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खबर स्वादानुसार: अमेरिकी मीडिया का भावना आहत न करने का फॉर्मूला

यही तो यहां भी लोग चाहते हैं, उम्मीद है हिंदुस्तान में भी इसके पालन से अच्छे दिन आएंगे.

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फोटो - thelallantop
हमारे मोहल्ले के कखग जी को मोदी जी बड़े अच्छे लगते हैं. वहीं एबीसी बाबू को झाड़ू वाली पार्टी बड़ा सही लगती है. दोनों अपने-अपने व्हाट्सएप ग्रुप से रोज़ ताज़ा ज्ञान प्राप्त करते हैं और बहसते हैं.एक को ऑड-ईवन में कोई कमी नहीं दिखती दूसरे को नोटबंदी में सब अच्छा लगता है. दोनों के अपने-अपने प्रिय सूट-बूट धारी पत्रकार हैं. दोनो जब कभी भूले-भटके हमारे पेज पर आ जाते हैं तो अलग-अलग तमगे चिपका जाते हैं.एक बार तो दोनो ने चैलेंज भी इनबॉक्स कर दिया था कि इस पर लिखकर दिखाओ तो जाने. जब लिख दिया तो बोले अरे, तुमने लिख कैसे दिया? हमारी तो भावना आहत हो गई.
खैर, अमेरिकी मीडिया ने इसका तोड़ निकाल लिया है. यकीन मानिये कि ये हल जल्द ही हिंदुस्तान आ जाएगा. ट्रंप के जीतने के बाद से ही अमेरिकी मीडिया को बायस्ड कहा जा रहा था. अब वहां के बड़े अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक फोटो वायरल हो रही है इसमें एक दिन के अखबारों के अलग-अलग एडीशन में एक ही खबर एक ही फोटो को दो अलग-अलग इलाकों में बिलकुल उल्टी हेडलाइन के साथ छपी हैं.
एक में कहा गया है कि ट्रंप ने मैक्सिको के साथ सख्ती की है. दूसरे एडिशन में लिखा है ट्रंप ने मैक्सिको के साथ नरमी बरती है. हम आपको बता दें कि ये फोटो वायरल अब हो रही है मगर खबर तब की है जब वोटिंग हो रही थी. ज़ाहिर सी बात है अलग-अलग इलाकों में राजनीतिक समीकरणों को जैसे प्रभावित करना था उस लिहाज से खबरों की हेडलाइन लगाई गईं.
चलो हमें तो अब पर्सनल वाली खुशी है कि आगे से भावना आहत होने का झंझट खत्म हो गया. बस एक अफसोस है कि हमारे यहां लोग ट्रंप के लिए हवन करते रह गए और अगली बड़ी खोज भी ससुर अमेरिका ही कर ले गया. trump और हां इन दोनो खबरों में हेडलाइन के ऊपर जो दो अलग रंग के विज्ञापन मिले हैं उसका अमेरिका की राजनीति में कोई योगदान नहीं है.

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