Submit your post

Follow Us

कहानी उस राज्य की, जहां सत्ता में कोई भी रहा हो विपक्ष के लोग मारे जाते रहे हैं

पश्चिम बंगाल में 14 मई को पंचायत चुनाव के लिए वोट डाले गए. नतीजे 17 मई को आए. और जब नतीजे आए तो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने बाकी विपक्षी दलों जैसे कांग्रेस, बीजेपी और वाम दलों का एक तरह से सफाया कर दिया. नतीजों के मुताबिक 20 जिला परिषद की सभी 361 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस की जीत हुई. इनमें से 202 पर चुनाव ही नहीं हुए, क्योंकि इन सीटों पर किसी और उम्मीदवार ने पर्चा दाखिल नहीं किया था. पंचायत समिति का भी यही हाल था. 7,388 में से 3,090 सीटें बिना चुनाव लड़े ही टीएमसी के खाते में चली गईं. बची हुई जिन 4,298 सीटों पर चुनाव हुए उसमें से 3,598 सीटें तृणमूल के पाले में गईं. ऐसा ही हाल ग्राम पंचायतों का भी है. कुल 29,675 ग्राम पंचायतों में चुनाव हुए थे. इसमें से 20,654 तृणमूल के पास गईं. 16,802 ग्राम पंचायतों पर तृणमूल के उम्मीदवार के सामने कोई उम्मीदवार चुनाव में उतरने की हिम्मत नहीं कर पाया.

पश्चिम बंगाल की सभी 20 जिला परिषद पर तृणमूल का कब्जा है

इन नतीजों को देखते हुए अगर एक लाइन में कहें या फिर तृणमूल कांग्रेस के शब्दों में कहें तो ये कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का जादू कायम है. लोगों ने उनकी पार्टी पर भरोसा जताया है. लेकिन ये एक पार्टी की लाइन है. इसी चुनाव में वो वीडियो भी सामने आए हैं, जिसमें साफ तौर पर बूथ कैप्चरिंग होती दिख रही है.

इसी चुनाव में बैलट बॉक्स नदी से मिले हैं.

इसी चुनाव में तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक भीड़ विपक्षी दल के कार्यकर्ता को घेरकर मारती हुई दिख रही है.

इसी चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के एक मंत्री बीजेपी कार्यकर्ता को मारते हुए दिख रहे हैं.

इसी चुनाव में टीएमसी के कार्यकर्ता लोगों को वोट डालने से रोकते हुए दिख जा रहे हैं.

और यही वो चुनाव है, जिसमें वोटिंग वाले दिन हुई हिंसा में कुल 18 लोगों की मौत हो गई. इतनी अराजकता और 18 लोगों की मौत के बाद जीते हुए चुनाव पर किसी को इतनी खुशफहमी कैसे हो सकती है. लेकिन ममता बनर्जी को है. उन्होंने तो इसे ‘छोटी घटना’ कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया. लेकिन ये घटना छोटी नहीं है. वजह पश्चिम बंगाल का सियासी इतिहास है, जिसमें कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रॉय से लेकर टीएमसी की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल तक करीब 30,000 राजनैतिक लोगों की हत्या देखी है.

ममता बनर्जी के कार्यकाल में हिंसा में बढ़ोतरी हुई है, जिसकी शुरुआत सिद्धार्थ शंकर रॉय के कार्यकाल में हुई थी.
ममता बनर्जी के कार्यकाल में हिंसा में बढ़ोतरी हुई है, जिसकी शुरुआत सिद्धार्थ शंकर रॉय के कार्यकाल में हुई थी.

इसका इतिहास शुरू होता है 1967 से. 1967 के चुनाव में बांग्ला कांग्रेस की अगुवाई में वामदलों के साथ मिलकर अजय मुखर्जी ने सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने. ये राज्य में पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी. लेकिन केंद्र में सरकार कांग्रेस की थी. कांग्रेस के हाथ से राज्य की सत्ता छिटकी, तो उसने प्रतिरोध शुरू किया. सरकार ने भी इसका जवाब दिया. ये पश्चिम बंगाल में हिंसा की शुरुआत थी. लेकिन ये सरकार एक साल भी नहीं चली. वाम दलों के समर्थन वापसी की वजह से सरकार गिर गई और प्रफुल्ल चंद्र सेन मुख्यमंत्री बने. इस दौरान राज्य में हिंसा में कमी आई, लेकिन ये सरकार भी गिर गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया. फरवरी 1969 में राष्ट्रपति शासन हटा तो एक बार फिर से राज्य में चुनाव हुए. इस बार भी किसी को बहुमत नहीं मिला और एक बार फिर से अजय कुमार मुखर्जी ही मुख्यमंत्री बने. लेकिन डेढ़ साल के अंदर ही इस सरकार ने भी विश्वास मत खो दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया. ये सिलसिला 1972 तक चलता रहा.

