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हल्द्वानी में फिलहाल नहीं चलेगा बुलडोजर, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

4400 परिवारों को बड़ी राहत मिली

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हल्द्वानी में प्रदर्शन करते लोग (फोटो- ANI)

उत्तराखंड के हल्द्वानी में जमीन से बेदखल करने की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है. जस्टिस संजय किशन कौल और अभय ओका की बेंच ने ये फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी कर मामले पर जवाब मांगा है. कोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई 7 फरवरी को करेगा. 

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रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस कौल ने कहा,

“7 दिनों में अतिक्रमण ध्वस्त करने का आदेश कैसे दे सकते हैं? ये फैसला सही नहीं है. सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि आगे अतिक्रमण ना हो.”

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जस्टिस कौल ने ये भी कहा कि कुछ लोगों के पास 1947 से जमीन का पट्टा है. इन लोगों को हटाने से पहले सरकार को पुनर्वास की योजना बनानी चाहिए.

कोर्ट में कही गईं पांच प्रमुख बातें

-आजतक से जुड़ीं अनीषा माथुर और संजय शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा, ‘हमने कार्यवाही पर रोक नहीं लगाई है और केवल उच्च न्यायालय के निर्देशों पर रोक लगाई गई है. साथ ही विवादित भूमि पर आगे कोई निर्माण या विकास का काम नहीं होगा.’

- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हमने ये आदेश इसलिए पारित किया है, क्योंकि अतिक्रमण उन जगहों से हटाया जाना है, जो कई दशकों से प्रभावित लोगों के कब्जे में है, कई लोग 60 सालों से भूमि पर रह रहे हैं, इसलिए पुनर्वास के लिए उपाय किए जाने चाहिए, क्योंकि इस मुद्दे में मानवीय दृष्टिकोण शामिल है.’

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- सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा, ‘इस मामले में हमें यह तथ्य परेशान कर रहा है कि उनका क्या होगा जिन्होंने नीलामी में जमीन को खरीदा और 1947 के बाद से रहे हैं... आप जमीन का अधिग्रहण कर सकते हैं लेकिन अब क्या करें... लोग 60-70 साल से रह रहे हैं, उनके पुनर्वास की जरूरत है.’

- जस्टिस संजय किशन कौल ने ये भी कहा, ‘अतिक्रमण के जिन मामलों में लोगों के पास कोई अधिकार नहीं था, उस स्थिति में सरकारों ने अक्सर प्रभावितों का पुनर्वास किया है. इस केस में कुछ लोगों के पास कागजात भी हैं, ऐसे में आपको एक समाधान खोजना होगा, इस मुद्दे का एक मानवीय पहलू भी है.’

- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘रातों-रात 50 हजार लोगों को उजाड़ा नहीं जा सकता, ऐसे लोगों का हटाया जाना चाहिए जिनका भूमि पर कोई अधिकार नहीं है और रेलवे की आवश्यकता को पहचानते हुए उन लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता है.’

क्या है पूरा मामला?

हाल ही में हल्द्वानी में रेलवे की ओर से एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया गया था. नोटिस में ऐलान किया गया था कि रेलवे की जमीन पर बने घरों को एक हफ्ते के भीतर खाली कर दिया जाए. यदि ऐसा नहीं किया गया तो अतिक्रमण रोधी कार्रवाई की जाएगी और इसका खर्च लोगों से ही वसूला जाएगा.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक 20 दिसंबर को उत्तराखंड हाई कोर्ट की जस्टिस आर सी खुल्बे और शरद कुमार शर्मा की बेंच ने रेलवे को ‘बल प्रयोग’ की इजाजत दी थी. कोर्ट ने कहा था कि इसके लिए कब्जेदारों को एक हफ्ते का समय देने के बाद कार्रवाई की जाए.

दरअसल, मामला हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके का है. यहां लगभग 2.2 किलोमीटर के इलाके में फैली गफूर बस्ती, ढोलक बस्ती और इंदिरा नगर के लोगों को रेलवे ने एक नोटिस जारी किया था. रेलवे ने नोटिस में अवैध अतिक्रमण हटाने की बात कही थी. न हटाने पर वहां रह रहे लोगों से वसूली किए जाने की बात भी कही थी.

इस मामले में रेलवे ने अपने दावे भी सामने रखे हैं. रेलवे के अनुसार उनके पास पुराने नक्शे हैं. इसके अलावा 1959 के दस्तावेज और 1971 के रेवेन्यू रिकॉर्ड भी हैं. लेकिन, रेलवे के इन दावों पर लोग सवाल उठा रहे हैं. इन्हीं दावों और लोगों की दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है.

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