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एक कविता रोज: अर्धसत्य - 1

एक कविता रोज में आज दिलीप चित्रे की कविता 'अर्धसत्य-1'.

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फोटो - thelallantop

दिलीप चित्रे कवि हैं. करीब आठ साल पहले गुजर चुके हैं, लेकिन कवि तो हमेशा रहेंगे. उनकी कविताओं ने जो मारक खेला रचाया है, आनंद देता है. मराठी थे. बड़ौदा में पैदा हुए थे. फिर 1951 में परिवार के साथ मुंबई चले आए. 60 के दशक में जो मुंबई की फेमस मैग्जीन थी 'लिटिल मैग्जीन मूवमेंट', उसके प्रभाव में इनकी भी हिस्सेदारी थी. मराठी और इंग्लिश, दोनों भाषाओं में कविताएं लिखीं. 1960 में एक कविता-संकलन भी प्रकाशित हुआ.

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आज हम आपके सामने पेश कर रहे हैं दिलीप चित्रे की एक कविता, 'अर्धसत्य-1'. फिल्म 'अर्धसत्य' में ओम पुरी स्मिता पाटिल के सामने बैठकर यही कविता दोहराते हैं. आप भी पढ़िए और सुनिए.

चक्रव्यूह में घुसने से पहले, कौन था मैं और कैसा था, ये मुझे याद ही न रहेगा.

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चक्रव्यूह में घुसने के बाद, मेरे और चक्रव्यूह के बीच, सिर्फ एक जानलेवा निकटता थी, इसका मुझे पता ही न चलेगा.

चक्रव्यूह से निकलने के बाद, मैं मुक्त हो जाऊं भले ही, फिर भी चक्रव्यूह की रचना में, फर्क ही न पड़ेगा.

मरूं या मारूं, मारा जाऊं या जान से मार दूं, इसका फैसला कभी न हो पाएगा.

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सोया हुआ आदमी जब, नींद से उठकर चलना शुरू करता है, तब सपनों का संसार उसे, दोबारा दिख ही न पाएगा.

उस रोशनी में जो निर्णय की रोशनी है, सब कुछ समान होगा क्या?

एक पलड़े में नपुंसकता, एक पलड़े में पौरुष, और ठीक तराजू के कांटे पर, अर्धसत्य.

सुनिए ओम पुरी को ये कविता पढ़ते हुए:

https://www.youtube.com/watch?v=x7bcdG0lTKo&feature=youtu.be&t=77
'एक कविता रोज' में पढ़िए कुछ और बेहतरीन कविताएं:

एक कविता रोज़: आदिवासी लड़कियों के बारे में

'रांड सांड सीढ़ी सन्यासी इनसे बचे सो आये कासी'

'दो जिस्मों की आदिम अकुलाहट भर नहीं होता प्रेम!'

'एक स्त्री ढूंढ़ती है अपनी नींद के पांच घंटे'

'यातना देने के काम आती है देह'

 

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