कहते हैं दुःख बांटने से घट जाता है. लेकिन उस अवसाद का क्या जो भाप सा अंदर-अंदर उठता है. जो इतना मौन है कि आंसुओं में भी नहीं निकलता. जो किसी आत्मकथा के शब्दों में नहीं उतर सकता. आज पढ़िए जयशंकर प्रसाद की कविता 'आत्मकथ्य'.
आत्मकथ्य
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मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियां देखो कितनी आज घनी.
इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास
यह लो, करते ही रहते हैं अपने वयंग्य मलिन उपहास
तब भी कहते हो-कह डालूं दुर्बलता अपनी बीती
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती.
किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले.
यह विडंबना! अरी सरलते हँसी तेरी उड़ाऊँ मैं
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं.
उज्जवल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की
अरे खिल-खिलाकर हँसने वाली उन बातों की.
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया.
जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्मकथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा. ***