नतीजे पर पहुंचने के लिए 1 जून को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में हुई बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या और उसे अंजाम देने का तरीका काफी है. पुरुलिया जिले के बलरामपुर इलाके के दाभा गांव के रहने वाले दुलाल कुमार बीजेपी के कार्यकर्ता थे. उम्र 32 साल थी. 2 जून की सुबह दुलाल का शव गांव में ही बिजली के बड़े वाले पोल से लटकता पाया गया.
''बीजेपी के लिए काम करोगे तो यही अंजाम होगा.''
इसके अलावा शव के पास एक पर्ची भी पड़ी थी. इसपर लिखा था-
''चुनाव के वक्त से ही तुम्हें कत्ल करने की कोशिश कर रहा था. नाकाम रहा. मगर आज तुम मारे गए.''

30 मई को त्रिलोचन महतो की हत्या कर शव पेड़ से टांग दिया गया था. धमकी भरा मैसेज भी था ताकि लोगों में दहशत भरी जा सके.
इन दोनों ही घटनाओं में एक चीज कॉमन है और वो है पुलिस की निष्क्रियता. त्रिलोचन महतो ने हत्या से ठीक अपने भाई को फोन कर कहा था कि उसे जान से मारने की धमकी मिल रही है. उसके बाद त्रिलोचन का पता नहीं चला. घरवालों ने पुलिसवालों को सूचना दी, लेकिन कुछ पता नहीं चला और उसकी लाश ही मिली. दूसरी घटना के बारे में भी बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने ट्वीटर पर लिखा है. उन्होंने बताया है कि पश्चिम बंगाल के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर अनुज शर्मा से उनकी बात हुई थी. उन्होंने एडीजी को बताया भी था कि दुलाल की जान खतरे में है. एडीजी ने कहा भी था कि पुलिस उसे बचाने की कोशिश कर रही है. लेकिन नतीजा ये हुआ कि दुलाल का शव बिजली के पोल से लटका हुआ मिला.
ये कौन सी कोशिश थी, जो पुलिस कर रही थी. अगर कोशिश की होती तो न तो त्रिलोचन महतो मारे गए होते और न ही दुलाल. लेकिन दोनों ही मारे गए. और इनका मरना बंगाल में ममता विरोधी लोगों के लिए दहशत का पर्याय बन जाए, इसकी भरपूर कोशिश की गई है, जिसमें पुलिस की भागीदारी साफ-साफ दिख रही है.ये दोनों ही घटनाएं उस ममता बनर्जी के राज की हैं, जिन्होंने पश्चिम बंगाल में वामपंथ के किले को ढहाकर कहा था-
''हमें बदला नहीं, बदलाव चाहिए.''

पंचायत चुनाव में वोटिंग वाले दिन की हिंसा में ही 18 लोग मारे गए. ममता बनर्जी ने कहा- ये तो छोटी सी घटना है. 18 लोगों का मर जाना, खुलेआम उत्पात होना, मारकाट होना, ये सब ममता के लिए छोटी बात है (फोटो: पीटीआई)
सत्ता मिलने के बाद बदलाव कितना आया, ये तो पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोग ही बता सकते हैं, लेकिन ममता बनर्जी बदला ज़रूर ले रही हैं. पंचायत चुनाव में एक दिन में 18 लोगों की मौत उसी बदले का नतीजा है, जो 1967 के वक्त से ही पश्चिम बंगाल की सियासत में जड़ तक बैठा हुआ है. सत्ता में कांग्रेस रही, तो उसने वामपंथ के कार्यकर्ताओं की हत्याएं की, उन्हें जेल में डाला और हर तरह के जुल्म किए. फिर जब सीपीएम के नेतृत्व में वामपंथ का शासन आया तो उसने बदला लिया. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की हत्या की और वही कहानी दोहराई जिसे कांग्रेस ने शुरू किया था. वामपंथ लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में राज करता रहा, तो सबसे ज्यादा कांग्रेस के कार्यकर्ता मारे गए. फिर जब 2015 में ममता बनर्जी ने सत्ता संभाली तो उनके सामने विरोधी के तौर पर कांग्रेस और वामपंथ के साथ ही बीजेपी भी थी. एक साथ तीन विरोधियों से निपटने के लिए ममता बनर्जी के कार्यकर्ताओं ने भी वही रास्ता अपनाया, जो उनकी पूर्ववर्ती कांग्रेस और वामपंथी सरकारें कर चुकी थीं. और इसी का नतीजा है कि पश्चिम बंगाल देश का वो राज्य है, जहां किसी भी एक साल में सबसे ज्यादा राजनैतिक हत्याएं हुई हैं.
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