कविताओं की उनकी एक और किताब राजकमल प्रकाशन से इस विश्व पुस्तक मेले में छपकर आई है, नाम है : 'दिव्य कैदखाने में'. उन्हें इस किताब के लिए बधाई देते हुए आज एक कविता रोज़ में पेश है उनकी एक कविता...
एक कविता रोज़: चूक न, मत कर अगर-मगर चल रंजनवा, महानगर
आज पढ़िए, महानगर को मुंह चिढ़ाती एक लोक-कवि की कविता.
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फोटो - thelallantop
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चल रंजनवा, महानगर
जहां बसें आलोचकवर उन्हें सुना देना कविताई
कर लेना घनघोर मिताई
लिख देंगे जब तुझ पर लेख
होगी तेरी बड़ी हिताई काहे भटके डगर-डगर
चल रंजनवा, महानगर हो जावेगा कविकुलराज
बचे-खुचे नोचेंगे खाज
इस कविता-सागर में, देख
यह आलोचकनाम जहाज चूक न, मत कर अगर-मगर
चल रंजनवा, महानगर
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