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UP चुनाव से पहले आरक्षण विरोधी आंदोलन, ये BJP के लिए 'आगे कुआं पीछे खाई' क्यों है?

जंतर-मंतर से शुरु हुआ आरक्षण विरोधी आंदोलन थमता नजर नहीं आ रहा है. प्रदर्शनकारी 24 अगस्त को भी सेंट्रल दिल्ली की सड़कों पर विरोध करने पहुंच गए. आंदोलन दिल्ली में हो रहा है, लेकिन इसकी तपिश उत्तर प्रदेश तक पहुंचती दिख रही है, जिसके चलते बीजेपी की परेशानी बढ़ती दिख रही है.

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ब्रजेश पाठक ने आंदोलन को खत्म करवाने में जुटे हैं. (इंडिया टुडे)

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  • आरक्षण विरोधी आंदोलनकारियों ने 24 अगस्त को दिल्ली के कनॉट प्लेस से जंतर-मंतर तक मार्च किया और जाति आधारित आरक्षण हटाकर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग की।
  • इस आंदोलन की शुरुआत जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था के विरोध और पिछड़े, दलित वोटों के सामाजिक राजनीतिक प्रभावों से हुई है, जिससे बीजेपी की राजनीति प्रभावित हो रही है।
  • बीजेपी ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की पहल की है, लेकिन आंदोलन में विवाद के कारण इसका स्थगन नहीं हुआ, और यह उत्तर प्रदेश में चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।

आरक्षण विरोधी आंदोलन की तपिश बढ़ती जा रही है. आंदोलनकारी 24 अगस्त को दूसरी बार सेंट्रल दिल्ली की सड़कों पर उतरे. इस आंदोलन की लपटें अब अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश चुनावों तक पहुंचती दिख रही हैं, जोकि तीसरी बार राज्य की सत्ता में वापसी की कवायद में लगे बीजेपी के लिए शुभ संकेत नहीं है.

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बीजेपी के वोटर बेस का आंदोलन

इस विरोध प्रदर्शन को अब तक किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं मिला है. ये अपर कास्ट यूथ और उनके पैरेंट्स का आंदोलन है, जिन्हें आमतौर पर बीजेपी के समर्थक के तौर पर देखा जाता रहा है. इस आंदोलन ने बीजेपी की पेशानी पर बल ला दिया है. वहीं दलित और ओबीसी बेस वाली पार्टियां इसे अवसर की तरह देख रही हैं. कुछ पार्टियों ने तो बीजेपी पर पिछले दरवाजे से इस आंदोलन को ईंधन देने का आरोप लगाया है, ताकि देश के उन छात्रों में फूट डाला जा सके, जिन्होंने हाल ही में पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रोटेस्ट में नरेंद्र मोदी सरकार को नाको चने चबवा दिए.

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जाति की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग

24 अगस्त को युवाओं की बड़ी भीड़ कनॉट प्लेस में जमा हुई. ये लोग जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ नारेबाजी करते हुए जंतर-मंतर की ओर बढ़े. पुलिस ने परमिशन नहीं होने का हवाला देते हुए उनको धरना स्थल तक जाने से रोक दिया. 24 अगस्त का मार्च 22 अगस्त को जंतर-मंतर पर हुए एक बड़े विरोध प्रदर्शन के बाद हुआ. इस प्रदर्शन में लोग जाति आधारित आरक्षण को हटाकर इसका आधार पूरी तरह से आर्थिक करने की मांग को लेकर जुटे थे. पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स को इन प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए घंटों मशक्कत करनी पड़ी. पुलिस पर बल प्रयोग के आरोप भी लगे.

इस आंदोलन की बाकी मांगों में कैंपस में ओबीसी के खिलाफ जातिगत भेदभाव को लेकर लाए यूजीसी रेगुलेशन को वापस लेना, एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम को खत्म करना और जाति आधारित वेलफेयर स्कीम्स की समीक्षा करना शामिल है.

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सोशल मीडिया के सहारे हो रहा मोबलाइजेशन

जातिगत आरक्षण बरकरार रखने की सूरत में इनकी डिमांड अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कैटेगरी में भी क्रीमीलेयर का प्रावधान करने की है. कॉकरोच आंदोलन की तरह इस आंदोलन में भी समर्थन जुटाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है. 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' और 'रिजर्वेशन हटाओ मूवमेंट' जैसे सोशल मीडिया पेज से लोगों को मोबलाइज किया गया. इस कैंपेन को लीड कर रहे थे उत्तर प्रदेश के नीट अभ्यर्थी हर्ष दुबे.

बीजेपी ने की बातचीत की पहल

22 अगस्त को हुए प्रोटेस्ट के बाद बीजेपी हरकत में आई. उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की पहल की. उन्होंने दुबे और उनके साथियों को 23 अगस्त को लखनऊ बुलाया. पाठक ने उनको दिलासा दिया कि उनकी चिंताओं को वे केंद्रीय मंत्रियों तक पहुंचाएंगे. पत्रकारों से बात करते हुए ब्रजेश पाठक ने कहा कि अगले दो दिन में संबंधित मंत्री और प्रतिनिधिमंडल के बीच एक बैठक कराई जाएगी. हर्ष दुबे ने बातचीत शुरू करने के सरकार के फैसले का स्वागत किया. 

उन्होंने कहा कि उनकी चाहत है कि पीएम मोदी या गृहमंत्री अमित शाह प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से मिलें. इसके साथ ही उन्होंने प्रदर्शन कर रहे लोगों से बातचीत होने तक आंदोलन स्थगित करने की अपील की. हालांकि अब इसमें एक और पेच आ गया है. आंदोलनकारियों के एक धड़े ने दुबे को नेता मानने से इनकार कर दिया है. वे इस बात पर जोर दे रहें हैं कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस आश्वासन नहीं देती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.