अजय मुखर्जी (बाएं) और प्रफुल्ल चंद्र सेन के कार्यकाल में भी राजनैतिक हिंसाएं हुईं, लेकिन उनकी संख्या कम थी.

1972 में जब चुनाव हुए तो उस दौरान कांग्रेस और वाम दल दोनों ही राज्य की सत्ता पाने की कोशिश कर रहे थे. अजय मुखर्जी की सरकार गिर चुकी थी और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग चुका था. कहा जाता है कि इस दौरान पश्चिम बंगाल के प्रभारी रहे कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रॉय के नेतृत्व में कांग्रेस ने खूब उत्पात किए, बूथ कैप्चरिंग की और वाम दलों को सत्ता से बाहर रखने के लिए राजनैतिक हत्याएं हुईं. पश्चिम बंगाल के लोग इनकी संख्या 1 हजार से लेकर 11,000 तक बताते हैं, जिनको इस सत्ता संघर्ष में जान गंवानी पड़ी और यही से पश्चिम बंगाल में राजनैतिक हिंसा की शुरुआत हुई. चुनाव में कांग्रेस को जीत हासिल हुई और सिद्धार्थ शंकर रॉय मुख्यमंत्री बने. पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री थे सिद्धार्थ शंकर रॉय और केंद्र में सरकार थी इंदिरा गांधी की. 1971 में बांग्लादेश के अलग देश बन जाने के बाद लाखों शरणार्थी पश्चिम बंगाल में आ गए थे. इसी दौरान नक्सल आंदोलन भी अपने चरम पर था. दोनों मुद्दों पर एक साथ जूझ रही कांग्रेस की केंद्र और राज्य की सरकार ने ताकत का इस्तेमाल किया. वाम दलों ने राजनैतिक तौर पर कांग्रेस का विरोध किया. लेकिन कांग्रेस ने इसका बदला लिया और कई लोग इस हिंसा में मारे गए. हिंसा का ये दौर तीन साल तक चलता रहा और इसी बीच 1975 में देश में आपातकाल लग गया. इस आपातकाल के पीछे भी कहा जाता है कि सिद्धार्थ शंकर रॉय का हाथ था, जिन्होंने देश और खास तौर पर पश्चिम बंगाल में चल रही अस्थिरता का हवाला देते हुए इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने का सुझाव दिया था. 26 जून 1975 को भारत में आपातकाल लग गया.

कहा जाता है कि इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने का सुझाव सिद्धार्थ शंकर रॉय ने ही दिया था.
कहा जाता है कि इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने का सुझाव सिद्धार्थ शंकर रॉय ने ही दिया था.

इसके बाद शुरू हुईं गिरफ्तारियां. कांग्रेस ने अपने सारे विरोधियों को जेल में डाल दिया. पश्चिम बंगाल में भी कमोबेश ऐसे ही हालात थे. वहां वाम दलों के नेताओं को गिरफ्तार किया गया. इस दौरान वामदल के कई नेताओं की हत्याएं भी हुईं. पूरा विपक्ष सिद्धार्थ शंकर रॉय को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहा था. हालांकि बाद में सिद्धार्थ शंकर रॉ के खिलाफ कुछ साबित नहीं हुआ, लेकिन राज्य में हिंसा-प्रतिहिंसा की शुरुआत हो चुकी थी. फिर जब 1977 में आपातकाल हटा तो एक बार फिर से पूरे देश में चुनाव हुए. चुनाव पश्चिम बंगाल में भी हुए. लेकिन इस बार फिर से हिंसा हुई. हर स्तर पर हिंसा हुई. बूथ कैप्चरिंग से लेकर प्रत्याशियों के अपहरण और उनकी हत्या तक की घटनाएं सामने आईं. स्थिति इतनी खराब थी कि जिन नेताओं को आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया था, वो जेल से ही चुनाव लड़े और वो ही सुरक्षित रहे. जब नतीजे आए तो कांग्रेस चुनाव हार चुकी थी और पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चे की सरकार बनी.

