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बस 80 रुपये थे पर्स में, और 3 हजार किलोमीटर नाप आई ये लड़की

साथ में मम्मी भी थीं. सबसे ख़ास बात तो ये कि 80 रुपये भी खर्च नहीं हुए.

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फोटो क्रेडिट- अल्का का ब्लॉग
जेब में बिना एक फूटी कौड़ी कोई कितना घूम सकता है? ज्यादा से ज्यादा घर 15 किलोमीटर. 20 किलोमीटर या चलिए मान लिया जाए इससे और ज्यादा. क्यों, सही कह रहे हैं न? लेकिन ऐसा भी नहीं है एक लड़की 80 रुपये लेकर निकली और 3 हजार किलोमीटर नाप आई.
गाजियाबाद की रहने वाली अल्का कौशिक. पर्स में महज 80 रुपये. और 3 हजार किलोमीटर का सफ़र. अकेले ही नहीं. बल्कि अपनी मम्मी के साथ. अल्का एक ब्लॉगर है. ट्रैवल ब्लॉग्स लिखती हैं. ट्रैवल ब्लॉग माने सैर-सपाटे की कहानी उसी की जुबानी. जिसे पढ़कर या तो आपका मन घूमने का करेगा या फिर ब्लॉग पढ़कर ही लगेगा कि आपने उस जगह को शब्दों से ही घूम लिया है.
8 नवंबर को नोटबंदी का ऐलान हुआ. उस वक्त अल्का साउथ इंडिया घूम रही थीं. नोटबंदी के खबर से अंजान, मस्ती में डूबी. अचनाक उनके हस्बैंड ने नोटबंदी की शॉकिंग खबर उन तक पहुंचाई. जब अल्का ने पर्स में पड़े पैसे गिने तो 80 रुपये थे. बेचारी सोच में पड़ गई कि अब आगे क्या होगा. अल्का को तो उस वक्त पेटीएम भी यूज करना नहीं आता था. और उनकी मम्मी तो इन सब से कोसो दूर हैं.
फोटो क्रेडिट- अल्का का ब्लॉग
फोटो क्रेडिट- अल्का का ब्लॉग

अल्का के होटल बिल का जिम्मा तो उसके डेबिट कार्ट ने उठा लिया. लेकिन जनाब परदेस में और भी खर्चे होते हैं. उसका क्या? परेशान अल्का को कुछ समझ नहीं आ रहा था. फिर उन्होंने एक लोकल ट्रैवल एजेंट रामू को पकड़ा. उससे नोटबंदी का दर्द बयान किया. रामू का रायचूर जिले के सिंधनूर में अपना खोखा है. वो अल्का की मदद करने को रेडी हो गया.
अल्का अपने ब्लाग में लिखती हैं, 'रामू को टूटी-फूटी हिंदी आती है. उसने मुझसे कहा, आप टेंशन न लीजिए. बताइए कहां जाना है. मैं कैब बुक कर देता हूं.'
10 नवंबर को अल्का अपनी मॉम के साथ घूम-घाम कर सिंधनूर वापस आई. दोनों हम्पी के पुराने मंदिर को स्कैन कर के लौटे थे. अगले दिन उन्हें ट्रिची जाना था. जो सिंधनूर से 8 सौ किलोमीटर दूर था. रामू ने अल्का को पेट्रोल पंप पर कार्ड से पेमेंट करने का आइडिया चिपका दिया था. अल्का ने वैसा ही किया. 24 सौ रुपये पेट्रोल पंप पर कार्ड से स्वाइप किया. रामू ने कैब का पेमेंट भी ऑनलाइन लिया.
फोटो क्रेडिट- अल्का का ब्लॉग
फोटो क्रेडिट- अल्का का ब्लॉग

अल्का कहती हैं, 'विश्वास नहीं होता कि परदेस में कोई अजनबी आपकी इत्ती मदद करता है. रामू ने मुझसे पूछा तक नहीं कि मैं कौन हूं, कहां से आई हूं. उसने पेमेंट के लिए बस अपना अकाउंट नंबर दे दिया. और 8 रुपये प्रति किलोमीटर कैब का चार्ज लिया.' दोनों मां-बेटी ने खूब मौज की चेन्नई में. 14 नवंबर को उनकी चेन्नई से फ्लाइट थी. अल्का अपने घर वापस आ गई हैं. पहुंचते ही उन्होंने पहले रामू के अकाउंट में 13,500 रुपये ट्रांसफर किए.
इधर रामू कहते हैं, 'अल्का अपनी मां के साथ थी. न चाहते हुए भी हेल्प करना ही था. और मुझे पता था कि पैसे तो कहीं जाने हैं नहीं.'
इस ट्रिप से अल्का को फायदा हुआ. और वो ये कि 7 दिन के इस कैशलेस सफर में उन्हें कहीं भी टोल टैक्स नहीं देना पड़ा. और उनके पर्स में पड़े 80 रुपये ने भी साउथ इंडिया घूम लिया. और वैसे का वैसा वापस भी आ गया.


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