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'एक ट्रेन थी ग्यारह बीस की, जिससे तुम पहुंचना चाहती थी किसी तक'

आज पढ़िए गौरव सोलंकी की कविता.

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फोटो - thelallantop

गौरव सोलंकी IIT रुड़की से पढ़कर इंजीनियर हुए, लेकिन मन किस्सों-कहानियों और कविताओं में रमा रहा. हिंदी के चर्चित युवा कवियों और कहानीकारों में उनकी गिनती होती है. उनकी कविताओं का शिल्प खुरदुरा है और कलेवर तीखा. सोशल टैबूज पर उनका लिखा पढ़ने लायक है. हाल ही में राजकमल प्रकाशन से उनकी कहानियां प्रकाशित हुई हैं. कहानी संग्रह का नाम है- 'ग्यारहवीं A के लड़के'. फिलहाल वह मुंबई में अपने लेखन को विस्तार दे रहे हैं. अनुराग कश्यप की फिल्म 'अगली' का गाना 'निचोड़ दे' उन्होंने ही लिखा है. ऐसे कम लोग हैं जो दोनों ही विधाओं, मतलब कहानी और कविता में बराबर दख़ल रखते हों. गौरव ऐसे ही कुछ लेखकों में से एक हैं. एक कविता रोज़ में पढ़िए उनकी कविता:

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मेरे पास पैसे नहीं थे, तुम्हारे पास वक़्त नहीं

  मेरे पास पैसे नहीं थे, तुम्हारे पास वक़्त नहीं पर एक ट्रेन थी ग्यारह बीस की जिससे तुम पहुंचना चाहती थी किसी तक और वो नहीं आई बरसात की उस रात मैं एक बस के नीचे आते-आते बचा मैं पुकारता रहा तुम्हें रास्ता भूला तीन बार और एक नीली दीवार पर सर पटक कर रोया कोई नहीं दिखा सकता किसी को रास्ता यह मुझे बाद में पता चलना था पर उस रात मेरी एड़ियों पर केंचुए थे और छाती पर तसल्लियां भी नहीं उस रात से पहले मुझे लगता था कि तुम पहचानती हो मेरी आवाज़ का नमक कौन जानता है कि जब पुल टूटता है तो पुल ही टूटता है या यह यक़ीन बस, कि पुल था
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'बस इतना ही प्यार किया हमने'

‘ठोकर दे कह युग – चलता चल, युग के सर चढ़ तू चलता चल’

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