ज्योति बसु सबसे लंंबे समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे.
ज्योति बसु सबसे लंंबे समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे.

वाम मोर्चा सत्ता में आ गया और कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा. अब बदला लेने की बारी वाम मोर्चे की थी. ज्योति बसु के नेतृत्व में बनी सरकार, उनकी पुलिस और उनके कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस और उसके नेताओं पर हमला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सियासी हत्याएं होती रहीं. लगातार कांग्रेस के कार्यकर्ता मारे जाते रहे. हर साल सैकड़ों लोग मारे गए और ये क्रम लगातार चलता रहा. सन 1997 में वामदल की सरकार में गृहमंत्री रहे बुद्धदेब भट्टाचार्य ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि वर्ष 1977 से 1996 तक पश्चिम बंगाल में हुई राजनीतिक हिंसा में कुल 28,000 लोग मारे गए थे. ये एक आधिकारिक आंकड़ा था, जिसपर किसी तरह के सवालिया निशान नहीं लगाए जा सकते थे. 1977 के बाद से राज्य में लोकसभा के भी चुनाव हुए, विधानसभा के भी चुनाव हुए और पंचायत के भी चुनाव हुए. हर चुनाव में हिंसा हुई. हर बार हिंसा में हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. राज्य की सत्ता में थे ज्योति बसु, जो मई 2001 तक सत्ता में रहे. इसके बाद भी सत्ता में सीपीएम ही रही और उसका नेतृत्व किया बुद्धदेव भट्टाचार्य ने. करीब 10 साल तक बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में सीपीएम सत्ता में रही. लेकिन इस बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आ गया था.

ज्योति बसु के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में सीपीएम 10 साल तक सत्ता में रही.

सत्ता में बैठे जिन वाम दलों को अभी तक चुनौती सिर्फ कांग्रेस से मिल रही थी, उसे अब एक नई पार्टी भी चुनौती देने लगी थी. ये पार्टी थी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, जिसे 26 साल तक कांग्रेस में रहने वाली और फिर उससे अलग होने वाली ममता बनर्जी ने बनाया था. जनवरी 1998 में बनी इस पार्टी ने वाम दलों को चुनौती देनी शुरू की. वहीं बीजेपी ने भी धीरे-धीरे ही सही अपने पांव जमाने शुरू कर दिए थे. इन दोनों चुनौतियों से एक साथ निपटने के लिए वाम दलों ने फिर वही किया, जो ज्योति बसु के शासनकाल में हुआ था. एक बार फिर से हिंसा की शुरुआत हुई और राजनैतिक हत्याओं का दौर बढ़ गया. दिसंबर 2006 में जब पश्चिम बंगाल में हल्दिया के नंदिग्राम के करीब 70,000 लोगों को घर खाली करने का सरकारी फरमान सुनाया गया, तो इसके विरोध में पूरे नंदीग्राम में आंदोलन शुरू हो गया. इस आंदोलन की अगुवाई भी ममता बनर्जी ने की. इस आंदोलन को दबाने की कोशिश में हुई पुलिसिया फायरिंग में कम से कम 14 लोग मारे गए, जिसके बाद ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में मजबूत विपक्षी के तौर पर उभर कर सामने आईं. 2009 में जब लोकसभा चुनाव हुए, तो ममता बनर्जी को 19 सीटें मिलीं. वहीं 2010 में हुए पंचायत चुनाव में भी पार्टी ने बहुमत के साथ वापसी की.

2006 में हुए नंदीग्राम आंदोलन ने ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थापित कर दिया.

