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मौलाना किंगमेकर बनने चले थे, सारा भौकाल घुस गवा

पॉलिटिक्स की फिसलपट्टी होती ही चिकनी है. दिल्ली के विनोद कुमार बिन्नी से पूछ लीजिए या असम के मौलाना बदरुद्दीन अजमल से.

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फोटो - thelallantop
हर चुनाव किसी न किसी की मिट्टीपलीद कर देता है. पॉलिटिक्स की फिसलपट्टी होती ही चिकनी है. दिल्ली के विनोद कुमार बिन्नी से पूछ लीजिए या असम के मौलाना बदरुद्दीन अजमल से. कहां से चले थे, कहां आकर पड़े हैं.
बदरुद्दीन अजमल असम की पार्टी ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के मुखिया हैं. मौजूदा हालात में खुद को प्रदेश का सबसे बड़ा मुस्लिम नेता मानते हैं. पिछली विधानसभा में 126 में से 18 सीटें इनके पास थीं. इनके तीन नेता सांसद भी हैं. पार्टी प्रदेश की 34 फीसदी मुस्लिम आबादी को लुभाने वाली राजनीति करती है. चुनाव से पहले उन्होंने ताल ठोंककर कहा था कि उनकी मदद के बिना कोई सरकार नहीं बना पाएगा. नतीजा सामने है. असम में बीजेपी के पास बड़ा बहुमत है. मौलाना साहब खुद चुनाव हार गए हैं. साउथ सलमारा सीट से कांग्रेस के वाजिद अली चौधरी ने उन्हें 16723 वोटों से पटक दिया.
AIUDF असम में अब तक प्रमुख विपक्षी पार्टी थी. सत्ता में तरुण गोगोई, विपक्ष में बदरुद्दीन अजमल. लेकिन एक झटके में सब बदल गया. अब 5 साल तक बीजेपी सत्ता में रहेगी, कांग्रेस मुख्य विपक्ष होगी और AIUDF बैठकर रमतूरा बजाएगी.
वैसे पार्टी के लिहाज से देखें तो AIUDF 2 सीटें जीत चुकी है और 10 पर आगे है. 18 से 12 पर आ गिरना इतना बुरा नहीं है. लेकिन जब मुखिया ही हार जाए तो प्यादों का वजन आधा हो जाता है.
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चुनाव से पहले हर इंटरव्यू में वह इस पर बात करते थे कि किस पार्टी को सपोर्ट करने की संभावना बन सकती है और किसको नहीं. हालांकि अटैक उन्हें दोतरफा मिला. बीजेपी उन्हें बांग्लादेशी शरणार्थियों की पार्टी बताती है. कांग्रेस कहती है कि ये बीजेपी की बी-टीम है, जो बस 'वोटकटवा' का रोल निभा रहे हैं. तरुण गोगोई ने तो यहां तक कहा कि अजमल ने जान-बूझ कर ऊपरी असम में कैंडिडेट उतारे, जहां अल्पसंख्यकों के वोट कम हैं. वह जानते हैं कि वहां उनके जीतने की कोई उम्मीद नहीं है.
निचले असम के ग्रामीण इलाकों में गरीबी से परेशान मुसलमानों पर अजमल की जादुई पकड़ है. इसकी वजह भी है. वे जमीयत उलेमा-ए-हिंद, मरकजुल मआरिफ और हाजी अब्दुल मजीद मेमोरियल पब्लिक ट्रस्ट जैसे कई संगठनों से जुड़े हुए हैं और उनका फाउंडेशन प्रदेश में कई स्कूल, मदरसे, अस्पताल और अनाथालय चलाता है.
66 साल के बदरुद्दीन अजमल 'परफ्यूम किंग' कहलाते हैं. उनका 2000 करोड़ का परफ्यूम बिजनेस है. दारुल उलूम देवबंद से फ़ाज़िल (मास्टर्स) की पढ़ाई की है. 6 बेटे और एक बेटी है. जॉर्डन के रॉयल इस्लामिक स्ट्रैटेजिक स्टडीज सेंटर ने 2015-16 में एक लिस्ट निकाली थी, दुनिया के 500 सबसे ताकतवर मुसलमानों की. इसमें अजमल का भी नाम था.
असमिया मुस्लिम ग्रुप SAGMG और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने अजमल पर आरोप लगाया था कि 2012 दंगों के बाद उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए थे. उन पर आरोप लगता है कि बांग्लादेशी मुसलमानों के संरक्षण के मकसद से उन्होंने पार्टी बनाई है. इस मामले में उनसे पूछताछ भी हुई है. अजमल जाहिर तौर पर, इस आरोप से इनकार करते हैं.
वैसे साल भर पहले कयास लग रहे थे कि अजमल बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं. क्योंकि लोकसभा चुनाव की बहसों में वह बीजेपी को डिफेंड कर रहे थे. वह नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं. हालांकि बीजेपी ने साफ कर दिया था कि बहुमत से दूर रह जाने पर भी वे अजमल से हाथ नहीं मिलाएंगे.
AIUDF का झंडा. ताला-चाभी इनका चुनाव चिह्न है.
AIUDF का झंडा. ताला-चाभी इनका चुनाव चिह्न है.

लेकिन देखिए उनका 'किंगमेकर' का दावा इत्र की तरह हवा में उड़कर गायब हो गया है. उनके चुनाव चिह्न से सत्ता की चाभी गायब हो गई है. ताला बच गया है.

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