यूपी चुनाव में कांग्रेस-बसपा का गठबंधन हुआ तो नुकसान बीजेपी का होगा या सपा का?
UP Assembly Election 2027: कांग्रेस के दो सीनियर दलित नेता बीते हफ्ते BSP प्रमुख मायावती से मिलने उनके आवास पर पहुंचे. यह मुलाकात तो नहीं हो पाई, लेकिन राजनीतिकों गलियारों में हलचल तेज हो गई. चर्चा शुरू हो गई कि क्या यूपी में कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन करने की तैयारी में है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कब कौन सा नया सियासी समीकरण निकल आए ये कोई नहीं जानता. कांग्रेस के दो सीनियर दलित नेता बीते हफ्ते बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती से मिलने उनके आवास पर पहुंचे. यह मुलाकात तो नहीं हो पाई, लेकिन राजनीतिकों गलियारों में हलचल तेज हो गई. चर्चा शुरू हो गई कि क्या कांग्रेस और बसपा के बीच कोई नई खिचड़ी पक रही है? क्या राहुल गांधी का कोई संदेश लेकर दोनों नेता मायावती के पास पहुंचे थे? क्या यूपी में कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन करने की तैयारी में है?
इन चर्चाओं को हवा दी सहारनपुर के कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने. उन्होंने मायावती को एक बार फिर साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऑफर दिया. इमरान मसूद ने 24 मई को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि अगर बसपा प्रमुख को ईमानदारी से चुनाव लड़ना है तो साथ आ जाएं. उन्होंने कहा कि पिछली बार एक सीट आ भी गई थी, इस बार रिजल्ट जीरो पर आएगा. बसपा ने 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सिर्फ 1 सीट जीती थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनावों में वह अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी.
कांग्रेस नेताओं ने दी ‘सफाई’इससे पहले, 19 मई की शाम कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया और कांग्रेस के दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम मायावती के घर के बाहर पहुंचे थे. हालांकि, बसपा प्रमुख से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों नेताओं के पास पहले से अपॉइंटमेंट नहीं था. दावा किया जा रहा है कि मायावती ने गेट से ही उन्हें वापस करवा दिया.

घटना के बाद कांग्रेस नेता राजेंद्र पाल गौतम ने कहा,
“मायावती जी दलित समाज की बहुत बड़ी नेता हैं. सीएम रह चुकी हैं. हम तो बस शिष्टाचार के नाते उनसे मिलने गए थे. उनका हालचाल पूछना चाहते थे. हमने गेट पर अपना नाम लिखवा दिया है. जब भी वो हमें बुलाएंगी हम दोबारा उनसे मिलने चले जाएंगे.”
वहीं, कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने भी साफ किया कि वे किसी गठबंधन या चुनावी बातचीत के लिए नहीं गए थे. उनका कहना था कि इस मुलाकात को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. तनुज, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रमुख भी हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा,
“कांग्रेस के अनुसूचित विभाग के दफ्तर में एक मीटिंग हुई थी, जिसमें राजेंद्र पाल गौतम और दूसरे पदाधिकारी मौजूद थे. बातचीत के दौरान मायावती जी की सेहत का जिक्र आया. उनका घर पास में ही है. गौतम जी ने कहा कि वे हमारे समाज की एक वरिष्ठ दलित नेता हैं और अब लगभग 70 साल की हो चुकी हैं, इसलिए हमें जाकर उनकी तबीयत का हाल-चाल लेना चाहिए. हम बिना पहले से फोन किए ही चले गए, यह सोचकर कि अगर वे मौजूद होंगी, तो हम उनसे मिल लेंगे... लेकिन चूंकि हमें उनसे मिलने का समय नहीं दिया गया, इसलिए हम वापस लौट आए."
तनुज पुनिया ने यह भी जोड़ा कि इस मुलाकात को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए.
दूसरी तरफ, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने भी डैमेज कंट्रोल मोड में बयान दिया. उन्होंने कहा कि दोनों नेता निजी तौर पर गए थे. पार्टी का इससे कोई लेना देना नहीं है. कांग्रेस को इसकी जानकारी तक नहीं थी.
लेकिन राजनीति सिर्फ बयान से नहीं चलती. उसके पीछे की कहानी भी देखी जाती है. और यहां कहानी में एक पुराना कनेक्शन भी है. तनुज पुनिया के पिता पीएल पुनिया कभी मायावती के प्रमुख सचिव रह चुके हैं. दलित राजनीति के गलियारों में दोनों परिवारों की नजदीकियों की चर्चा पुरानी रही है.
