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वो तीन मौके जब प्रोटेस्ट ने मोदी सरकार को झुका दिया

जंतर-मंतर से शुरू होकर देश भर में फैले पेपर लीक के खिलाफ प्रोटेस्ट के बाद मोदी सरकार को झुकना पड़ा. इस विरोध प्रदर्शन का अंत शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ हो गया.

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NRC, कृषि कानून के बाद पेपर लीक प्रोटेस्ट के सामने सरकार को झुकना पड़ा है. (इंडिया टुडे)

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  • शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जंतर-मंतर से शुरू हुए व्यापक छात्र और युवा विरोध प्रदर्शन के दबाव में इस्तीफा दिया है।
  • शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का कारण पेपर लीक मामले में अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन और आंदोलन का नेतृत्व किसी विशेष संगठन के बजाय एक विकेन्द्रीकृत नेटवर्क द्वारा किया जाना था।
  • इससे सरकार की राजनीतिक रणनीति में बदलाव आ सकता है क्योंकि यह तीसरा मौका है जब जनता के दबाव में एक मंत्री को पद छोड़ना पड़ा है तथा विरोध के नए स्वरूप ने सरकार को चुनौती दी है।

दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू होकर देश भर में फैले विरोध प्रदर्शन में छात्रों और नौजवानों के दबाव में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया. लेकिन ये मामला एक मंत्री के पद छोड़ने भर का नहीं है. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ा झटका भी माना जा रहा है क्योंकि पिछले 12 सालों में यह सिर्फ तीसरा ऐसा मौका है, जब जन आंदोलन के आगे मोदी सरकार को झुकना पड़ा है. इस्तीफे की बात करें तो इससे पहले #MeToo आंदोलन के चलते एमजे अकबर को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था. इसके बाद यह दूसरा मौका है, जब सरकार में शामिल किसी मंत्री ने जनता के दबाव में कुर्सी छोड़ी है.

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इस पूरे एपिसोड ने असहमति को टैकल करने की सरकारी रणनीति भी समझा दी है. सरकार पहले पुरजोर प्रतिरोध करती है. विरोध और असहमति की नैतिक शक्ति को नकारने और खारिज करने की कोशिश करती है और तभी हथियार डालती है, जब उसको लगता है कि ‘जिद्द पर टिके रहने’ की राजनीतिक कीमत ‘आत्मसमर्पण की कीमत’ से ज्यादा हो गई है.

CAA-NRC आंदोलन

इसका पहला बड़ा उदाहरण नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिखा. सरकार ने पहले तो प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर देश भर में माहौल बनाया. शुरुआत में विरोध का भी कोई असर नहीं हुआ लेकिन जब प्रदर्शन तेज होने लगे तो सरकार ने अपना रूख नरम करना शुरू किया. हालांकि तकनीकी रूप से कैबिनेट ने NRC को लेकर कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया था. लेकिन राजनीतिक तौर पर लगातार इसकी पैमाइश की जा रही थी.

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दबाव बढ़ने लगा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कहा कि सरकार ने NRC पर कोई फैसला नहीं किया है, जबकि गृहमंत्री अमित शाह बार-बार देश भर में इसकी प्रक्रिया शुरू करने की बात कर रहे थे. सरकार के इरादे जताने के लिए उन्होंने 'क्रोनोलॉजी' का जिक्र किया था. जिस शब्द ने काफी सुर्खियां बटोरीं. ये एक तरह से पीछे हटना ही था. इस प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, क्योंकि सरकार को लगा कि ये मामला राजनीतिक रूप से उनके लिए बोझ बनता जा रहा है.

किसानों का विरोध प्रदर्शन

सरकार के पीछे हटने का दूसरा मौका किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान आया. इसमें सरकार ने लगभग एक साल तक कठोर रूख अपनाए रखा लेकिन आखिरकार हार मानकर तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर दिया. यहां भी ‘क्रोनोलॉजी’ कुछ वैसी ही रही. शुरुआत में सरकार ने आंदोलन को ज्यादा लिफ्ट नहीं दिया. उनको लगा कि इसे आसानी से निपटाया जा सकता है. उनकी ओर से इस आंदोलन को एक क्षेत्रीय आंदोलन बताया गया. साथ ही इसके पीछे तमाम विरोधी पॉलिटिकल और नॉन पॉलिटिकल एक्टर्स के नाम गिनाए गए.

लेकिन किसानों को मोर्चे से डिगाने के तमाम प्रयास असफल हुए. किसान मोर्चे पर अड़े रहे. उनका संयम सरकार के लिए चुनौती बन गया. आखिरकार साल भर बाद सरकार ने अपने कदम पीछे खींचे और तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा की. इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों से माफी मांगी. यह एक दुर्लभ घटना थी, जब स्टेट को दबाव के चलते पीछे हटना पड़ा.

