बंदीप सिंह1971 में चंडीगढ़ में जन्मे बंदीप सिंह एक प्रतिष्ठित संपादकीय और फाइन आर्ट फोटोग्राफर हैं. इन दिनों इंडिया टुडे ग्रुप ऑफ पब्लिकेशंस में ग्रुप फोटो एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. उनकी तस्वीरें टाइम, इंडिया टुडे, द न्यूयॉर्क टाइम्स, बिजनेस वीक, बिजनेस टुडे, और कई अन्य प्रकाशनों में प्रकाशित हुई हैं. उनकी रचनाओं ने वियना के एसेल संग्रहालय, नई दिल्ली के निरंकारी म्यूज़ियम ऑफ़ फ़ेथ और नई दिल्ली स्थित लक्ज़मबर्ग दूतावास के स्थायी संग्रह में जगह पाई है. इसके साथ-साथ उनका कार्य कई देसी-विदेशी म्यूज़ियम्स में भी संग्रहित है. बंदीप नई दिल्ली में रहते हैं. संपर्क - bandeep@intoday.com. बंदीप ने ये कविता लिखी-पढ़ी, इंडिया टुडे के साथी फोटोग्राफर्स ने तस्वीरें जुटाईं और बाकी साथियों के सहयोग से इसे आपके लिए ले आए हैं.
छतों भर आकाश : इंडिया टुडे फोटोग्राफर्स द्वारा
चाहे लॉकडाउन में बंद हों, या कमरों के क्वारंटीन में, या सोशल डिस्टेंसिंग के दायरों में क़ैद, हम आशाओं के आकाशवासी हैं.
तस्वीर : यासिर इकबाल, नई दिल्ली
या फिर उदय के शक्तिबीज, आसमानों की कामना लिए हुए, हम अंकुरित होंगे, अपने आंगनों में, अपनी बालकनियों में अपनी छतों पे और रौशनी के हर प्लॉट पर अपना दावा करेंगे.

खेल का मैदान सिमट गया हो तो अपनी स्पर्धा से पूरा कर लेंगे, छक्के नहीं मार पाएं तो बॉल स्टॉप करने का रन होगा, और एक टिप्पा कैच, आउट माना जाएगा.

बैडमिंटन का नया रूल है कि शटल गिरनी नहीं चाहिए. क्योंकि ये महज़ खेल नहीं, कोरोना वायरस के इस दौर में वक़्त ने जो जीने की शर्तें रखीं हैं, ये उन शर्तों के बदले में हमारी अर्जित ज़मीन है.

तस्वीर : मनीष अग्निहोत्री, लखनऊ
क्योंकि अभी, अभी भी, हम बंद दीवारों को घर नहीं कहते, अगर अंधेरा है, तो हमारे पास खिड़कियां हैं, रौशनदान हैं, और अगर सड़कों पर वीरानी है तो छज्जों पर जीवंत कोलाहल है.

तस्वीर : पुरुषोत्तम दिवाकर, जयपुर
बातें चाहे सेलफोन पर हों या एक-दूसरे का मौन साथ, उसमें एक ज़ायक़ा शाम की हवा का भी होता है.

तस्वीर : सुबीर हालदार, कोलकाता
सूर्य नमस्कार, धूप के प्रांगण में नहीं हो, तो सिर्फ़ एक आसन है, शतरंज की बिसात पर 64 खाने ही नहीं, चारों दिशाएं भी मिलतीं है, और लूडो की गिट्टी अंधेरे घर में नहीं जाती.

तस्वीर : जैसन जी, चेन्नई
चाहे वो सेल्फी हो या शेयर करने के लिए वीडियो, नैचुरल लाइट में ही सबसे सही बनता है.

तस्वीर : सुबीर हालदार, कोलकाता
वायरस से अपनी सांसें बचा लेना, इसमें लाइफ तो है पर नैचुरल लाइफ नहीं, हमारी नैचुरल लाइफ, हमारी सहज सांसें, किसी डर की गिरवी नहीं, हमारी मर्ज़ी की एटीएम में है.

तस्वीर : आबिद भट, श्रीनगर
मंज़रों की बंधी हुई हदें, आकाश की ओर आंखें खोलते ही ढह जातीं हैं, और उधर देखो हमारे ख़्वाबों के परिंदे, आसमान नाप रहे हैं. क्या हुआ कि धूप का आंगन छोटा हो गया है, हम सूरज को अपनी पतंग से काटकर लूट लेंगे.

तस्वीर : के. आसिफ, नई दिल्ली
Corona Lockdown के समय छत भर आकाश | By Bandeep Singh | India Today Photographers -











