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तस्वीर: कोरोना संकट के बीच जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा का ये नया रंग आंखों में रुक जाता है

लकड़ी की पालकी का बड़ा भाई रथ,रंगीन फूलों में डोली बना बैठा है,

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तस्वीरें AP, PTI, TV Today से साभार.
यात्राएं, जहां से शुरु होती हैं, वहां से चलती तो हैं पहुंचने वाली जगह पहुंचती भी हैं. कहने को सिर्फ सड़कों की हदें नापती हैं, लेकिन अंदर कहीं हमें सच पता है.

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यात्राएं शुरू होती हैं, पहले विचार से और ख़त्म होती हैं, पहले विचार तक पहुंचने पर.

लकड़ी की पालकी का बड़ा भाई रथ, रंगीन फूलों में डोली बना बैठा है, जैसे छोटे बच्चे ने लिपस्टिक लगा ली हो, एक तरफ लाल और दूसरी तरफ पीली.

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खींचने वाले, नाम तो भगवान का ले रहे हैं, मगर मन में खयाल बीमारी का भी है. ईसा के होने के भी बहुत पहले, पहिया बना देने वाले को कहां पता होगा, कि पहिए जितना ही जरुरी होगा मास्क साल दो हज़ार बीस में, मास्क जरूरी होगा, ताकि सब पहिए चलते रहें.

कुछ ही दिन पहले तक ही एक हथिनी के लिए बिलखते देश में, ये कौन लोग हैं जो सूंड़ पर काढ़ रहे हैं फूल. इन्हें महावतों के पैर में महावर लगा देने चाहिए और चुपके से उनके आंकुस भी छिपा देने चाहिए.

  इस असाध्य बीमारी के दौर में पंरपरा को निबाहते हुए, कहीं 'हाथी घोड़ा पालकी...' वाली धुन जब लगे तो, पालकी वाली लड़की और पटाखे वाली हथिनी को याद कर लेना.

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मंज़िल तक पहुंच जाना होगा, उन्हें रथों पर सबसे ऊंची जगह देख पाने का ख्याल ही, पहले विचार तक पहुंचने जैसा होगा, यात्राओं के पूरा हो जाने जैसा.
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