The Lallantop

इस चायवाले का खबर में आना एक बेहद खतरनाक बात है

ये फ़ोटो नहीं वायरल हुई बल्कि इसके बहाने हमारा दोहरापन वायरल हुआ.

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फोटो - thelallantop
आगे का मसाला और मसला पढ़ने से पहले दिमाग में ये फ़िट कर लिया जाए कि ये वो वक़्त है, जब दो कहो तो सोशल मीडिया से होते हुए आप तक चार पहुंचता है. पाकिस्तान में एक लड़का दिखा. दिखा क्या, दिखाया गया. चाय बेच रहा था. किसी ने महंगे कैमरे से फ़ोटो खींची और उसे इन्टरनेट पर डाल दिया. अगले ही मिनट वो फ़ोटो सब तक पहुंच चुकी थी. एक चाय वाला लड़का जिसकी नीली, खूबसूरत आंखें थीं. और वो लड़का अपनी उन्हीं नीली आंखों के दम पर इन्टरनेट सेंसेशन बन गया. जैसे कभी कोरियन साई गंग्नम स्टाइल गाते हुए बन गया था. उसकी अपनी वजह थी. इस लड़के की अपनी. कोरियन साई एक वायरल गाने के बाद आज कहां हैं, नहीं मालूम. पाकिस्तानी, नीली आंखों वाला वो चाय बेचने वाला लड़का आज मॉडल बन बैठा है. रातों-रात. खबर मिली कि किसी कपड़े के ब्रांड के लिए मॉडल बन गया है और किसी फ़िल्म में रोल मिल गया है. यकीन मानिए, उस लड़के के फ़ेमस होने या सेंसेशन बन जाने के पीछे न उसकी नीली आंखें ज़िम्मेदार हैं, न उसका चाय बनाना. असल ज़िम्मेदार है ये कॉम्बिनेशन. नीली आंखों वाला चाय बेचने वाला लड़का. हमने कितने ही नीली आंखों वाले लड़के देखे हैं. हमने कितने ही चाय बेचने वाले लड़के देखे हैं. कभी किसी को सेंसेशन बनते नहीं देखा. लेकिन इस लड़के के साथ समस्या ये थी कि ये एक ऐसा कॉम्बिनेशन था जिसे भुनाया जा सकता था. ये लड़का नीली आंखें रखे हुए था और चाय बेच रहा था. ये हुआ मसाला. बेचने लायक मसाला. हमें यही लड़का किसी पब में, कॉलेज में, रेस्टोरेंट में, मेट्रो में (खैर, पाकिस्तान में मेट्रो चलती नहीं है) मिलता तो हम इतना नहीं चौंकते. हमारे लिए अजूबा यही था कि वो लड़का नीली आंखों के बावजूद चाय बेच रहा था. या ये कि चाय बेचने के बावजूद उस लड़के की आंखें इस कदर खूबसूरत कैसे थीं? लड़का खुद यूं खूबसूरत कैसे था? दरअसल हमने गरीबी और ख़ूबसूरती की गैरमौजूदगी को एक साथ जोड़ लिया है. हमें इतने अच्छे से मालूम है कि गरीब कभी खूबसूरत नहीं हो सकता या उसकी आंखें नीली नहीं हो सकती हैं कि जैसे ही हम एक गरीब को खूबसूरत पाते हैं, उसे अजूबा मान लेते हैं. उसकी फ़ोटो खींचते हैं. वेबसाइट पर डालते हैं. खबरें चलती हैं. हिट्स मिलते हैं. और ये बात सिर्फ ख़ूबसूरती तक ही नहीं सीमित है. हमें स्टेशन के बाहर गाना गाकर भीख मांगते बच्चे ज़्यादा सुरीले लगते हैं.

बॉम्बे टॉकीज़ फ़िल्म में स्टेशन के बाहर बैठी लड़की जब गाती है 'लग जा गले के फिर ये हसीं रात हो न हो...', आपके आंसू नहीं रुकते. 'मेरा जूता फ़ेक लेदर, दिल छीछालेदर...' उस वक़्त और भी अच्छा लगने लगता है जब ये मालूम चलता है कि उसे गाने वाली लड़की मुंबई लोकल में सामान बेचा करती थी. उसका नाम भी दिमाग पर जोर देने में याद आता है. 12 साल की दुर्गा. 


 
हमने जब-जब अच्छी, खूबसूरत, नीली आंखें देखी हैं, तो बस ऐश्वर्या राय याद आई है. ख़ूबसूरत लोग हमें फ़िल्मों में चाहिए. उससे कम कुछ नहीं. आम जनमानस खूबसूरत हो ही नहीं सकता. डिज़र्व ही नहीं करता. और किसी चाय वाले की खूबसूरत आंखें हों तो बरबस ही मुंह से निकल पड़ता है, "अरे, तुम्हें तो फिल्मों में होना चाहिए." ये किस तरह की छटपटाहट है हमारी? हम हर खूबसूरत इंसान को एक्सेप्ट करने जैसा कुछ ढोंग क्यों करते हैं? ये कहकर कि 'तुम्हें तो फ़िल्मों में होना चाहिए,' क्यूं हम उसे ये जताना चाहते हैं कि 'भाई, तुम चाय वाले नहीं हो. नॉर्मल हो. या शायद नॉर्मल से भी बढ़कर हो. तुम हमसे भी ऊपर उठ सकते हो.' मगर जब कोई कॉलेज का लड़का वैसा ही दिख जाता है, तो हम ये कहना भूल जाते हैं. दस सेकंड को उसे निहार, किनारे कर देते हैं. क्यूंकि वो हमारे लिए अजूबा ही नहीं होता. क्यूंकि वो चाय नहीं बेच रहा होता. क्यूंकि वो गरीब नहीं होता. क्यूंकि उस स्टोरी में पर्याप्त मसाला नहीं होता. क्यूंकि एडिटर उस स्टोरी को 'हू केयर्स?' कहकर ख़ारिज कर देता है. मगर एक गरीब चायवाला नीली आंखें लेकर पैदा हो गया तो कमाल हो गया. वाह!

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