बीजेपी के लिए मुश्किल पैदा हो सकती है

यह आंदोलन अगर लंबा खिंचता है तो उत्तर प्रदेश में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. यूजीसी रेगुलेशन को लेकर सवर्ण समुदाय में पहले से ही नाराजगी है. जाति जनगणना के फैसले ने भी इस नाराजगी को बढ़ाने का काम किया है. टेलीग्राफ से बात करते हुए बीजेपी के एक नेता ने बताया कि मोदी सरकार के जाति जनगणना के फैसले ने कहीं न कहीं अपर कास्ट का गुस्सा बढ़ाने का काम किया है. उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक सांसद ने बताया कि अपर कास्ट को डर है कि जातिगत आंकड़ें सामने आने के बाद आरक्षण की सीमा बढ़ाने, खासतौर पर ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग जोर पकड़ने लगेगी.

यानी अपर कास्ट वोटर्स की बीजेपी से नाराजगी है. ऐसे में आरक्षण विरोधी आंदोलन अगर राज्य में जोर पकड़ता है, तो इसका काउंटर मोबलाइजेशन भी हो सकता है. यानी पिछड़े और दलित जातियों की लामबंदी बीजेपी की सत्ता की हैट्रिक की राह मुश्किल कर सकता है. 

अखिलेश और चंद्रशेखर का काउंटर अटैक

एक तरफ बीजेपी के नेता प्रदर्शनकारियों से बातचीत की वकालत करते दिखे. वहीं सपा चीफ अखिलेश यादव ने इसको मौके की तरह लपका. अखिलेश यादव ने कहा, 

आरक्षण सुधार के नाम पर आरक्षण समाप्ति का षड्यंत्र पीडीए समाज के खिलाफ एक और गहरी साजिश है. आरक्षण पीडीए का अधिकार है. किसी की इच्छा का विषय नहीं. बीजेपी और उसके संगी साथी समय-समय पर समीक्षा तो कभी सुधार जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल करके या क्रीमीलेयर की बात करके आरक्षण का विरोध करते हैं. आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा.

उभरते दलित नेता और नगीना से सांसद आजाद समाज पार्टी के चीफ चंद्रशेखर आजाद ने भी इस आंदोलन की जमकर मुखालिफत की है. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को आरक्षण विरोध के मुद्दे पर चुनाव में दो-दो हाथ करने की चुनौती दे डाली.

2024 का सबक नहीं भूली होगी बीजेपी 

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने नारा दिया. अबकी बार 400 पार. विपक्ष ने इसको लपक लिया. उन्होंने इसे संविधान खत्म करने की बीजेपी की साजिश के तौर पर प्रचारित किया. उन्होंने लगातार ये प्रचारित किया कि अगर बीजेपी को 400 से ज्यादा सीटें आईं तो संविधान बदला जा सकता है और आरक्षण खतरे में पड़ सकता है. बीजेपी की ओर से इसका खंडन आया. लेकिन कांग्रेस और सपा गठबंधन उत्तर प्रदेश में इस नैरेटिव को जनता तक पहुंचाने में सफल रही. साल 2029 में सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद 62 सीटें जीतने वाली बीजेपी साल 2024 में 33 सीटों पर आ गई. दूसरी तरफ सपा 5 सीट से बढ़कर 37 सीटों तक पहुंच गई.

ये बात CSDS-Lokniti के आंकड़ों में भी सामने आई. उनके मुताबिक,  2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों का नुकसान हुआ. यानी जिस सामाजिक आधार को बीजेपी ने बड़ी मशक्कत से अपने साथ जोड़ा था, वो 2024 में छिटकता दिखा.

अखिलेश यादव ने फिर छेड़ा पीडीए का राग

अखिलेश यादव फिर से इसी फॉर्मूले को साधना चाहते हैं. तभी तो उन्होंने प्रदर्शनकारियों से ब्रजेश पाठक से मुलाकात के तुरंत बाद पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) का राग छेड़ दिया. अखिलेश यादव इन समुदायों को ये बताना चाहते हैं कि बीजेपी उनके आरक्षण के खिलाफ है. उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में अपना स्पेस बनाने की तैयारी में जुटे चंद्रशेखर आजाद ने भी इस मौके को भुनाने की कोशिश की. उन्होंने अखिलेश यादव से कहीं तल्ख सुर में आरक्षण विरोधियों पर निशाना साधा.

बीजेपी के लिए दुविधा की स्थिति

बीजेपी के लिए ये आगे कुआं, पीछे खाई जैसी स्थिति है. यानी एक तरफ कोर वोटर यानी सवर्णों का असंतोष. दूसरी तरफ पिछड़े और दलित वोटर्स के खिसकने का डर. अब सबकी नजर पार्टी के अगले कुछ फैसलों पर होगी. बीजेपी ने सवर्णों को साधने के लिए तो ब्राह्मण चेहरे ब्रजेश पाठक को आगे किया है, ऐसे में दूसरे फ्रंट पर पिछड़े वर्ग से आने वाले प्रमुख चेहरे केशव प्रसाद मौर्या को आगे किया जा सकता है. पार्टी नहीं चाहेगी कि दलित और पिछड़े वोटर्स में ये मैसेज जाए कि उनके संवैधानिक अधिकारों में कोई बदलाव किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले बीजेपी अगर इस भंवर जाल से नहीं निकल पाती है तो लोकसभा चुनाव 2024 की परिणति दोहराई भी जा सकती है. 

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: आरक्षण हटाओ आंदोलन की बिसात किसने बिछाई?

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