उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है. तैयारियां जोरों-शोरों पर हैं. समाजवादी पार्टी (SP) ने भी सियासी बिसात बिछानी शुरू कर दी है. पार्टी 2012 के अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को दोहराने की तैयारी में है. इसलिए सपा अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक से आगे बढ़कर ब्राह्मण वोट हासिल करने की कोशिश कर रही है.
ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कोशिश में सपा, विधानसभा चुनाव से पहले रोडमैप तैयार
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी 2012 की तरह 'ब्राह्मण' मतदाताओं को साधने के लिए सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला दोहरा रही है. लेकिन क्या इस बार सपा ब्राह्मणों को अपने पाले में कर पाएगी?


यूपी की राजनीति में ब्राह्मण वोटरों का बड़ा रोल है. राज्य की करीब 403 विधानसभा सीटों में से 115 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण वोटर किसी भी पार्टी का खेल बनाने या बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. मतदाताओं में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी लगभग 11% है, इसलिए सभी राजनीतिक दल लगातार उन्हें लुभाने की कोशिश कर रहे हैं. बसपा और सपा भी इनमें पीछे नहीं हैं.
सपा की क्या तैयारी है?2012 के विधानसभा चुनाव में सपा को करीब 19 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले थे और पार्टी ने 224 सीटों के साथ प्रचंड जीत दर्ज की. इस बार भी पार्टी 2012 के फॉर्मूले को दोहराने की तैयारी में है. 17 जून को समाजवादी पार्टी ने लखनऊ में एक बैठक बुलाई. इस बैठक में यूपी चुनाव 2027 के लिए ब्राह्मण मतदाताओं को साधने का नया रोडमैप तय किया गया.
अखिलेश यादव की मौजूदगी में हुई इस बैठक में पार्टी के सभी प्रमुख ब्राह्मण सांसदों, विधायकों, पूर्व सांसदों, पूर्व विधायकों और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. इनमें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय, सांसद सनातन पांडेय, सांसद राजीव राय, विधायक अभिताभ बाजपेई और पूर्व विधायक विनय तिवारी, पूजा शुक्ला, बैजनाथ दुबे और संतोष पांडे शामिल रहे.
इस बैठक में 5 अगस्त को समाजवादी विचारक और पूर्व केंद्रीय मंत्री जनेश्वर मिश्र की जयंती की तैयारियों को लेकर चर्चा हुई. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इस दिन भारी संख्या में ब्राह्मणों का लखनऊ में जुटान होगा. साथ ही राज्य भर में बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि ब्राह्मण समाज को यह संदेश दिया जा सके कि सपा में हमेशा ब्राह्मण नेताओं को सम्मान मिला है.
‘MY’ समीकरण का विस्तारलल्लनटॉप के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा बताते हैं कि बैठक में ‘MY’ समीकरण के विस्तार पर भी चर्चा हुई. सपा ने तय किया कि वह केवल अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव (MY) वोट बैंक तक सीमित नहीं रहेगी. आने वाले चुनाव जीतने के लिए पार्टी 15% ब्राह्मण वोटरों वाली सीट पर ध्यान देगी. बैठक में उन 115 से ज्यादा विधानसभा सीटों की पहचान कर रणनीति तय की गई है, जहां ब्राह्मण वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
उन्होंने बताया कि इन क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने और स्थानीय ब्राह्मण चेहरों को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया है. बैठक में यह भी तय किया गया कि बीजेपी सरकार से ब्राह्मणों की कथित नाराजगी (जैसे एनकाउंटर, राम मंदिर चोरी मुद्दा और शंकराचार्य विवाद) को जमीनी स्तर पर मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जाया जाएगा. इसके अलावा पार्टी संगठन, कमेटियों और टिकट बंटवारें में ब्राह्मण समाज के नेताओं को तरजीह देने की बात तय हुई.
