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क्या वाकई जिन्ना के पहले PM बनने पर देश ना बंटता?

ओमप्रकाश राजभर के बयान पर क्या बोले जेएनयू के इतिहास के प्रोफेसर?

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तस्वीरें इंडिया टुडे और पीटीआई से साभार हैं.
ओमप्रकाश राजभर. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष. आगामी यूपी विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर चुके हैं. इस समय अपने एक बयान को लेकर मीडिया की 'आंख का तारा' बने हुए हैं. बुधवार 10 नवंबर को ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि अगर जवाहरलाल नेहरू की जगह मोहम्मद अली जिन्ना देश के पहले प्रधानमंत्री बनाए गए होते तो भारत का बंटवारा नहीं होता. हाल ही में अखिलेश यादव के जिन्ना वाले बयान को लेकर काफी हंगामा मचा था. अब उनके चुनावी साथी ने भी जिन्ना-जिन्ना करना शुरू कर दिया. बुधवार के बयान को लेकर जब गुरुवार 11 नवंबर को ओमप्रकाश राजभर से सवाल किए गए तो वो अपनी बात पर कायम दिखे. पीटीआई से बातचीत में राजभर ने कहा,
''जिन्ना पहले पीएम होते तो उस स्थिति में भारत बड़ा देश होता. तमाम तरह की समस्याएं भी नहीं होतीं. भारत के बंटवारे का दोषी जिन्ना नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. विवाद की स्थिति संघ ने ही पैदा की थी.''
राजभर ने ये भी कहा,
"अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और गोविंद बल्लभ पंत जैसे नेता भी जिन्ना की तारीफ करते रहे हैं. देश को आजादी दिलाने में जिन्ना का भी योगदान है, वो देश के लिए लड़े थे. आजादी मिलने के बाद जिन्ना को प्रधानमंत्री बना देना चाहिए था.''

राजभर की बात में कितना दम?

सियासी बयान पर बवाल अपनी जगह है. ज्यादा जरूरी सवाल ये है कि ओमप्रकाश राजभर की बात में दम कितना है. क्या वाकई में जिन्ना को देश का पहला पीएम बनाने से उस समय की सारी सियासी समस्याएं खत्म हो जातीं और देश का बंटवारा नहीं होता? इस सवाल को लेकर हमने बात की इतिहासकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर आदित्य मुखर्जी से. उन्होंने ओमप्रकाश राजभर के बयान को बेतुका बताया. कहा,
“जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने पर देश का बंटवारा नहीं होता, इस बात में ज़रा भी सच्चाई नहीं है. राजनीति करने वाले आजकल इतिहासकार बने हुए हैं. बंटवारे के विषय में सैकड़ों किताबें मिल जाएंगी, लेकिन ये बात कहीं नहीं मिलेगी.”
प्रोफेसर मुखर्जी ने आगे बताया,
“देश का बंटवारा जिन्ना या नेहरू के प्रधानमंत्री बनने से तय नहीं हुआ. बंटवारा इसलिए हुआ क्योंकि दो सांप्रदायिक ताक़तें अंग्रेजों की सहायता से देश को बांट चुकी थीं. बंटवारे का क़सूरवार किसी एक व्यक्ति को बता देना सही नहीं है. हां ये बात ज़रूर है कि एक दफ़ा गांधीजी ने जिन्ना को प्रधानमंत्री बनने का ऑफ़र ज़रूर दिया था, लेकिन इस शर्त पर कि देश का बंटवारा नहीं होना चाहिए.”
ओमप्रकाश राजभर के इस दावे पर कि लाल कृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ने भी मोहम्मद अली जिन्ना के विचारों की तारीफ़ की, प्रोफेसर आदित्य मुखर्जी ने कहा,
“इस बात का भी कोई तथ्य मौजूद नहीं है. ये मनगढ़ंत बातें हैं. इनमें कोई सच्चाई नहीं है."

अखिलेश यादव ने क्या कहा था?

हाल ही में अखिलेश यादव के जिन्ना वाले बयान को लेकर हंगामा मचा था. बीती 31 अक्टूबर को हरदोई में एक चुनावी कार्यक्रम में भाषण देते हुए अखिलेश ने महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू की तारीफ करते हुए जिन्ना का भी नाम ले लिया. कहा कि ये सभी नेता बैरिस्टर बने, देश की आजादी के लिए संघर्ष किया और कभी इससे पीछे नहीं हटे. अखिलेश के बयान पर लल्लनटॉप की पड़ताल टीम ने एक रिपोर्ट की थी. इसमें बताया गया था कि क्या वाकई में सरदार पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना साथ पढ़े थे. एक नजर इस रिपोर्ट पर भी मार लीजिए. बहरहाल, सपा अध्यक्ष के बयान पर सत्तारूढ़ बीजेपी ने उन्हें जमकर घेरा था. तब से यूपी में जिन्ना पर राजनीति चालू है. अब राजभर ने जिन्ना को याद किया है और वो इस पर किसी तरह की सफाई देने के मूड में नहीं दिखते. अब इसका किसे फायदा मिलेगा और किसको नुकसान होगा, ये आने वाले चुनाव में पता चल जाएगा.

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