क्या कांग्रेस बसपा से गठबंधन करने की तैयारी में?इस सवाल पर लल्लनटॉप के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा बताते हैं,
"अभी तक आधिकारिक रूप से कांग्रेस के किसी भी नेता और बसपा के नेता के बीच गठबंधन को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भी इस तरह की चर्चा हुई थी. यह बात सही है कि कांग्रेस पार्टी के अंदर नेताओं का एक धड़ा ऐसा है, जो खुलकर यह समर्थन कर रहा है कि बसपा और कांग्रेस साथ मिलकर चुनाव लड़ें. इन नेताओं में यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय और सहारनपुर से लोकसभा सांसद इमरान मसूद भी शामिल है."
उन्होंने आगे बताया कि रविवार, 24 मई को मायावती ने बसपा नेताओं और पदाधिकारियों के साथ बैठक की. इस बैठक में कांग्रेस के साथ किसी भी गठबंधन पर कोई बातचीत नहीं हुई. पंकज झा ने यह भी बताया,
“एक बात और भी है कि अगर हम मायावती के बयान और उनकी प्रेस रिलीज पर गौर करें तो यह पाएंगे कि बसपा सबसे ज्यादा हमलावर कांग्रेस पर ही रही है. मायावती कई बार कह चुकी हैं कि कांग्रेस ने दलित राजनीति को सिर्फ इस्तेमाल किया है.”
पंकज बताते हैं कि राजनीति में किसी भी संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता. बसपा के कई नेता चाहते हैं कि अकेले चुनाव लड़ने से बेहतर है कि गठबंधन करके चुनाव लड़ा जाए. लेकिन फैसला मायावती को करना है और उन्होंने अब तक इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया है.
सपा को कितना नुकसान होगा?पंकज झा ने बताया कि अगर बसपा और कांग्रेस का गठबंधन होता है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) को इसका नुकसान होगा. उन्होंने कहा,
‘बीजेपी को मिलेगा इसका फायदा’"यह मुस्लिम बाहुल्य इलाका है. सहारनपुर, मुरादाबाद से लेकर आगरा और मेरठ तक. इन जगहों पर मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी है और यही मुस्लिम वोटर निर्णायक होते हैं. इस इलाके में यादव वोटरों की संख्या बहुत कम है. अगर यहां पर समाजवादी पार्टी को छोड़कर कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन करती है तो दलित और मुस्लिम एक साथ आ जाएंगे और यह वोट कांग्रेस-सपा गठबंधन को जाएगा."
पंकज झा ने बताया कि अगर कांग्रेस और बसपा का गठबंधन होता है तो ऐसी हालत में उत्तर प्रदेश में मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा. एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP), दूसरी तरफ बसपा-कांग्रेस का गठबंधन और तीसरी तरफ समाजवादी पार्टी. उन्होंने आगे बताया,
“कहीं न कहीं इसका फायदा बीजेपी को होगा. अगर हम यूपी के पिछले दो चुनाव देखें. एक 2024 का लोकसभा चुनाव और दूसरा 2022 का विधानसभा चुनाव. इन चुनावों में समाजवादी पार्टी का सीधा मुकाबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ था. इसमें एनडीए को नुकसान हुआ है तो त्रिकोणीय मुकाबले में बीजेपी को इसका फायदा हो सकता है.”
हालांकि, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सपा के साथ गठबंधन है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 19 मई को कहा कि 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए उनकी साझेदारी जारी रहेगी. फिर भी दोनों पार्टियों के बीच संबंधों में लगातार टकराव बना रहता है.
कांग्रेस के कई नेताओं को आशंका है कि सपा कांग्रेस के साथ ज्यादा सीटें साझा नहीं करेगी. इसलिए वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि कांग्रेस को संविधान, दलितों और अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर BJP और योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ ‘समान विचारधारा वाली’ ताकतों को एकजुट करने की कोशिश करनी चाहिए. इनमें बसपा भी शामिल है.
'गठबंधनों से कोई फायदा नहीं'
मायावती ने 2019 में सपा के साथ गठबंधन करने के लिए पुरानी कड़वाहट को भुला दिया था. हालांकि, तब से बसपा प्रमुख कई बार कह चुकी हैं कि ऐसे गठबंधनों से पार्टी को कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि जहां उनके दलित वोट दूसरों को मिल जाते हैं, वहीं दूसरे लोग बदले में बसपा की मदद नहीं कर पाते.
बीजेपी भी कर रही फुल तैयारी
2024 के लोकसभा चुनावों में झटका लगने के बाद, बीजेपी भी यूपी में दलितों को फिर से अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. उसने कल्याणकारी योजनाओं, प्रतिनिधित्व और सोशल इंजीनियरिंग के जरिए दलित और गैर-यादव ओबीसी समुदायों के बीच अपनी पहुंच बढ़ा दी है. हाल ही में हुए कैबिनेट विस्तार में भी यह कोशिश दिखी भी है. कैबिनेट विस्तार में शामिल छह नए नामों में से दो दलित और चार ओबीसी थे.
वीडियो: 'इंडिया' गठबंधन में बसपा औरमायावती को लाने का प्लान ऐसा है!