क्या इस बार सपा ब्राह्मणों को अपने पाले में कर पाएगी? इस सवाल पर पंकज झा बताते हैं,
“पीडीए को लेकर अखिलेश यादव कई बार कह चुके हैं कि ‘ए’ का मतलब अगड़ा भी है. पिछली बार भी उन्होंने ब्राह्मणों को आउट रीच करने की कोशिश की थी. इस बार भी उनका यही प्रयास है. इस बार तरीका थोड़ा अलग है. जब उनकी सरकार थी तब परशुराम जयंती पर सरकारी छुट्टी की घोषणा की थी. बीजेपी सरकार बनने पर इसे खत्म कर दिया गया. इसके अलावा माता प्रसाद पांडे को उन्होंने विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया है.”
उन्होंने बताया कि जब यूपी सरकार में मंत्री मनोज पांडे ने समाजवादी पार्टी से बगावत की थी, तब भी वे विधानसभा में पार्टी के चीफ व्हिप थे. पंकज झा ने बताया,
“अखिलेश ने अपनी पार्टी के नेताओं से भी कहा है कि वे ब्राह्मणों को लेकर सोशल मीडिया में कोई नेगेटिव नैरेटिव न बनायें. समाजवादी पार्टी को लगता है कि ब्राह्मणों में राज्य सरकार को लेकर नाराज़गी है और इसे इस स्थित को अपने पक्ष में किया जाए. ये कहा जा रहा है कि ब्राह्मण बाहुल्य इलाकों में उन्हें टिकट भी दिया जाएगा.”
2012 में कैसे जीती थी सपा?2012 में अखिलेश यादव सपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में मुख्य चेहरा थे. उन्होंने पार्टी की पुरानी 'बाहुबली' और 'कट्टा-बंदूक' वाली छवि को बदलकर खुद को एक आधुनिक और युवा नेता के तौर पर पेश किया. इस सकारात्मक बदलाव ने पारंपरिक रूप से सपा से दूरी बनाने वाले सवर्ण और ब्राह्मण मतदाताओं को आकर्षित किया.
मायावती सरकार से भी सवर्णों की नाराजगी थी. 2007 में मायावती ने 'सोशल इंजीनियरिंग' (ब्राह्मण-दलित गठबंधन) के जरिए पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. लेकिन माना जाता है कि 2012 आते-आते ब्राह्मण समुदाय मायावती शासन से उकता चुका था. एससी-एसटी एक्ट के कथित दुरुपयोग और शासन में नौकरशाही के हावी होने से ब्राह्मणों में भारी नाराजगी थी.
अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव ने ब्राह्मणों की इस नाराजगी को भांपकर अपनी रणनीति बदली. पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा बताते हैं कि सपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिए और मंचों पर सवर्ण नेताओं को तरजीह दी. इसके कारण जो ब्राह्मण बसपा से छिटके, उन्होंने भाजपा को कमजोर देख सपा को वोट दिया.
2012 के चुनाव में बीजेपी बेहद कमजोर स्थिति में थी. वह केवल 47 सीटों पर सिमट गई थी. उत्तर प्रदेश का वोटर हमेशा एक स्थिर सरकार चाहता है. ब्राह्मण मतदाताओं को लगा कि बीजेपी मायावती को हराने की स्थिति में नहीं है, इसलिए उन्होंने मायावती सरकार को हटाने के लिए अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को एकतरफा वोट देकर भारी बहुमत से जिताया. माना जाता है कि यही ब्राह्मण वोट 2017 में बीजेपी के खाते में चला गया और राज्य में बीजेपी ने सरकार बनाई.
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दूसरे दलों की बढ़ सकती है मुसीबत?अगर सपा 2012 की रणनीति को अपनाती है तो बीजेपी और बसपा को सीधे नुकसान पहुंच सकता है. भारतीय जनता पार्टी इस समय ‘बंटोगे तो कटोगे’ के नैरेटिव पर सवार होकर आगे बढ़ रही है. वहीं, बसपा भी ‘बहुजन’ से ‘सर्वजन’ का रुख कर रही है. लेकिन अगर ब्राह्मण वोट सपा की तरफ लौटता है, तो बाकी पार्टियों का समीकरण बिगड़ना तय है.
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