ममता बनर्जी की इस जीत ने वामदलों को परेशानी में डाल दिया. वजह ये थी कि 2011 में विधानसभा के चुनाव थे. ममता बनर्जी के उभार ने पश्चिम बंगाल में पिछले 34 साल से सत्ता पर काबिज वामपंथ के सबसे मजबूत किले को सबसे मजबूती से चुनौती दी थी. और जब मई 2011 में चुनाव के नतीजे आए, तो वामपंथ का सबसे बढ़ा किला ढह गया था. ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बन गई थीं और राज्य की कमान एक नई पार्टी, लेकिन अनुभवी नेता के हाथ में थी. देश और दुनिया को लगा था कि अब पश्चिम बंगाल में हो रही राजनैतिक हिंसाओं पर लगाम लग जाएगी. इसकी वजह ये थी कि चुनाव के दौरान खुद ममता बनर्जी ने कहा था-

हर बदला नॉय, बोदोल चाही (हम बदलाव चाहते हैं, बदला नहीं)

इस नारे ने ममता को जीत दिलाने में भी मदद की थी. लेकिन जीत के साथ ही ममता बनर्जी का रवैया बदल गया. शायद उन्हें 16 अगस्त 1990 का वो दिन याद आ गया, जब उनकी जान जाते-जाते बची थी. उस वक्त वो कांग्रेस में थीं और बसों के बढ़े किराए के खिलाफ उस दिन प्रदेश व्यापी आंदोलन के एक हिस्से का नेतृत्व कर रही थीं. भीड़ ने उन्हें बुरी तरह घेर लिया और रैली पर हमला कर दिया. खुद ममता अपनी आत्मकथा में लिखती हैं-

“जैसे ही हमला शुरू हुआ, मेरे कुछ साथियों ने मुझे बाटा शोरूम की तरफ वाली रोड की तरफ खींचना शुरू किया. मैंने देखा कि लालू आलम और उसके चार-पांच साथी मेरी तरफ बढ़ रहे हैं. उन्होंने हाथ में लोहे की रॉड और पिस्तौलें थामी हुई हैं. मुझे पता था कि यही होने वाला है. मैं शांति से उनके मुझ तक पहुंचने का इंतजार करने लगी. लालू आलम के साथियों ने पुलिस के हेलमेट पहन रखे थे, उनमें से कुछ के पास पुलिस की लाठियां भी थीं. मतलब साफ़ था. इस पूरे हमले को पुलिस की मदद से अंजाम दिया जा रहा था. लालू आलम ने आते ही मेरे सिर पर लोहे की रॉड से वार किया. मैं खून से भीग गई. आश्चर्य की बात यह थी कि मुझे दर्द नहीं हो रहा था. तभी उसने एक और वार किया. यह मेरे मगज के काफी करीब लगा. तभी मैंने तीसरा वार अपनी तरफ आते हुए देखा. इस बार मैंने बचाव के लिए अपने हाथ उठा दिए.”

ममता बनर्जी को बाद में अस्पताल में होश आया. उन्हें वहां जानकारी मिली कि 16 अगस्त के उस हमले में उन्हें गोली मारने की योजना थी. लेकिन एक पुलिस अधिकारी और ममता के शुभचिंतक गुरुपद सोम की वजह से इसे अंजाम नहीं दिया जा सका.

16 अगस्त 1990 को भीड़ के बीच घिरीं ममता बनर्जी.

ममता बनर्जी शायद इस घटना को कभी नहीं भूलीं. इसके अलावा उन्हें ये भी पता था कि पश्चिम बंगाल की सत्ता उन्हें 30 साल से भी ज्यादा के संघर्ष के बाद मिली थी. इसे बचाने के लिए उन्होंने हर मुमकिन कोशिश की, जो अब भी चल रही है. इसी कोशिश में एक काम विपक्षी दलों को सत्ता की मदद से उनके अंजाम तक पहुंचाना रहा है. लेकिन इस दौरान एक बदलाव और हुआ है. वाम दलों से बदला लेने की कोशिश के दौरान ममता ये भूल गईं कि विपक्ष में सिर्फ वाम दल ही नहीं, कांग्रेस और बीजेपी भी है. सत्ता में बैठीं ममता और उनके कार्यकर्ताओं ने हिंसा के दौरान वामदल, कांग्रेस और बीजेपी में कोई फर्क नहीं समझा और सभी को एक ही लाठी से हांकना शुरू किया. इसी का नतीजा था कि एनसीआरबी ने जो आंकड़े जारी किए, उसमें राजनैतिक हिंसा की भयावह तस्वीर सामने आई. एनसीआरबी के आंकड़ों मुताबिक 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 91 घटनाएं हुईं, जिसमें 205 लोगों की मौत हुई थी. 2015 में कुल 131 वारदात हुई थी, जिसमें 184 लोगों की मौत हुई थी. ममता के सत्ता संभालने के दो साल बाद 2013 में भी बंगाल में राजनीतिक वजहों से 26 लोगों की हत्या हुई थी और ये हिंसा देश के किसी भी राज्य से कहीं ज्यादा थी. अब जब 2018 में सिर्फ और सिर्फ पंचायत के चुनाव हुए तो एक दिन में 18 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

2016 में जब दोबारा राज्य में विधानसभा चुनाव हुए, तो ममता बनर्जी की पार्टी को एक बार फिर से जीत हासिल हुई.

