अपने देश में खेती-बाड़ी का सबसे ज्यादा नुकसान प्राकृतिक आपदाओं ने किया है. इस गांव में भी खेती-बाड़ी को नुकसान पहुंचता है. लेकिन ये आपदा प्राकृतिक नहीं, लोगों की बनाई हुई है. इसे रोकने में सरकारें नाकाम रहीं हैं. इस गांव की खेती को सबसे ज्यादा नुकसान हाथियों से पहुंचता है. दैनिक अखबार दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल ये हाथी धान की फसलों को रौंद कर चले जाते हैं. उनके जाने के बाद बचती है शांति. प्रलय के बाद की शांति.

हाथियों का झुंड कुंजियाम गांव में तबाही मचा देता है.(फोटो: दैनिक भास्कर)
ये हालात किसी एक साल के नहीं हैं. पिछले 17 सालों से कुंजियाम गांव के लोग ऐसे ही हालात से दो-चार होते हैं. भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक 200 परिवारों में से 100 परिवार ऐसे हैं, जिनकी फसल हर साल पूरी तरह से बर्बाद हो जाती है. खाने के लिए दाने-दाने को मोहताज हुए ये लोग हाथी की लीद से अनाज निकालकर खाने को मजबूर हैं. ऐसा सिर्फ इसी गांव के साथ नहीं हो रहा है. कुंजियाम के आस-पास के गांव कदली वाली, बड़कदर, बलराम चंद्रपुर, जठमा गाविंदा, सई, चतरंग जड़ी, सर्विल जामू नाड़ी, भल्याडेटा, रेगड़, सादी और हेडल कोंचा हैं. इनमें से कई गांव ऐसे हैं, जो मेन रोड से 15-20 किमी अंदर हैं और वहां पैदल ही जाया जा सकता है. इन गांवों के लोगों को भी हाथियों की दहशत से दो-चार होना पड़ता है.

फसलों के साथ हाथी घरों में भी तोड़-फोड़ कर देते हैं और बर्तनों को भी नुकसान पहुंचाते हैं. (फोटो: दैनिक भास्कर)
हाथियों के हमले से परेशान लोग बताते हैं कि जब हाथी फसलों को रौंद कर चले जाते हैं, तो पूरी तरह बर्बादी ही नजर आती है. ऐसे में सरकार का कोई आदमी आता है, आंकड़े जुटाता है और उस आधार पर राज्य सरकार की ओर से मुआवजे का पैसा मिल जाता है. ये पैसे इतने कम होते हैं कि खाने के लिए पूरे नहीं पड़ते. हाथी जब फसलों को रौंद रहे होते हैं, तो वो खड़ा धान ही खा जाते हैं. वो उन्हें पचता नहीं हैं और उनकी लीद में वो अनाज ऐसे ही चला आता है. ऐसे में हम लोग उस लीद को पहले बालू छानने वाले छनने से छानते हैं. उसमें कटहल की गुठलियां, धान और फसलों के बीज को अलग कर लेते हैं. जो मिलता है, उसमें से भी धान को अलग किया जाता है और फिर उसे कड़ी धूप में सुखाया जाता है. इसके बाद उससे खाने लायक कुछ चावल निकल आता है. खाने का ये जुगाड़ भी सितंबर-अक्टूबर महीने में ही हो पाता है, क्योंकि इसके बाद हाथी लौटने लगते हैं और उनका पीछा करके लीद जुटाना मुश्किल काम हो जाता है.
अनाज बीपीएल को मिलता है, लेकिन फसल तो सबकी खराब होती है

जो सरकारी अनाज मिलता है, उससे लोगों का गुजारा नहीं हो पाता है. (फोटो: दैनिक भास्कर)
ओडिशा में भी पीडीएस सिस्टम लागू है. पीडीएस यानी सरकार की ओर से कम कीमत पर दिया जाने वाला गेहूं और चावल. यहां एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से गेहूं और चावल मिलता है. एक परिवार को 25 किलो अनाज मिलता है, जो सिर्फ बीपीएल परिवार यानी गरीबी रेखा से नीचे वालों को ही दिया जाता है. फसल खराब होती है तो इसका प्रभाव गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले पर भी पड़ता है, लेकिन उन्हें अनाज नहीं सिर्फ मुआवजे से काम चलाना पड़ता है, जो नाकाफी होता है.
झारखंड से आते हैं हाथी

25-30 के झुंड में हाथी आते हैं और गांवों को बर्बाद कर चले जाते हैं. (फोटो: facebook)
स्थानीय प्रशासन के सूत्रों के मुताबिक ये हाथी झारखंड से आते हैं. झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में खदानें हैं, जहां खुदाई चलती रहती है. ऐसे में हाथियों के पास रहने की जगह नहीं होती है और वो ओडिशा की ओर चले जाते हैं. हर साल उनके आने का टाइम फिक्स होता है. हाथी अगस्त से अक्टूबर के बीच ही आते हैं. इन दिनों में खेत में धान की फसल खड़ी होती है, जिन्हें अगले तीन महीनों तक ये हाथी रौंदते रहते हैं. जब खेतों में कुछ नहीं बचता है, ये हाथी लोगों के घरों की ओर भी आ जाते हैं. घरों में तोड़-फोड़ करते हैं और घर का अनाज भी खा लेते हैं. ऐसे में हाथी के हमले से बचने के लिए लोग मचान पर रात गुजारने के लिए मजबूर हो जाते हैं.
इन गरीबों की सुनने वाला कोई नहीं है

कभी-कभी लोगों को अपना घर छोड़कर पेड़ों पर भी शरण लेनी पड़ती है. (फोटो: दैनिक भास्कर)
हाथियों से हो रही दिक्कत पिछले 17 सालों से बदस्तूर जाती है. इससे बचने के लिए दो उपाय सुझाए गए हैं, लेकिन अमल किसी पर नहीं हो रहा. पहला उपाय तो ये है कि हाथियों के लिए कॉरीडोर बना दिया जाए, जिससे वो खेतों तक न पहुंचें. इस कॉरीडोर को बनाने में काफी खर्च है. इसके अलावा कृत्रिम तौर पर हाथी जैसे जानवर के लिए कॉरीडोर बनाना और फिर उसकी देखभाल करना मुश्किल काम है. इसलिए सरकार कोई भी हो, हर बार इस प्रोजक्ट को टाल ही जाती है.
दूसरा उपाय है, गांव से लोगों को हटाना और उन्हें किसी ऐसी जगह पर बसाना, जहां हाथियों के हमले का खतरा न हो. ये उपाय थोड़ा आसान है, लेकिन इसके अपने खतरे भी हैं. पहला तो ये कि लोग अपना गांव छोड़कर जाने को तैयार ही नहीं होंगे, क्योंकि वहां उनकी खेती-बाड़ी है. इसके अलावा हाथियों के नुकसान के एवज में उन्हें पैसे भी मिल जाते हैं, जिससे वो किसी तरह गुजर-बसर कर ही लेते हैं. दूसरा खतरा ये है कि झारखंड से जो हाथी अभी आते हैं, वो आगे भी आएंगे. अभी उन्हें रौंदने और खाने के लिए अनाज मिल जाता है, तो वो उसी रास्ते पर चलते हैं. अगर यहां की आबादी को हटा दिया जाए, तो हो सकता है कि ये हाथी कोई और रास्ता अख्तियार कर लें या किसी और गांव पर हमला बोल दें, जिससे नुकसान पहले की तुलना में बढ़ जाए.
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