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मोदी को पिता ब्रह्मपुत्रा ने पुरस्कार दिया

बीजेपी के लिए आगे की राह, समझें इन पांच बातों से.

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फोटो - thelallantop
बात बीजेपी की. और इसके मुखिया नरेंद्र मोदी की. जिनकी कप्तानी में साल 2014 में पार्टी गनगना के सत्ता में आई. दिल्ली के पते वाले केंद्र में. और जो आई तो खूब छाई. राज्यों में भी झड़ाका कायम होने लगा. महाराष्ट्र में अपने दम सबसे बड़ी पार्टी बनी. शिवसेना को घुटनों के बल रेंग समर्थन हेतु आना पड़ा. झारखंड में सरकार बनी. और तो और, लालों की भूमि हरियाणा में भी पार्टी एक झटके में गठबंधन के जूनियर पार्टनर से सीधे चौधरी बन गई. फिर आया दिल्ली का एक और बसंत. फूल खिला अरविंद केजरीवाल नाम का. और लोगों को, खासकर मोदी विरोधियों को लगा कि जादू जो है, उसके बरक्स एक और छड़ी आ गई है. मगर एक और बड़ा मुदगर देश वाली दिल्ली पर गिरने को था. बिहार में बहार आई. नीतीश कुमार आए. और मोदी के अविजित होने का भरम भरभरा कर गिर गया. बिहार में बीजेपी से ज्यादा ब्रैंड मोदी की साख धूमिल हुई. ठीकरा मैनेजर अमित शाह के सिर फूटा. गैरबीजेपी केंद्रों में हलचलें बढ़ गईं. नए सिरे से सियासी रिश्तेदारियां बनाई जाने लगीं. बयान जारी होने लगे. साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस होने लगीं. जुमले गढ़े जाने लगे. उधर नरेंद्र मोदी की सरकार के दो साल पूरे हुए. आर्थिक हालातों पर तीखी आलोचना होने लगी. रही सही कसर सूखे ने पूरी कर दी. संसद में गतिरोध शाश्वत हो चला. बीजेपी और कांग्रेस की संसदीय जंग निजी खुन्नस में बदल गई. गोया जमीन के 10 बीघा के लिए 10 पीढ़ियां बिना रकबा जाने जूझने में खेत होने को तत्पर हों. तारीख आई 19 मई, 2016. नतीजे आए पांच राज्यों के. और मां गंगा के बेटे को पापा ब्रह्मपुत्रा ने नई चेतना बख्श दी. दिल्ली और बिहार की हार से सनाका खाए बीजेपी के घर ढोल पिटने लगे. लड्डू बंटने लगे. तो आइए मिठास के इस भगवा मौसम में पांच प्वाइंट पढ़ें. कि बीजेपी को क्या मिला और आगे का हाल कैसा हो सकता है.

नॉर्थ ईस्ट में खिड़की खुल गई है

असम में बीजेपी की सरकार बन रही है. ये ठिया होगा. नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में पार्टी की सप्लाई का. छोटे राज्यों का दिल्ली में दखल कम है. मगर मोदी की लुक ईस्ट पॉलिसी के लिए यहां बीजेपी का होना जरूरी है. मणिपुर में ऐसा हो भी गया. चुनावों से पहले ही. कांग्रेस के घरवालों में कट्टी करवा कर. त्रिपुरा में हंसिया हथौड़े वाले मजबूती से जमे हैं. सिक्किम में चामलिंग चमाचम चल रहे हैं. नागालैंड में शांति समझौता हो गया है. तो बीजेपी के नाम पर बिदकने वाले कम हैं. असम के सहारे सीमावर्ती पं. बंगाल में भी बीजेपी जलवा दिखा सकती है आगे चलकर. मगर एक दिक्कत भी है. चुनाव जीता बीजेपी ने. जोड़ी जो पिच पर जमी थी, उसमें बैटिंग एंड पर हैं. सर्वानंद सोनावाल. असम स्टूडेंट पॉलिटिक्स से आए नेता. मुख्यमंत्री का चेहरा. मगर दूसरे एंड पर जो लड़का खड़ा है. वो जल्द खुड़खुड़ करेगा. हेमंत बिस्वास सरमा. सत्ता में रह चुका है. मंत्रालय समझता है. रणनीति में माहिर रहा है. पर एक दिक्कत है. कुछ ही बरस हुए कांग्रेस से कमल दल में आए. तो उसे अभी संघ परिवार का यकीन जीतना होगा. मगर असम में बीजेपी की सेहत सर्वानंद और हेमंत की केमिस्ट्री पर ही तय होगी. आगे की एक बात और. ये संघ परिवार के प्रयोगों का भी नया गढ़ होगा. संघ असम को लेकर पिछले दो दशकों से एकनिष्ठ होकर काम कर रहा है. एक ही मिशन के साथ. आज उस मिशन के पूरा होने का दिन है. अब संघ शिक्षा में, संस्कृति में, समाज में सरकारी गलियारों के जरिए भी पैठ बनाएगा.