1967 से शुरू हुई राजनैतिक हिंसा 2018 तक पहुंच गई है. इसमें एक जो चीज कॉमन है वो है सत्ता. सत्ता कांग्रेस के हाथ में रही, तो उसने वामदलों को कुचला. जब सत्ता वामदलों के हाथ में आई तो उसने कांग्रेस को कुचला. जब सत्ता इन दोनों के हाथ से छिटककर तीसरी पार्टी टीएमसी के हाथ में आ गई, तो वो इन दोनों को ही कुचल रही है.

इसके साथ ही 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में मजबूती से उभर रही बीजेपी भी स्वाभाविक तौर पर सत्ता पक्ष के निशाने पर है और इस हिंसा की शिकार हो रही है.

ये तो हुई हिंसा की बात, लेकिन इस हिंसा की जड़ में एक और भी वजह दिखती है. वो ये है कि जिस महात्मा गांधी और उनकी अहिंसा को पूरा देश फॉलो करता है, उसी महात्मा गांधी को पश्चिम बंगाल में सिरे से नकार दिया गया. पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए सुभाष चंद्र बोस और खुदीराम बोस जैसे क्रांतिकारियों को अपना नेता माना, जिन्होंने हथियार के बल पर अंग्रेजों से लोहा लेने की ठानी थी. पश्चिम बंगाल के भी लोगों ने भी अब तक यही किया है. उन्हें अपने विपक्षियों से निपटने का एक ही तरीका मालूम है और वो है हिंसा. सरकार चाहे कोई भी रही हो, उसका भी नजरिया यही रहा है और यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में अब तक कम से कम 30,000 लोग राजनैतिक हिंसाओं का शिकार हुए हैं.

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान कई जगहों पर टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं की झड़प हुई.

इसके अलावा पश्चिम बंगाल में हो रही हिंसा के पीछे की एक बड़ी वजह आर्थिक भी है. और राज्यों की तरह बंगाल में भी जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन उद्योग-धंधों में उस अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हो रही है. ऐसे में बेरोजगार युवक अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ रहे हैं ताकि पंचायत और नगरपालिका स्तर पर होने वाले ठेके मिल सकें. स्थानीय स्तर पर होने वाली वसूली भी कमाई का एक जरिया ही है. इसीलिए वो हर कीमत पर अपने उम्मीदवार को जिताना चाहते हैं, चाहे उसके लिए कितनी भी हिंसा क्यों न करनी पड़े.


ये भी पढ़ें:

बंगाल पंचायत चुनाव में हिंसा बताती है कि ममता वो दिन भूल गईं जब वो मरते-मरते बची थीं

बंगाल के पंचायत चुनाव में इतनी हिंसा हो गई है, जितनी अंडरवर्ल्ड गैंगवॉर में भी नहीं होती

क्या है पश्चिम बंगाल में दंगे का सच?

ममता मुसलमानों को खुश करने चलीं, कोर्ट से डांट खाकर लौटीं

क्या ये तस्वीर FB पोस्ट से बंगाल में भड़की हिंसा में हिन्दुओं पर हुए ज़ुल्म की है?

पड़ताल: क्या ट्रेन में बच्ची होने की वजह से BJP नेता को पब्लिक ने उतार दिया?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

अपने गांव की बोली बोलने में शर्म क्यों आती है आपको?

अपने गांव की बोली बोलने में शर्म क्यों आती है आपको?

ये पोस्ट दूर-दराज गांव से आए स्टूडेंट्स जो डीयू या दूसरी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं, उनके लिए है.

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

जिन फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख सकते, वो हमारे बारे में क्या बताती हैं?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मेरा बाएं-हत्था होना लोगों को चौंकाता है. और उनका सवाल मुझे चौंकाता है.

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.