"माह-ए-रमज़ान में अल्लाह के नाम पर ज़बरदस्ती दे दे!"
पेरिस से लेकर कराची के ट्रैफिक सिग्नल तक, भिखारियों की इनकम बढ़ी है.
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symbolic image. reuters
रमजान आते ही ऐसे लोगों की संख्या में भी इजाफा हो जाता है, जो मैले-कुचेले कपड़े पहने होते हैं. महिलाएं गोद में एक नहीं, दो-दो बच्चों को लिए होती हैं. कोई रिक्शा में बैठा होता है. तो कोई पैर या हाथ पर प्लास्टर बांधे होता है. जबान पर बस ये ही होता है. 'दे देना अल्लाह के नाम पे.' क्योंकि जानते हैं कि मुसलमान जकात निकालते हैं. जिसको लेने के लिए भिखारियों की संख्या बढ़ जाती है. शहर हो या गांव भिखारियों ने डेरा डाल लिया है. मुस्लिम इलाकों में ज्यादा संख्या देखी जा सकती है. जैसे-जैसे ईद करीब आएगी इनकी संख्या भी बढ़ती जाएगी, क्योंकि उस वक्त मुसलमान काफी दान करते हैं. हालांकि बाकी के दिनों में भी ऊपर वाले के नाम पर भीख मांगने का सिलसिला पुुराना है. 'ट्रैफिक सिग्नल' फिल्म देखी है. वही जो मधुर भंडाकर ने 2007 में बनाई थी, जिसे नेशनल अवॉर्ड भी मिला था. कुछ याद आई फिल्म की कहानी. चलिए हम याद दिलाते हैं. फिल्म में दिखाया गया था कि किस तरह ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मंगवाई जाती है और माफिया करोड़ों में खेलते हैं. ये बात सिर्फ फिल्मी ही नहीं है. काफी हद तक सच भी है. महानगरों में ये दिक्कत अब भी है. बात हम इंडिया के महानगरों की ही नहीं कर रहे हैं. ये समस्या बड़ी है. पाकिस्तान के कराची शहर में ट्रैफिक सिग्नल भिखारियों ने कब्ज़ा लिए हैं. ठीक ऐसी ही परेशानी फ्रांस के पेरिस में भी देखी जा रही है. रिहायशी इलाकों की सड़कों और ट्रैफिक सिग्नल पर भिखारी घूमते दिखाई दे जाएंगे. एक उर्दू वेबसाइट के मुताबिक, कराची में बाहर से आए भिखारियों ने सड़कों पर डेरा डाल रखा है. भीख मांगने वाली ख्वातीन मज़हबी लगती हैं. जो सलाम करने के बाद अल्लाह के नाम पर भीख मांगती हैं. ज्यादातर भिखारी मुसलमान ही नजर आते हैं. लेकिन उनमें से कुछ हैं कि जब उनसे बात करो तो उन्हें अस्सलाम अलेकुम या फी सबिलिल्लाह के अलावा कुछ नहीं आता. जिससे मालूम पड़ता है कि वो मुसलमान नहीं हैं. ये सिर्फ और सिर्फ जकात की वजह से है, जो मुसलमान अपनी इनकम का कुछ हिस्सा ग़रीबों में जकात के रूप में दान करते हैं. इसी को हासिल करने लिए जहां कुछ मुसलमान बने नजर आते हैं. वहीं भीख मांगने के लिए कुछ लोग खुद को मुसलमां दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि इस बात से भीख देने वालों को शायद ही फर्क पड़े कि जिसे जकात दी जा रही है वो मुसलमां है या कोई दूजे धर्म का. मस्जिदों और दरगाहों को घेर लेते हैं भिखारी
जिन्हें मिले यूं, वो करे क्यूं. अंदाज में भिखारी दरगाहों और मस्जिदों पर डेरा लेते हैं. जुमे के दिन इनकी संख्या अचानक से बढ़ जाती है. लोग दान करते हैं. भिखारी मौज करते हैं. जो सच में मदद के हकदार हैं वो भिखारियों के इस फर्जीवाड़े में पीछे रह जाते हैं. हमारी सोच बढ़ा रही भिखारी
हम अल्लाह या भगवान को खुश करने के लिए भीख देते हैं. ताकि हमारा ईश्वर खुश हो जाए और हमारी मन्नतें पूरी हो जाएं. हम खुद भीख देने के लिए लोगों को तलाशते हैं. हम उन्हें काम करने के लिए प्रेरित नहीं करते. बल्कि एक-दो या दस रुपये भीख में देकर ये सोचते हैं कि बड़ा पुण्य या सवाब का काम कर दिया. भीख मांगने के अपने-अपने अंदाज
भिखारियों की बात की जाए तो वह सिर्फ रमजान तक महदूद नहीं है. ट्रैफिक सिग्नल पर आप बिना रमजान के भी छोटे-छोटे बच्चों को भीख मांगते देख सकते हैं. महिलाएं भी फटी पुरानी सदी में लिपटी नजर आ जाएंगी. कोई इंग्लिश में रिक्वेस्ट करेगा प्लीज दे दो ना. तो कोई अपनी विकलांगता को भीख का जरिया बनाएगा. औरंगाबाद शहर से एक खबर आई थी कि कुछ लड़कियां हैं, जो जींस, टी-शर्ट पहनकर भीख मांगती थीं. कॉलेज गर्ल बनकर पुरुषों को अपने जाल में फंसा कर 50- 100 रुपये की उगाही कर लेती थीं. नोटों के बोरे जले तो पता चला भिखारी ऐसे भी होते हैं
मुंबई में जब एक झोपड़ी में आग लगी तो लोग बुझाने के लिए पहुंचे. जिस झोपड़ी में आग लगी थी वो बुजुर्ग अब्दुल रहमान शेख की थी, जिसमें वो अपनी बीवी के साथ रहते थे. इस आग में नोटों से भरे बोरे भी जलकर राख हो गए. नोटों के बोरे देख लोग दांग रह गए थे. जबकि दोनों मियां-बीवी भीख मांगकर गुजारा करते थे.
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