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बंगाल में अभी एक लोकल हीरो की स्क्रिप्ट लिखनी है

पश्चिम बंगाल में बीजेपी तीसरे मोर्चे के तौर पर पहचान बनाने की लड़ाई लड़ रही थी. उसके लिए नतीजे बस पासिंग मार्क्स भर के रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में बात दूसरी थी. पूरा देश मोदी को चुनें या न चुनें, इस पर वोट डाल रहा था. बंगालियों ने भी मोदी या ममता की तर्ज पर वोट डाले. लेफ्ट तो लुटयंस की दिल्ली में सत्ता के ब्रोकर सी छवि पर सिमट रह गए थे. ऐसे में बीजेपी को सीटें भले ही चार मिली हों पर वोट पर्सेंट दहाई पार गया था. लेकिन विधानसभा चुनावों में मोदी मैदान में नहीं थे. बात ममता रहें या जाएं की थी. जनादेश आ गया. लोगों ने कांग्रेस और लेफ्ट को नकार दिया. बीजेपी के पास पोरिवर्तन के लिए न नया नारा था, न चेहरा. तो उसे बस यही संतोष मिला कि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले वोट प्रतिशत और सीटें कई गुना बढ़ीं. पिछली बार बीजेपी जीरो थी. फिर उपचुनाव में एक सीट मिली. और अब आंकड़ा 6 पर पहुंच गया है. यहां पार्टी को अब ममता के खिलाफ असली विपक्ष की भूमिका हथियानी होगी. केंद्र में सरकार है. अगर मोदी राज्यसभा साधने के लिए ममतामयी होते रहे तो स्टेट यूनिट की लड़ाई कमजोर होगी. केंद्रीय मंत्रियों को भी सड़कों पर उतरना होगा. बाबुल सुप्रियो ये काम नहीं कर पा रहे हैं. पार्टी अध्यक्ष दिलीप घोष संघ के आदमी हैं. मगर संगठन का ये आदमी जनता के बीच चेहरा नहीं बन पाया है. अगले चुनाव में पांच साल हैं. मगर उसके पहले लोकसभा है. यहां बीजेपी को अगर अपनी टैली बढ़ानी है तो संगठन को चाक चौबंद करना होगा और एक लोकल हीरो के लिए भी स्क्रिप्ट लिखनी होगी. रास्ता लंबा है. एकला चलना है.

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तमिल प्रदेश में रजनीकांत का सहारा मिल जाए