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पेपर लीक को लेकर विरोध प्रदर्शन

धर्मेंद्र प्रधान और उनका शिक्षा मंत्रालय पेपर लीक रोकने में असफल रहा, जिसका खामियाजा उनको कुर्सी देकर चुकानी पड़ी. यह सरकार को झुकाने वाला तीसरा आंदोलन है. लेकिन ये आंदोलन बाकी दोनों आंदोलनों से अलग है. अंतर सिर्फ मुद्दे का नहीं है, बल्कि आंदोलन के सोशल स्ट्रक्चर और उसका काम करने का तरीका दोनों अलग है. इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किसी वैचारिक संगठन या किसी खास लीडरशिप स्ट्रक्चर के हाथ में नहीं रहा. ये प्रदर्शन ऑर्गेनिक, डिसेंट्रलाइज्ड और बहुत हद तक सुनियोजित तरीके से ‘नेतृत्वविहीन’ था.

भीड़ खुद ही आंदोलन की आवाज और इंजन दोनों बन गई. ये अपनी तरह का एक नया प्रयोग था. इसलिए सरकार के स्टैंडर्ड पॉलिटिकल नेगोशिएशन टूल्स फेल हो गए.  आमतौर पर आंदोलन में कुछ जाने-पहचाने चेहरे होते हैं, जिनसे सरकार समझौता करती है. सौदेबाजी करती है या कई बार उनको अपने पाले में भी कर लेती है.

आंदोलन के ऑर्गनाइजेशनल स्ट्रक्चर ने इसे काफी लचीला बना दिया. ये पीसफुल भी था और काफी व्यवस्थित भी. सबसे बड़ी बात ये कि आंदोलन उन नेटवर्कों के सहारे फैला, जिनको डिकोड करने में ही सरकार असफल रही. मुकाबला करना तो दूर की कौड़ी है. हास्य और व्यंग्य से लबरेज मीम्स और इंस्टाग्राम रील्स ने विरोध प्रदर्शनों को एक ऐसी कल्चरल एनर्जी दी, जिसकी बराबरी करने में सरकारी मैसेजिंग मशीनरी फेल रही.

इस आंदोलन में क्या अलग था?

इससे पहले के विरोध प्रदर्शनों में बीजेपी की आजमायी हुई स्ट्रेटजी थी, प्रोटेस्ट की क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठाना. उसके लीडरशिप पर अटैक करना. उनमें फूट डालना या लोगों के थक जाने का इंतजार करना. लेकिन इस बार प्रोटेस्ट ने सरकार के नैरेटिव की धार कुंद कर दी. इसके साथ ही इस आंदोलन का इंजन विपक्षी पार्टियां नहीं थी, जोकि सरकार के लिए बड़ा झटका था. 20 जुलाई के एक्शन से प्रदर्शकारी डरकर पीछे नहीं हटे. उलटे उनका संकल्प और मजबूत हो गया. 

युवाओं का ये आंदोलन पुलिस की सख्त कार्रवाई के बाद भी विचलित नहीं हुआ. उन्होंने डर या जल्दीबाजी नहीं दिखाई. यहीं सरकार के लिए मुश्किलें बढ़नी शुरू हो गईं. सरकार उन संगठनों से बातचीत करने की आदी रही है, जो बदनामी या फिर आंदोलन के लंबा खिंचने से घबराते हैं.

यहां तक कि सोनम वांगचुक के नरम रुख अपनाने के बाद भी प्रदर्शनकारी इस्तीफे की मांग पर डटे रहे. ये इस चीज का उदाहरण था कि आंदोलन की लीडरशिप बिखरी हुई थी. यानी किसी एक आदमी से समझौता करने से बात बनने वाली नहीं थी.

बीजेपी की बेचैनी क्यों बढ़ी?

बीजेपी से जुड़े नेताओं की माने तो इस पूरे आंदोलन के चलते बीजेपी की बेचैनी बढ़ने का एक और कारण है. सीएए या फिर किसान आंदोलन के उलट, इस आंदोलन को बीजेपी के सोशल बेस से खूब समर्थन मिला. एक बीजेपी नेता के मुताबिक, 

घोषित विरोधियों की तुलना में इस स्थिति को टैकल करना ज्यादा मुश्किल है. वैचारिक विरोधी गुटों को आसानी से खारिज किया जा सकता है, लेकिन जब छात्र और नौजवान लामबंद होना शुरू कर दें तो सरकार इसको केवल असहमति के लेंस से नहीं देख सकती.

ये स्थिति सरकार के लिए परेशानी बढ़ाने वाला है. सरकार के खिलाफ असंतोष अब विपक्षी खेमे से आगे तक पहुंच गया है. एमजे अकबर का इस्तीफा अलग परिस्थितियों में हुआ. CAA-NRC, कृषि कानूनों या धर्मेंद्र प्रधान के विरोध के उलट #MeToo आंदोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ नहीं था. लेकिन ये मोदी सरकार का पहला उदाहरण है, जब किसी मंत्री ने सिविल सोसाइटी मूवमेंट के दबाव में इस्तीफा दिया लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के मामले में ऐसा नहीं है. वे मोदी सरकार के पहले ऐसे मंत्री बन गए हैं, जिनकी कुर्सी  सरकार की नीतियों के खिलाफ उपजे जन आंदोलन के दबाव में गई है.

वीडियो: धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद राहुल गांधी ने अब क्या मांग रख दी?

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