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भलाई की सप्लाई करती हैं पाकिस्तानी की ये दीवारें

पाकिस्तान छोड़ो, इंडिया का भी कोई भला आदमी इस दीवार को कभी नहीं तोड़ना चाहेगा.

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क्रेडिट: REUTERS
'जिस चीज की जरूरत हो ले जाएं, बदले में सिर्फ हर्फ-ए-दुआ दे जाएं'
सरहद वाली दीवार जब टूटेगी, तब टूटेगी. फिलहाल पाकिस्तान में एक ऐसी 'मजबूत' दीवार बन गईं हैं, जो कभी न टूटे तो ही सही रहेगा. यकीन मानिए, पाकिस्तान में अब तलक जित्ते भले काम हुए हैं, उसमें सबसे नेकी भरा काम यही हो रहा है. भलाई वाली दीवार. नाम है वॉल ऑफ काइंडनेस. ये दीवारों बीते महीने से पाकिस्तानी शहरों में नजर आने लगी हैं.
क्रेडिट: FB
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क्या है ये दीवार? नेकी कर, दीवार पर कपड़ा टांग. लोगों को जब दिल पसीजता है. किसी की मदद करने का मन करता है, तो वो एक खास जगह बनी दीवार पर कपड़े टांग देते हैं. गर्म कपड़े. खाने का सामान. ताकि जो जरूरतमंद लोग हैं, वो वहां आएं और अपनी जरूरत का सामान उठाकर ले जाएं. ऐसी दीवारों का ट्रेंड ईरान से शुरू हुआ था. ऐसी दीवारें कहलाई गईं, वॉल ऑफ काइंडनेस. अब पाकिस्तान के शहरों में भी 'वॉल ऑफ काइंडनेस' बनाई जा रही हैं.
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पाकिस्तान के कौन से शहरों में है ये वॉल? ईरान की राजधानी तेहरान से शुरू हुआ था ये किस्सा. पाकिस्तान में कुछ नेक लोगों को लगा, ये दीवार अपने मुल्क में भी बननी चाहिए. बस फिर क्या, कराची से शुरू हुआ दीवार का बनना. रावलपिंडी, पेशावर और लाहौर में भी फटाक से दीवार खड़ी कर दी गईं. लोगों ने आकर अपने कपड़े टांगे. जरूरत के सामान रखना शुरू किया. सोशल मीडिया ने बढ़िया काम किया. खूब सारे लोग जुड़ते रहे. गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए किताबों का भी इंतजाम किया गया.
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कराची के बहरिया कॉलेज की पहल कराची में बहरिया कॉलेज है. वहीं दो प्रोफेसर्स हुए, इस्मत अली और मरिया वकास. कराची में सबसे पहले इन्होंने की वॉल ऑफ काइंडनेस को शुरू किया. 15 जनवरी 2016 को पहली वॉल ऑफ काइंडनेस बनाई गई. कॉलेज वालों ने कहा, 'इस पहल की सबसे बढ़िया बात ये है कि मदद के लिए सरकार का मुंह नहीं ताकना पड़ता है. इससे जरूरतमंद लोगों की मदद ज्यादा बेहतर तरीके से हो जाती है.'
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