तमिलनाडु में बीजेपी के पास मुस्कुराने की सिर्फ एक वजह है. उनका वोट प्रतिशत पिछली बार के मुकाबले बढ़ा है. हालांकि सीटों के लिहाज से जीरो हाथ आया है. उसके पुराने नेता पोन राधाकृष्णन केंद्र में मंत्री हैं. कन्याकुमारी से सांसद हैं. और ऐसे समय चुनाव जीते, जब राज्य में बीजेपी का किसी भी बड़े दल डीएमके या एआईएडीमके के साथ गठजोड़ नहीं था. मगर ये अब दो साल पुरानी बात हो गई. फिलहाल तो बात ये है कि तमिलनाडु में बीजेपी आगे की राह स्पष्ट रूप से तय नहीं कर पाई है. कभी वह एआईएडीएमके के साथ दोस्ती की पींगें बढ़ाती है. कभी अपने दम पर आगे बढ़ने की हुंकार भरती है. पिछले लोकसभा चुनाव की बात करें तो विजयकांथ उनके गुइंया बने थे. अब ऐसे काम नहीं चलेगा. बीजेपी के पास मौका है. जयललिता चुनाव जीती हैं, मगर प्रचंड बहुमत नहीं मिला है उन्हें. करुणानिधि ने अपने आखिरी सक्रिय चुनाव में जोरदार मुकाबला किया. मगर दूसरे नंबर पर रहे. अब पार्टी स्टालिन के हाथ में होगी. जो वैसे नहीं होगी, जैसी करुणानिधि के दौर में थी. कई नए प्लेयर्स आ गए हैं. बीजेपी को या तो रजनीकांत सा चेहरा मिल जाए. जो उन्हें सीधे मुख्य मुकाबले में ला दे. या फिर वह कई छोटी पार्टियों का ऐसा गठजोड़ तैयार करे. जो चुनाव के सभी समीकऱण साध सके. फिलहाल तो लंबा श्रम है. जैसा असम में किया गया. जैसा पं. बंगाल में किया जा रहा है. केरल में जारी है.

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दरार तो मिल गई है, पर किला फतेह मुश्किल है

केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ असम की तरह ही दशकों से सक्रिय है. इसका असर बढ़ रहा है. जड़ मजबूत होगी तो पत्ती हरियाएगी ही. बीजेपी के तने मजबूत हो रहे हैं. और इस बार तो खाता भी खुल गया. बरसों से पार्टी का झंडा ढो रहे ओ राजगोपाल चुनाव जीतकर विधायक बन गए हैं. वे कमल दल के केरल में पहले जनप्रतिनिधि हैं. जाहिर है कि यहां पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव की बात नहीं हो रही है. मगर केरल की मजबूती इस एक सीट से नजर नहीं आती. उसके लिए आपको स्थानीय अखबार की खबरों को देखना होगा. जहां हर जिले में संघ और लेफ्ट के काडर के बीच संघर्ष की खबरें आती हैं. चुनावी साल में इनमें इजाफा हुआ. इसकी वजह. लगभग एक से वोटबैंक पर आधिपत्य की लड़ाई. फिर चाहे वह एझवा जाति हो या फिर कोई और. केरल पर फोकस की बीजेपी के पास अपनी वजहें हैं. टीम मोदी एक एक कर उन सभी राज्यों में मजबूत होना चाहती है, जहां वह लोकसभा में जीरो स्कोर करती रही है. इसके चलते उत्तर के राज्यों में सर्वोत्तम परफॉर्म करने का दबाव बहुत बढ़ जाता है. इसमें कोई भी कोताही मिट्टी पलीद कर देती है. और ऐन इसी कारण के चलते बीजेपी यहां नए सिरे से जाति और कम्युनिटी के समीकरण साध रही है. कहते हैं कि बड़े से बड़े किले में सेंध लगाई जा सकती है. बस एक दरार मिल जाए. बीजेपी को मिल गई है. देखते हैं कि अब इसके जरिए वह कहां तक घुस पाते हैं.

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पुदुच्चेरी के बारे में हमारी राजनीतिक समझ बहुत कम है. बस इतना पता है कि तमिलनाडु से सटा इलाका है. फ्रांस की कॉलोनी रहा है. सुंदर तट हैं. महर्षि अरविंद का आश्रम है. और ये भी पता है कि तमिलनाडु के मौसम के हिसाब से यहां का भी मिजाज तय होता है. तो जो वहां सत्ता पाता है, वही यहां भी छा जाता है. मगर इस बार उलटा रहा. तमिलनाडु में तो एआईएडीएमके ने सत्ता में बचा ली. मगर यहां उसका विपक्षी गठबंधन हावी दिख रहा है. बाकी यूटी है. एक ही सांसद आता है. इसलिए पत्रकार भी ज्यादा खर्च नहीं हो रहे विश्लेषण में. और बीजेपी भी चिल है इस चेरी के न मिलने को लेकर फिलहाल.

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